तपेदिक

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तपेदिक
राजयक्षमा, ट्यूबरक्युलोसिस
वर्गीकरण एवं बाह्य साधन
Tuberculosis-x-ray-1.jpg
एक विकट तपेदिक रोगी की छाटी का एक्सरे
आईसीडी-१० A15.A19.
आईसीडी- 010018
ओएमआईएम 607948
डिज़ीज़-डीबी 8515
मेडलाइन प्लस 000077 000624
ईमेडिसिन med/2324  emerg/618 radio/411
एम.ईएसएच D014376

तपेदिक, जिसे क्षयरोग, राजयक्ष्मा, यक्ष्मा, गुलिकार्ति तथा टयूबरक्लोसिस (संक्षेप में टी.बी.) कहते है , एक सामन्य किंतु घातक संक्रामक रोग माना जाता है। यह जीवाणु से फैलता है, मुख्य रूप से माइक्रोबैकटीरियम टयूबरक्लोसिस से। यह आम तौर पर फेफ़ेड़ो को प्रभावित करता है किंतु यह केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र लिम्फतंत्र , संचार तंत्र, मूत्रजनन तंत्र, अस्थि, जोड़ ,यहाँ तक कि त्वचा को भी प्रभावित करता है कुछ अन्य प्रकार के जीवाणु जो यह रोग पैदा कर सकतें है वे है माइक्रोबैकटीरियम बोविस, मा-अफ्रीकनम, मा-कैनेटी, मा-मिक्रोटी किंतु ये प्रजातिय़ाँ आमतौर पर किसी स्वस्थय वयस्क को प्रभावित नहीं करती है।

विश्व की एक तिहाई आबादी के शरीर में इस रोग का संक्रमण पाया जाता है प्रति 1 सैकेण्ड मे 1 नया संक्रमण भी होता है, किंतु प्रत्येक संक्रमित व्यक्ति इस रोग से ग्रस्त नहीं होता है इसके छिपे संक्रमण से ग्रस्त 10 में से 1 को रोग शुरू हो जाता है यदि इसका इलाज नहीं मिले तो आधे रोगी काल का ग्रास बन जाते है।

TB poster.jpg

2004 में 14.6 मिलियन सक्रिय मामलें थे जहाँ रोग गंभीर दशा में चला गया था,8.9मिलियन नये मामलें सामनें आये थे तथा 1.6 मिलियन मौतें हुई थी ये ज्यादातर विकासशील देशों मे हुई थी। विकसित देशों से भी यह रोग पूर्णत गायब नहीं हुआ है वहाँ लोगों का प्रतिरक्षा तंत्र दुर्बल हो गया है क्योंकि वे लोग प्रतिरक्षा तंत्र शमनकारी औषधि लेते है नशीले पदार्थों के सेवन से तथा एडस इसके सबसे बडें कारण है एच.आई.वी. संक्रमण बढजाने से तथा टी.बी. नियंत्रण कार्यक्रम के दुर्बम हो जाने से यह रोग फिर से उभर गया है। इसके अलावा दवाप्रतिरोधी तपेदिक के उभार से महामारी की तरह यह रोग फैल रहा है। 2000 से 2004 के मध्य 20% टी.बी. मामलों में जीवाणु मानक उपचार के प्रति सहनशील हो गया था जबकि 2% मामलों मे यह द्वितीय पंक्ति की औषधियों के प्रति भी प्रतिरक्षा रखने लगा था। टी.बी. के मामलें किसी देश के स्वास्थ्य सेवा की दशा दिखातें है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मतानुसार 1993 से यह रोग विश्व भर मे आपातकालीन स्वास्थ्य समस्या बन चुका है,वर्ष 2006 से 2015 के मध्य 14 मिलियन जीवन बचाने की कार्ययोजना भी तैयार कर ली गयी है।

अनुक्रम

[संपादित करें] टीका द्वारा रक्षा की विधि

क्षयनिरोधक टीके (B.C.G.) का सर्वप्रथम प्रयोग १९१२ में वाइल हेली (Weil Helle) द्वारा किया गया था। अब वह समस्त विश्व में क्षयनाश का सार्थक साधन माना जाता है। टीके का वैक्सीन गाय-बैलों की गुलिकार्ति के दंडाणुओं का तनु प्रभेद है। यह यक्ष्मा उत्पन्न करने में असमर्थ होता है। यह उन्हीं लोगों को दिया जा सकता है जिनका गुलिकार्ति दंडाणुओं से रोगसंक्रमण नहीं हुआ है, क्योंकि हमारा ध्येय गुलिकार्ति दंडाणुओं के अनेक संभाव्य आपत्तियों से भरे प्राकृतिक संक्रमण के स्थान पर ऐसे बीजाणुओ का प्रवेश कराना है तो प्रतिरक्षा को तो विकसित होने देते हैं, किंतु कोई जटिलता नहीं उत्पन्न करते। अनेक राष्ट्रों, जैसे रूस, चेकोस्लोवेकिया, फिनलैंड तथा नॉर्वे में क्षयनिरोधक टीका लगवाना विधान द्वारा अनिवार्य कर दिया गया है। यह या तो शिशुओं को दूध में पिलाया जा सकता है या अंत: त्वचीय (intrautaneous) सुइयों द्वारा शरीर में प्रविष्ट किया जा सकता है। अंतिम विधि का प्रयोग अधिकतर होता है।

शाद्वलमूष दंडाणु वैक्सीन (Vole Bacillus Vaccine) के प्रयोग का प्रारंभ डा. ए. क्यू. वेल्स द्वारा किया गया था। इन्होंने सन्‌ १९३७ में शाद्वलमूष दंडाणुओं का आविष्कार किया था। डा. वेल्स का दावा था कि शाद्वलमूष दंडाणु क्षयनिरोधक टीके से श्रेयस्कर है, क्योंकि क्षयनिरोधक टीके के विपरीत ये प्राकृतिक रूप में पाए जाते हैं और मनुष्यों को हानि नहीं पहँचाते। किंतु अभी इंग्लैंड, अफ्रीका और प्राग में इनकी परीक्षा की जा रही है।

[संपादित करें] रसायनी रोगनिरोधन

नियमित अंतराल के पश्चात ओषधि की अल्प मात्राएँ लेते रहकर रोगसंक्रमण का निरोध करने की धारणा नवीन नहीं है। मलेरिया ज्वर का आना कुनैन (Quinine) इत्यादि ओषधियों की नियमित मात्रा के सेवन से रोका गया है। ब्लॉक (Bloch) एवं सेगल (सन्‌ १९५५) तथा फार्बी एवं पामर (सन्‌ १९५६) के अन्वेषणों ने इसी प्रकार के प्रतिकारकों का यक्ष्मा में भी प्रयोग करने की उत्तेजना दी है।

[संपादित करें] सामान्य उपाय

क्षय अवश्यमेव सूचनीय रोग माना जाना चाहिए। क्षय के किसी रोगी का पता चलने पर यह ज्ञात करना अनिवार्य हो जाना चाहिए कि उसे रोग का संक्रमण कहाँ से हुआ और स्वयं इस रोगी ने अन्य कितने लोगों को रोगसंक्रमित किया है। क्षयनिरोध के लिये संपर्कपरीक्षा विद्यालय के भिषगों (डाक्टरों) द्वारा विद्यालयों का निरीक्षण नियमित रूप से अवश्य करना चाहिए। दूध का भी पूर्वपरीक्षण किया जाना चाहिए। यदि दूध को उबालकर पीने के अभ्यास को सर्वमान्य किया जा सके तो यह अत्युत्तम होगा।

[संपादित करें] क्षय-निरोध योजना

१९वीं शताब्दी के अंत में सर रॉबर्ट फ़िलिप ने इंग्लैंड में निम्नलिखित क्षय-निरोध-योजना संगठित की है। संपूर्ण दल में निम्नलिखित अंश होते हैं:

१. वक्ष निदानगृह,

२. क्षय चिकित्सालय,

३. क्षय आरोग्यशाला,

४. पुन: स्थापना केंद्र तथा

५. क्षय शरणालय।

[संपादित करें] वक्ष निदानगृहों के कार्य

१. गृह की परिपार्श्विक अवस्थाओं का पर्यवेक्षण,

२. आरब्धमान्‌ रोगियो का अन्वेषण,

३. अन्य संस्थाओं के रोगियों का अन्वेषण,

४. वास्तविक रोगिगयों का उपचार,

५. संपर्कपरीक्षा तथा

६. क्षयनिरोधक टीके का देना।

[संपादित करें] क्षय अस्पताल

इनमें क्षय के केवल उन्हीं रोगियों को भर्ती किया जाता है जिनका रोग या तो निष्क्रिय किया जा सकता है, या रसायन चिकित्सा अथवा शल्य प्रणाली से दूर किया जा सकता है। प्रत्यक्ष है कि ऐसे अस्पतालों में आधुनिकतम शल्य प्रणाली का प्रयोग करने की सुविधाएँ होनी चाहिए। इन अस्पतालों में रोगियो का वासकाल न्यूनतम होना चाहिए जिससे अन्य रोगियों को भी चिकित्सा का अवसर प्राप्त हो सके।

[संपादित करें] क्षय आरोग्यशाला

ये निवासगृह ऐसी संस्थाएँ हैं जहाँ रोगियों का केवल उपचार ही नहीं होता वरन्‌ उन्हें समाज और जीवन में स्वावलंबी होकर पुन: प्रतिस्थपित होने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

[संपादित करें] पुन: प्रतिस्थापन केंद्र

इनमें भूतपूर्व रोगियों को उद्योग की विभिन्न शाखाओं में प्रशिक्षित किया जाता है, जिससे वे अच्छी नौकरियाँ प्राप्त करने के योग्य हो जायँ।

[संपादित करें] क्षय शरणालय

इनमें क्षय के ऐसे रोगी रखे जाते हैं जो नीरोग नहीं किए जा सकते और जिन्हें अपने घरों में रहने देने से रोग अन्य लोगों को फैलता ही जाता है। इन रोगियों का न्यूनतम उपचार किया जाता है और ये मृत्युपर्यंत यहां रहते हैं।

[संपादित करें] प्राचीन भारत में क्षय रोग

वेदों के प्रकाश में आने के पहले से ही संभवत: भारत में क्षय रोग विद्यमान था, क्योंकि ऋग्वेद में क्षय का ही राजयक्ष्मा के नाम से वर्णन आता है। ऐसा विश्वास किया जाता था कि यह रोग देवताओं की ओर से उदासीन रहने के फलस्वरूप उनके प्रकोप का फल होता था।

आयुर्वेद के जनक सुश्रुत ने क्षय के लक्षणों के विषय में विस्तार से लिखा है। रोगलक्षण, फलानुमान तथा उपचार का उनके ग्रंथ में दिया गया परिशुद्ध वर्णन विस्मयकारी है। उनका विश्वास था कि यह रोग वायु पित्त तथा कफ के विक्षोभ के कारण होता है।

[संपादित करें] इन्हें भी देखें

[संपादित करें] संदर्भ

[संपादित करें] बाहरी कडियाँ

वैयक्तिक औज़ार
नामस्थान

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