मापयंत्रण

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वाष्प टरबाइन का नियंत्रण पटल (कंट्रोल पैनेल)

मापयंत्रण (Instrumentation) इंजीनियरी की एक शाखा है जो मापन एवं नियंत्रण से सम्बन्धित है।

इन युक्तियों को मापकयंत्र (instrument) कहते हैं जो किसी प्रक्रम (process) के प्रवाह (flow), ताप, दाब, स्तर आदि चरों (variables) को मापने या नियंत्रित करने के काम आते हैं। मापकयंत्र के अन्तर्गत वाल्व, प्रेषित्र (transmitters) आदि अत्यन्त सरल युक्तियों से लेकर विश्लेषक (analyzers) जैसे जटिल युक्तियां सम्मिलित हैं। प्रक्रमों का नियंत्रण अनुप्रयुक्त मापयंत्रण की प्रमुख शाखा है।

आधुनिक नियंत्रण कक्ष




नोट:- Instrument को प्लांट की आंख 👀 कहा जाता है।

भारतीय मानयंत्रण का इतिहास[संपादित करें]

भारत में खगोलीन प्रेक्षणों (मापन) के लिए वराहमिहिर, आर्यभट, भास्कराचार्य प्रथम, ब्रह्मगुप्त, लल्ल, वटेश्वर, श्रीपति और भास्कराचार्य द्वितीय के द्वारा किए गये कार्यों के द्वारा ४०० ई से लेकर १२०० ई तक खगोलशास्त्र का तेजी से विकास हुआ।

ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त के यन्त्राध्याय में 'यन्त्र' के प्रयोजन के बारे में ब्रह्मगुप्त लिखते हैं-

इदानीं यन्त्राध्यायारम्भप्रयोजनमाह ।
गोलस्य परिच्छेदः कर्तुं यन्त्रैर्विना यतोऽशक्यः ।
संक्षिप्तं स्पष्टार्थं यन्त्राध्यायं ततो वक्ष्ये ॥ ४ ॥
अब यन्त्राध्याय प्रारम्भ करने के कारण कहते हैं ।
यन्त्रों के बिना ज्यौतिषिक लोग गोल का विचार अच्छी तरह करने में असमर्थ होते हैं । इसलिए गोल की स्पष्टता के लिए संक्षेप में यन्त्राध्याय को मैं कहता हूँ।

सवाई जयसिंह के पहले तक उपयोग में आने वाले प्रमुख यन्त्र ये थे- नदिका यन्त्र (clepsydra, outflow water clock), घटिका यन्त्र (sinking bowl clepsydra), नदियालय यन्त्र (equinoctial sundial), फलक यन्त्र (sundial), कर्तारी यन्त्र (equinoctial sundial), ध्रुवभ्रम यन्त्र (measuring the time by the rotation of the Big Dipper), कपाल यन्त्र (hemispherical sundial, प्रतोद यन्त्र (whip shaped gnomonic device), यन्त्रराज (astrolabe), तुरीययन्त्र (quadrant), तथा गोलनन्द (armillary sphere)। [1]

लल्लाचार्य ने अपने ग्रन्थ में १२ यन्त्रों का वर्णन किया है-

गोलो भगणश्चक्रं धनुघटी शंकुशकटकर्तर्यः।
पीप्टक पालशलाका द्वादशयन्त्राणिसह यष्टया ॥

अनुवाद : गोला, भणक (ring,), चक्र (dial), धनु (bow), घटी (time measuring water vessel) , शंकु (Gnomon), शकट (divider), कर्तयः (scissor), पीप्टक , पाल और शलाका, छड़ी - ये १२ यन्त्र है )

भास्कराचार्य सिद्धान्त शिरोमणि ग्रंथ के यंत्राध्याय प्रकरण में कहते हैं, "काल के सूक्ष्म खण्डों का ज्ञान यंत्रों के बिना संभव नहीं है। इसलिए अब मैं यंत्रों के बारे में कहता हूं।" वे नाड़ीवलय यंत्र, यष्टि यंत्र, घटी यंत्र, चक्र यंत्र, शंकु यंत्र, चाप, तुर्य, फलक आदि का वर्णन करते हैं।

अथ यन्त्राध्यायो व्याख्यायते । तत्राऽऽदौ तदारम्भप्रयोजनमाह-
दिनगतकालावयवा ज्ञातुमशक्या यतो विना यन्त्रैः ।
वक्ष्ये यन्त्राणि ततः स्फुटानि संक्षेपतः कतिचित् ॥१॥
गोलो नाडीवलयं यष्टिः शङ्कुर्घटी चक्रम् ।
चापं तुर्यं फलकं धोरेकं पारमार्थिकं यन्त्रम् ॥२॥
( यन्त्रों के बिना दिनगत काल के सूक्ष्माति सूक्ष्म अवयवों का ज्ञान नहीं होता है, अत एव संक्षेप से समय सूचक कतिपय यन्त्रों का वर्णन इस यन्त्राध्याय नाम के अध्याय में किया जा रहा है।॥१॥
इस प्रकार यन्त्रों में (१) गोलयन्त्र (२) नाडोवलय (३) यष्टि (४) शङ, (५) घटी, (६) चक्र, (७) चाप, (८) तुर्य और (९) फलक यन्त्रों के वर्णन के साथ सर्वोपरि सर्वोत्तम एक यन्त्र है जिसका नाम “धी” अर्थात् बुद्धि यन्त्र हैं ।॥२॥)[2]

सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित जन्तर-मन्तर वास्तव में एक खुली हुई मापन-यंत्र-शाला है। जयसिंह द्वारा निर्मित जन्तर-मन्तर में विद्यमान यन्त्र ये हैं- सम्राट यन्त्र, जयप्रकाश यन्त्र, राशिवलय यन्त्र, राम यन्त्र, चक्र यन्त्र, दिगंश यन्त्र, कपालि यन्त्र, दक्षिणोभित्ति यन्त्र, क्रान्ति यन्त्र, उन्नतांश यन्त्र, नारीवलय यन्त्र, शस्थान्न्श यन्त्र, तथा यन्त्रराज।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]