अधर्म

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इसका अर्थ धर्म का एकदम विपरीत होता है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार अधर्म की ५ शाखाएँ है[1]-

  1. विधर्म
  2. परधर्म
  3. उपमा
  4. आभास
  5. छल

विधर्म[संपादित करें]

जिस कार्य को धरम बुद्धि से करने पर भी अपने धर्म में बाधा पडे़ उसे विधर्म कहते है।

परधर्म[संपादित करें]

किसी अन्य के द्वारा किसी अन्य पुरुष के लिये उपदेश किया हुआ धर्म "परधर्म" कहलाता है।

उपमा[संपादित करें]

पाखण्ड यादम्भ उपमा कहलाते है।

आभास[संपादित करें]

मनुष्य अपने आश्रम के विपरीत स्वेच्छा से जिसे धर्म मान लेता है वह आभास कहलाता है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध-७, अध्याय-१५, श्लोक-१२