मंडोर

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मंडोर जोधपुर शहर मे रेलवे स्टेशन से ८ किलोमीटर की दूरी पर है। यह परिहार राजाओं का गड़ था व सेकडों सालों तक यहां से परिहार राजाओं ने सम्पूर्ण मारवाड़ पर अपना राज किया। सन् १३९५ में चुंडाजी राठोड की शादी परिहार राजकुमारी से होने पर मंडोर उन्हे दहेज में मिला तब से परिहार राजाओं की इस प्राचीन राजधानी पर राठोड शासकों का राज होगया। मारवाड़ की इस प्राचीन राजधानी में कई प्राचीन स्मारक हैं। हॉल ऑफ हीरों में चट्टान से दीवार में तराशी हुई पन्द्रह आकृतियां हैं जो हिन्दु देवी-देवतीओं का प्रतिनिधित्व करती है (देवताओं की साल व वीरों का दालान)। अपने ऊची चट्टानी चबूतरों के साथ, अपने आकर्षक बगीचों के कारण यह प्रचलित पिकनिक स्थल बन गया है। मन्डोर मारवाड की पूरानी राजधानी रही थी | मन्डोर को रावण का ससुराल होने की किदवन्ति भी हे मगर रावण की पटरानी मन्दोद्री नाम से मिलता नाम के अलावा अन्य कोइ सबुत नही हे। मन्डोर मे सदियो से होली के दूसरे दिन राव का मेला भरता हे मेले स्वरुप व परमपरा आज भी सेकडो साल पुरानी हे हाल के वर्षो मे स्वरुप मे जरुर बदलाव हुआ हे मगर परमपरावो मे बदलाव नही हुआ हे। मण्डोर का प्राचीन नाम ’माण्डवपुर’ था। मण्डोर मारवाड नरेशों की पूर्व राजधानी थी। मण्डोर का दुर्ग देवल, देवताओं की राल, जनाना, उद्यान, संग्रहालय, महल तथा अजीत पोल दर्शनीय स्थल हैं। मण्डोर साम्प्रदायिक सद्भाव एवं एकता का प्रतीक हैं। तनापीर की दरगाह, मकबरे, जैन मंदिर तथा वैष्णव मंदिर सभी का एक ही क्षेत्र में पाया जाना, इस तथ्य का मजबूत सबूत हैं कि विभिन्नता में एकता यहाँ के जीवन की प्रमुख विशेषता रही हैं। [1]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. "मण्डोर" (पीएचपी). प्रेसनोट.इन. http://www.pressnote.in/travel/visitplace.php?id=29055. अभिगमन तिथि: २००९.