पैराफिन

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पैराफिन में रखा हुआ सोडियम

रसायन विज्ञान में, पैराफिन शब्द का प्रयोग एल्केन के पर्याय के रूप में कर सकते हैं। वस्तुत: ये CnH2n+2 सामान्य सूत्र वाले हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण है। पैराफिन मोम से मतलब एल्केनों के ऐसे मिश्रण से है जिसमें 20 ≤ n ≤ 40 होता है तथा ये कमरे के ताप पर ठोस अवस्था में होते हैं किन्तु लगभग 37 °C के उपर जाने पर द्रवित होने लगते हैं।

परिचय[संपादित करें]

पैराफिन हाइड्रोकार्बन (या बहुवचन में पैराफिन) उन यौगिकों को कहते हैं जिनमें रासायनिक सक्रियता बहुत ही अल्प होती है। इनका नाम ( पेरम् / parum = स्वल्प ; एफिनिस / affinis = बंधुता ) के कारण 'पैराफिन' पड़ा है। हाइड्रोकार्बन में केवल कार्बन और हाइड्रोजन होते हैं। पैराफिन हाइड्रोकार्बन पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और अन्य खनिज तेलों में पाए जाते हैं। सबसे सरल संरचना का पैराफिन मेथेन है, जो कोयले की खान के कोयला-गैस, दलदल से निकली गैस तथा मलजल के अवमलों से निकले अवपंक (sludge) में पाया जाता है। कुछ पौधों के मोम सदृश अवयवों में भी पैराफिन हाइड्रोकार्बन पाया जाता है। हाइड्रोकार्बन में पैराफिन ऐसे हाइड्रोकार्बन हैं, जिनमें हाइड्रोजन की अधिकतम मात्रा रहती है। इन्हें 'संयुक्त हाइड्रोकार्बन' भी कहते हैं। वैज्ञानिकों ने इनका क्रमबद्ध नाम 'अलकेन' (alkanes) दिया है।

पैराफिन यौगिकों की एक श्रेणी बनाते हैं, जिनका निरूपण व्यापक सूत्र, Cn H2n+2, से होता है। इसमें न (n) = १, २, ३, ........ (हेप्टाकंटेन में ७० तक) है। इसके यौगिकों के कार्बन परमाणु सीधी रेखाओं में, अथवा सशाख शृंखलाओं में, संबद्ध हो सकते हैं। इस प्रकार के बंधन से ही ऐसे यौगिकों में समावयकता (Isomerism) होती है।

निर्माण की विधि[संपादित करें]

पैराफिन के निर्माण की विधियों में से कुछ निम्नलिखित हैं :

१. किसी वसीय अम्ल के सोडियम लवण को सोडा लाइम के साथ गर्म करने से पैराफिन बनता है, जैसा निम्नलिखित सूत्र से प्रकट है :

RCOONa + NaOH --> RH (पैराफिन) + Na2CO3

२. कोल्बे की (Kolbe's) विधि द्वारा किसी वसीय अम्ल के सोडियम या पोटैशियम लवण के विलयन के जलीय विद्युद्विश्लेषण से मेथेन के अतिरिक्त अन्य सब पैराफिन बन सकते हैं।

३. (क) ऐल्किल हैलाइड के शुष्क ईथर में सोडियम या जस्ते से क्रिया करने से,

(ख) ऐल्किल हैलाइड को जस्ता-ताँबा या ऐल्यूमिनियम-पारा युग्मक और एथेनॉल (ethanol) के साथ अपचयन से तथा

(ग) ऐल्किल हैलाइड को बंद नलियों में हाइड्रियॉडिक अम्ल और लाल फास्पोरस के साथ गरम करने से।

४. सावात्या-सेंडेरेंस (Sabatier-Senderens) विधि द्वारामोनो हाइड्रिक ऐलकोहलों को हाइड्रियॉडिक अम्ल से अपचयन और असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों के हाइड्रोजनीकरण से भी पैराफिंस प्राप्त होते हैं।

५. पानी से तनूकृत खनिज अम्लों, ऐल्कोहलों तथा ऐल्किल हैलाइडों द्वारा मैग्नीशियम ऐल्किल हैलाइड के विघटन से भी पैराफिन प्राप्त होती है।

गुण[संपादित करें]

पैराफिन यौगिकों की श्रेणी में यौगिकों के अणुभार ज्यों ज्यों बढ़ते हैं त्यों त्यों यौगिकों के विशिष्ट गुरुत्व, गलनांक और क्वथनांक भी बढ़ते जाते हैं। पैराफिंस के प्रथम चार यौगिक गैस, उसके बाद के ११ यौगिक द्रव और शेष सभी यौगिक ठोस होते हैं। पैराफिंस पानी में नहीं घुलते, किंतु हाइड्राक्सिल रहित (nonhydoxylic) विलायकों में घुल जाते हैं। रसायनत: ये निष्क्रिय होते हैं। कुछ ही अभिकर्मकों, जैसे हैलोजन और ऑक्सीकारों से ये आक्रांत होते हैं, जिनमें से कुछ की अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं :

हैलोजनों (halogens) से :

CH4 + X2 --> CH3 X + HX

यहाँ (X) = फ्लोरीन (F), क्लोरीन (Cl,) ब्रोमीन (Br) या आस्टेटिन है। हैलोजन हाइड्रोजन के एक या सभी परमाणुओं को प्रतिस्थापित करता है।

RH + H2SO4 --> RSO3H + HOH

नाइट्रिक अम्ल से :

CH4 + HNO4 --> CH4NO4 + HOH

सल्फ्यूरिल क्लोराइड से :

C4H10 + SO2 Cl2 ( in pyridine /or light) --> C4H2SO2 + Cl + HCl

पैराफिंसों के ऑक्सीकरण से पानी और कार्बनडाऑक्साइड बनते हैं और बहुत उष्मा निकलती है। अधिक गर्म करने पर पैराफिन दो या दो से अधिक पदार्थो में विघटित हो जाते हैं। ऊँचे ताप पर उत्प्रेरेकों (catalysts) की उपस्थिति में, ये समावयवीकरण (isomerise) करते हैं।

पैराफिन मोम[संपादित करें]

पैराफिन मोम कोई निश्चित यौगिक नहीं है। यह पैराफिन श्रेणी के संतृप्त और असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण होता है। हाइड्रोकार्बनों में २१ से ६० तक कार्बन परमाणु पाए गए हैं। प्रधानतया नार्मल (normal) और विववृत श्रृंखलावाले हाइड्रोकार्बन रहते हैं, पर संवृत श्रृंखलावाले हाइड्रोकार्बन बिलकुल अपवर्जित नहीं हैं।

पेट्रोलियम में तीन प्रतिशत तक मोम रहता है। इसे पैराफिन मोम कहते हैं। जब पेट्रोलियम का आसवन होता है तब अधिकांश मोम "स्नेहन तेल' में आ जाता है। निर्वात में, अथवा भाप की उपस्थिति में, आसवन से जो आसुत प्राप्त होता है उसमें मोम की मात्रा ४० से ५० प्रतिशत तक रह सकती है। अत: ऐसे आसुत को मोम आसुत कहते हें। दक्षिण-पूर्व एशिया के तेल के आसुत में ४० प्रतिशत तक मोम पाया गया है, जबकि यूरोप और अमेरिका के कच्चे तेल के आसुत में १० प्रतिशत से अधिक मोम नहीं रहता।

आसुत से मोम निकालने की दो प्रमुख रीतियाँ हैं। एक रीति में मोम आसुत को पर्याप्त ठंढा करते हैं, जिससे ठोस मोम द्रव तेल से अलग हो जाता है। अब इसे फिल्टर प्रेस में छानते हैं। फिल्टर प्रेस कई प्रकार के तथा कई पट्टों के होते हैं और विभिन्न दाब पर (प्रति वर्ग इंच ५०० पाउंड दाब तक) कार्य करते हैं। यदि आसुत में मोम की मात्रा कम है तो एक बार में ही अधिकांश मोम निकल जाता है, अन्यथा प्रक्रम को कई बार दोहराना पड़ता है। इससे कई श्रेणी के मोम प्राप्त हो सकते हैं। ऐसे मोम की टिकिया में कुछ तेल रह जाता है। तेल की मात्रा मोम में ०.३ प्रतिशत से अधिक नहीं रहनी चाहिए।

कच्चे मोम से तेल निकालने के विशिष्ट यंत्र बने हैं, जिन्हें 'स्वेदक' (sweater) कहते हैं। स्वेदक कई प्रकार के बने हैं, पर उन सभी के सिद्धांत प्राय: एक ही है। मोम को पिघलाकर ठंढा करते हैं। पात्र के पेदे में तेल इकट्ठा होता है और निकाल लिया जाता है। मोम ऊपर रह जाता है। यह कार्य छिछले कड़ाहों मे होता है। कड़ाहे १५ से २० फुट वर्गाकार ओर एक फुट गहरे होते हैं। इनमें पेदें से कुछ इंच ऊपर आधृत (supported) एक क्षैतिज आवरण होता है और आवरण के ऊपर सपाट क्षैतिज नलकुंडली होती है। कड़ाहा में इतना पानी रहता है कि आवरण उसमें ठीक डूब जाय। पिद्यले मोम को कड़ाहा में जल के ऊपर पंप करके ले जाते हैं। फिर नल कुंडली में कोई शीतक द्रव बहाते हैं। इससे मोम की ठोस टिकिया बनती है। अब स्वेदक कक्ष को धीरे धीरे गरम करते हैं। इससे टिकिए का तेल चूता, या स्वेदन करता, है। जो तेल इस प्रकार निकलता है, उसे "पाद तेल' (foot oil) कहते हैं। पाद तेल में कुछ मोम रहता है। प्रक्रिया के दोहराने से पाद तेल का मोम भी निकाला जा सकता है। तेल के निकल जाने पर मोम को फुलर मिट्टी, या जांतव कोयले, पर धीरे धीरे छानकर, अथवा सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा उपचारित कर सफेद और साफ मोम प्राप्त करते हैं।

स्वेदक से प्राप्त ऐसे मोम में अब भी प्राय: ०.३ प्रतिशत तक तेल रह सकता है। मोम ३८० से ६६० सें. पर पिघलता है। ४९० सें. से नीचे पिघलनेवाले मोम को "कोमल मोम' कहते हैं। ४९० से ५४० सें. पर पिघलनेवाला मोम मध्यम श्रेणी का होता है।

विलायक द्वारा भी मोम निकाला जा सकता है। इसके लिये वायुमंडल के दबाव और सामान्य का अल्प ऊँचे ताप पर द्रव प्रोपेन उपयुक्त होता है। ऐस्फाल्ट पदार्थ द्रव प्रोपेन में नहीं घुलते, केवल मोम और तेल घुल जाते हैं। ठंढा करने से मोम पृथक्‌ हो जाता है। मोम के निकल जाने पर विलयन के आसवन से विलायक निकल जाता है और तेल रह जाता है। द्रव प्रोपेन के स्थान पर ऐसीटोन-बेंजोल मिश्रण और क्लोरोएथिलीन भी विलायक के रूप में प्रयुकत हो सकते हैं।

गैलीशिया की धरती में एक पैराफिन मोम पाई जाती है, जिसे "मिट्टी मोम' या "ओजोकेराइट' कहते हैं। आसवन से इसकी सफाई करने पर "सेरेसिन' नामक बड़ा उपयोगी पैराफिन मोम, जो ६०० से ९३० सें. पर पिघलता है, पाया जाता है।

शेल (shale) तेल, या विटुमेन (bitumen), या भूरे कोयले के आसवन से एक तेल प्राप्त होता है, जिससे पैराफिन मोम निकाला जाता है। इससे पर्याप्त मात्रा में मोम प्राप्त होता है।

खनिज तेल[संपादित करें]

उपयोगिता[संपादित करें]

पैराफिन मोम की उपयोगिता इसकी दहनशीलता, जल के प्रति प्रतिरोध, रासायनिक अभिकर्मकों के प्रति निष्क्रियता, विद्युत्‌ की अचालकता और अन्य रासायनिक गुणों पर निर्भर है। कठोर मोम इन कामों के लिये उत्कृष्ट होता है, यद्यपि कोमल मोम में स्टियरिक अम्ल और कारनौबा मोम मिलाकर वह कठोर बनाया जा सकता है।

सबसे अधिक मोम मोमबत्ती बनाने में लगता है। ऐसी मोमबत्ती में जलने का गुण और दीपनक्षमता अच्छी होती है। जलने पर यह राख नहीं छोड़ती और न कोई गंध ही देती है। यह मोम साँचे में सरलता से ढाला जाता है। साँचे में चिपकना कम करने के लिये, इसमें अल्प लेड स्टियरेट डालते हैं। गर्मी में मोमबत्ती टेढ़ी हो जाती है। इसे रोकने के लिये कुछ स्टियरिक अम्ल और कारनौबा मोम मिला देते हैं। स्टियरिक अम्ल में रंग को घुलाकर रंगीन मोमबत्ती बनाते हैं। कागज पर मोम का लेप से जलाभद्य हो जाते हैं। वस्त्र और चमड़े भी इससे ओतप्रोत होने पर जलाभेद्य हो जाते हैं। दियासलाई की लकड़ी पर इसके लेप के कारण लकड़ी आग जल्द पकड़ती है। विद्युत्‌ के यंत्रों में इसका उपयोग व्यापकता से होता है। फलों और शाक-तरकारियों के संरक्षण, अंगरागों और औषधियों में भी कुछ पैराफिन मोम खपता है।

निम्न पैराफिन ईंधन के लिये और कज्जल या कजली (carbon black) के निर्माण में उपयोगी हैं। प्रोपेन के साथ मिला हुआ ब्यूटेन घरेलू गैसीय ईधन का काम देता है। पेंटेनों का उपयोग विलायक इर्धंन और पेंटेसोल (pentasol) के निर्माण में होता है। ऑक्टेन और हेक्सेन मोटर के इर्धंन और हेक्साडेकेन डीज़ेल इंजन में इर्धंन का काम देता है। अर्ध ठोस हाइड्रोकार्बन वैसलिन के रूप में अनेक श्रृंगार सामग्रियों और ओषिधियों में प्रयुक्त होते हैं। ठोस हाइड्रोकार्बनों से मोमबत्तियाँ बनती हैं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]