अभिवचन

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विधि के सन्दर्भ में, विशेष रूप से अंग्रेजी 'कॉमन लॉ' वाले देशों में, किसी सिविल मामले में न्यायालय में पक्षकार या वकील का लिखित कथन या पक्ष-प्रस्तुति अभिवचन (प्लीडिंग) कहलाता है। विभिन्न देशों की सिविल प्रक्रिया संहिताएँ उन देशों में अभिवचन से सम्बन्धित प्रक्रिया को परिभाषित करतीं हैं।

अभिवचन से मतलब वादपत्र और लिखित कथन से है। चूंकि न्यायिक प्रक्रिया स्वतःचालित नहीं होती है, उसे चलाना पड़ता है। न्यायिक प्रक्रिया चलाने का माध्यम अभिवचन है। प्रत्येक न्यायिक प्रक्रिया का आरंभ एवम समाधान अभिवचन से ही होता है। अभिवचन जितना स्पष्ट एवम सुगठित होगा,प्रक्रिया सरल एवं शीघ्रगामी हो जायेगी।

अभिवचन का सम्पूर्ण उद्देश्य पक्षकारों के बीच वास्तविक विवाद का निर्धारण, विवाद के विस्तार क्षेत्र को सीमित करना, और यह देखना कि दोनों पक्ष को किस बिन्दु पर परस्पर विरोध है। एक पक्षकार द्वारा दूसरे को आश्चर्यचकित करने से रोकना और न्याय की हत्या को रोकना भी अभिवचन का उद्देश्य है।

भारत में अविवचन[संपादित करें]

भारत में अभिवचन सिविल प्रक्रिया संहिता, १९०८ के अनुसार होता है। इसके आदेश 6 नियम 1 में अभिवचन को परिभाषित किया गया है।

"अभिवचन" से वादपत्र या लिखित कथन अभिप्रेत होगा। ("Pleadings" shall mean plaint or written statement.)

इस प्रकार अभिवचन में वादपत्र एवं लिखित कथन (जबाब दावा) दोनों को सम्मिलित किया गया है। सरल भाषा में हम यह कह सकते हे कि वादी का वादपत्र और प्रतिवादी का लिखित कथन दोनों ही अभिवचन के भाग हैं।

अभिवचन के सिद्धान्त[1]
  • (१) अभिवचन में केवल घटनाओं का वर्णन किया जाना चाहिये, विधि का नहीं।
  • (२) केवल सारभूत तथ्य की घटना का वर्णन किया जाना चाहिये। (आदेश 6, नियम 2)
  • (३) तथ्य जिसे साक्ष्य द्वारा साबित किया जाना है उसका उल्लेख अभिवचन में नहीं किया जाना चाहिए।
  • (४) अभिवचन में आवश्यक विवरण दिया जाना चाहिये। (आदेश 6, नियम 4)
  • (५) विलुप्त।
  • (६) पूर्ववर्ती शर्त का विशेष रूप से वर्णन करना। ( आदेश 6 नियम 6)
  • (७) संशोधन के बिना अभिवचन में फेरबदल नहीं किया जाना। (आदेश 6 नियम 7)
  • (८) संविदा का का इंकार (denial of contract) (आदेश 6 नियम 8)
  • (९) दस्तावेज के प्रभाव का कथन किया जाना।
  • (१०) किसी व्यक्ति के विद्वेष, कपट पूर्ण भावना,ज्ञान या मस्तिष्क की अन्य दशा का अभिकथन परस्थितियों को दर्ज किये बिना अभिकथन पर्याप्त होगा। ( आदेश 6, नियम 10)
  • (११) सूचना का एक तथ्य के रूप में अभिकथन किया जाना चाहिये। ( आदेश 6, नियम 11)
  • (१२) उपलक्षित संविदा का तथ्य के रूप में अभिकथन किया जाना चाहिये। ( आदेश 6, नियम 12)
  • (१३) विधि की उपधारणा- कोई भी पक्षकार किसी ऐसे तथ्य या विषय का अभिकथन नहीं करेगा जिसकी प्रकल्पना विधि उसके पक्ष में करती है। ( आदेश 6, नियम 13)
  • (१४) अभिवचन का हस्ताक्षरित किया जाना-- प्रत्येक अभिवचन पक्षकार एवम उसके अधिवक्ता द्वारा हस्ताक्षरित की जायेगी।विशेष परिस्थिति में उसके अधिकृत व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित की जा सकेगी। ( आदेश 6 नियम 14)
  • (१५) अभिवचन का सत्यापन।
  • (१६) अभिवचन का काट दिया जाना-
  • (१७) अभिवचन का संशोधन -- न्यायालय में वाद या जबाब दावा पेश होने के बाद उसमें संशोधन क्या जा सकता है। (आदेश 6, नियम 17)

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]