तुलसी (पौधा)
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तुलसी एक पौधा है जिसकी ऊँचाई लगभग ७५ सेन्टीमीटर होती है । इसकी पत्तियाँ चिकनी होती हे और उनकी लम्बाई लगभग २.५ सेन्टीमीटर होती है । तुलसी एक सुगंधित औषधि है । यह आयुर्वेद में बहुत उपयोगी बूटी है जो कई रोगों के उपचार में काम आती है । इसे हिंदू धर्म में पवित्र माना जाता है और लोग इसे अपने घर के आँगन या दरवाजे पर या बाग में लगाते हैं।
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[संपादित करें] तुलसी के बारे मे विवरण
लेटिन नाम : ओसियम सैकटम
अंग्रेजी नाम : बेसिल
पारिवारिक नाम : लाबी टीसिए
[संपादित करें] हिन्दू धर्म और तुलसी
प्रत्येक सद्गृहस्थ के घर के आंगन में प्राय: तुलसी का पौधा लगा होता है। यह हिंदू परिवार की विशेष पहचान है। स्त्रियां इसकी पूजा के द्वारा अपने सौभाग्य एवं वंश के समृद्धि की रक्षा करती हैं। रामभक्त हनुमानजी जब सीता जी की खोज करने लंका गए तो उन्हें एक घर के आंगन में तुलसी का वृक्ष दिखलाई दिया।
रामायुध अंकित गृह, शोभा बरनि न जाए।
नव तुलसि का वृंद तंह, देखि हरष कपिराय।
यानी अति प्राचीन परंपरा से तुलसी का पूजन सद्गृहस्थ परिवार में होता है। जिनके संतान नहीं होती, वे तुलसी विवाह भी कराते हैं। तुलसी पत्र चढ़ाए बिना शालिग्रामजी का पूजन नहीं होता। विष्णु भगवान को श्राद्ध भोजन में, देवप्रसाद, चरणामृत, पंचामृत में तुलसी दल होना आवश्यक है। अन्यथा वह प्रसाद भोग देवताओं को नहीं चढ़ता। मरते हुए प्राणी को अंतिम समय में गंगाजल व तुलसी दल दिया जाता है। तुलसी जितनी धार्मिक मान्यता किसी वृक्ष की नहीं है।
[संपादित करें] तुलसी - विभिन्न रोगों की औषधि
इन सभी धार्मिक मान्यताओं के पीछे एक वैज्ञानिक रहस्य छिपा है। तुलसी एक दिव्य औषधि वृक्ष है तथा कस्तूरी की तरह एक बार मृत प्राणी को जीवित करने की क्षमता रखता है। तुलसी के माध्यम से कैंसर जैसी असाध्य बीमारी भी ठीक हो जाती है। आयुर्वेद के ग्रंथों में तुलसी की बड़ी भारी महिमा वर्णित है। इसके पत्ते उबालकर पीने से सामान्य ज्वर, जुकाम, खांसी एवं मलेरिया में तत्काल राहत मिलती है। तुलसी के पत्तों में संक्रामक रोगों को रोकने की अद्भुत शक्ति है। प्रसाद पर इनको रखने से प्रसाद विकृत नहीं होता। पंचामृत या चरणामृत में इसको डालने से बहुत देर रखा गया जल व पंचामृत खराब नहीं होता, उसमें कीड़े नहीं पड़ते।
तुलसी की मंजरियों में एक विशेष खुशबू होती है, जिससे विषधर सांप उसके निकट नहीं आते। यदि कोई रजस्वला स्त्री इस पौधे के पास से गुजर जाए तो वह फौरन म्लान हो जाता है। इसके अनेक औषधीय गुणों के कारण ही, इसकी पूजा की जाती है।
छोटे-मोटे घरेलू रोगों से लेकर तमाम असाध्य बीमारियों को जड़-मूल से गायब कर देने की क्षमता तुलसी में पाई जाती है। इसका उपयोग चेचक, गठिया, दमा, वीर्य की कमी, ज्वर, मरोड़, बवासीर, मोतीझरा, आँख के दर्द, दाद-खाज-खुजली, मुँहासों, गले और सिर के दर्द, दाँत दर्द, पायरिया, नकसीर फूटने, रक्त विकार, मुँह की बदबू, सर्दी, खाँसी, प्लेग व पीलिया जैसे रोगों में अत्यंत गुणकारी है। आग से जलने व किसी जहरीले जंतु के काटने पर भी यह विशेष राहत देती है। इसका इस्तेमाल खटमल, मच्छर व अन्य कीड़े-मकोड़े भगाने के लिए भी किया जाता है। इसलिए तुलसी के प्रमुख औषधीय उपयोग की जानकारी अत्यंत आवश्यक बन जाती है।
[संपादित करें] दमा
१० तुलसी की पत्तियों को शहद में मिलाकर खाने से दमा का इलाज होता है ।
[संपादित करें] बुखार
तुलसी की पत्तियाँ व पुदिना की पत्तियों को कॉफी के साथ उबालें व १० मिनिट बाद शहद को मिलाकर पीने से बुखार दूर होता है ।
[संपादित करें] रक्तचाप
हृदय में दर्द होने पर ८ से १० तुलसी की पत्तियों को कालीमिर्च के साथ मिलाकर खाने से रक्तचाप में राहत मिलती है ।
[संपादित करें] कफ
हरी अदरक ,नींबू ,तुलसी की पत्तियाँ व शहद को पानी में मिलाकर पीने से कफ दूर होता है ।
[संपादित करें] मधुमेह
मेथी दाना ६ ग्राम लेकर कूट ले । शाम को २५० ग्राम पानी में भीगो दें । सुबह इसे खुब घोटे व कपड़े से छान कर बिना मीठा मिलाए पिये । इसका उपयोग दो महीनों तक करने से मधुमेह का इलाज होता है 1


