बीमा का इतिहास
बीमा सिद्धांत का इतिहास समुद्र व्यापार के प्रारंभ से ही संबंधित है। अपने आदि रूप में क्षतिपूर्ति का बीमा सिद्धांत सहकारिता के सिद्धांत पर आधारित था जिसे "जेनरल एवेरेज" कहा जाता था। समुद्र में तूफान के समय अथवा अन्य खतरों के समय कभी कभी यह आवश्यक हो जाता था कि जहाज़ तथा अन्य सामान की रक्षा के लिए कुछ सामान समुद्र में फेंक कर ज़हाज को हल्का कर लिया जाए। इस प्रकार होनेवाली हानि उस व्यापार योजना में भाग लेनेवाले सभी हित आनुपातिक रूप से वहन कर लेते थे। यही सहकारिता का सिद्धांत क्रमश: बीमा के रूप में पनपा।
समुद्र बीमा अनुबंध में केवल एक खतरे के विरुद्ध बीमा नहीं किया जाता वरन् उसमें उन सभी खतरों का उल्लेख होता है जो समुद्रयात्रा में संभाव्य हैं। ध्यान रहे कि बीमा करने के उपयुक्त वही खतरे माने जाते हैं जो संभाव्य हैं। ऐसी यात्रा में जो हानियाँ निश्चित हैं, जैसे पशु आदि का बीमार हो जाना अथवा फल आदि का सड़ जाना इत्यादि उनका बीमा नहीं किया जाता।
समुद्र बीमा की एक शर्त यह भी है कि उक्त अनुबंध लिखित हो अर्थात् बीमापत्र उक्त बीमा अनुबंध का पूर्ण प्रमाण माना जाता हैं। समुद्र बीमा चूँकि क्षतिपूर्ति का अनुबंध है अत: बीमा करानेवाले के वक्तव्य वस्तुत: सत्य होने चाहिए। साथ ही यदि बीमा करानेवाले ने यह तथ्य प्रगट नहीं किया हैं कि पहले उक्त बीमा करने से किसी ने इनकार कर दिया था तो भी उसका उस अनुबंध की वैधता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अन्य प्रकार के बीमा संबंधों में पहले की अस्वीकृतियाँ छिपाना उस अनुबंध को अवैध करार देने के लिए पर्याप्त है।
क्षतिपूर्ति के बीमा तथा अन्य प्रकार के बीमा अनुबंध का एक और अंतर ध्यान देने योग्य है। जीवन बीमा में बीमा हित का अस्तित्व बीमा कराने के समय होना आवश्यक है, भले ही बीमें में वर्णित घटना घटित होने के समय वह हित रहे या न रहे। उदाहरणार्थ क अपनी पुत्री के विवाह के लिए यदि पंद्रह वर्ष की अवधि का बीमा करा रहा है तो "क" की पुत्री का अस्तित्व बीमा कराने के समय आवश्यक है। उस 15 वर्ष की अवधि के पूर्व ही क की पुत्री की मृत्यु भले ही हो चुकी हो, किंतु वह धनराशि क को प्राप्त हो जाएगी। लेकिन अगर क की पुत्री का जन्म नहीं हुआ है तो उक्त प्रकार के बीमा अनुबंध के लिए आवश्यक बीमा हित वर्तमान न होने से क उक्त प्रकार का बीमा नहीं करा सकता। इसके विपरीत क्षतिपूर्ति के बीमा अनुबंध पर बीमा हित बीमा कराने के समय वर्तमान हो या न हो लेकिन उक्त क्षति घटित होने के समय धनराशि चाहनेवाले में उक्त बीमा हित व्यस्त होना आवश्यक है। उदाहरण के लिए क ने अपने मकान का अग्नि बीमा कराया और उस बीमे के चालू रहते हुए वह मकान ब को बेच दिया। बिक्री होने के दूसरे दिन उस मकान में आग लग गई। ऐसी स्थिति में क द्वारा कराया गया बीमा यद्यपि चालू है, फिर भी उस मकान में क का बीमा हित न रहने के कारण उक्त बीमा अनुबंध के आधार पर क्षतिपूर्ति का दावा ब नहीं कर सकता है क्योंकि क्षति होने के समय मकान के साथ साथ मकान का बीमा हित भी ब में व्यक्त हो चुका है। इसी सिद्धांत का एक निष्कर्ष यह भी है कि जो वस्तु क्षतिग्रस्त हुई है उसका मूल्यांकन बीमा कराए जाने के समय के मूल्य पर नहीं वरन् क्षति घटित होने के समय के मूल्य के आधार पर ही किया जाता है।
बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]
- बीमा का संक्षिप्त इतिहास
- बीमा का इतिहास
- Insurance Information Institute
- Museum of Insurance - displays thousands of antique insurance policies and ephemera
- Congressional Research Service (CRS) Reports regarding the U.S. Insurance industry