कुष्ठ

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कुष्टरोग से ग्रसित एक व्यक्ति

कोढ या कुष्टरोग (लिप्रोसी) या हन्सेन रोग (Hansen's disease) एक जीर्ण रोग है जो माइकोबैक्टिरिअम लेप्राई (Mycobacterium leprae) नामक जीवाणु (बैक्टिरिया) के कारण होता है। यह मुख्‍य रुप से मानव त्‍वचा, ऊपरी श्‍वसन पथ की श्‍लेष्मिका, परिधीय तंत्रिकाओं, आंखों और शरीर के कुछ अन्‍य क्षेत्रों को प्रभावित करता है। यह न तो वंशागत है और न ही दैवीय प्रकोप बल्कि यह एक रोगाणु से होता है। समान्यत त्‍वचा पर पाये जाने वाले पीले या ताम्र रंग के धब्‍बे जो सुन्‍न हों या रंग तथा गठन में परिवर्तन दिखाई दे, तो यह कुष्‍ठ रोग के लक्षण हो सकते हैं। यह रोग छूत से नहीं फैलता।

परिचय[संपादित करें]

कुष्ट की गणना संसार के प्राचीनतम ज्ञात रोगों में की जाती है। इसका उल्लेख चरक और सुश्रुत ने अपने ग्रंथों में किया है। उत्तर साइबेरिया का छोड़कर संसार का कोई भाग ऐसा नहीं था जहाँ यह रोग न रहा हो। किंतु अब ठंडे जलवायु वाले प्राय: सभी देशों से इस रोग का उन्मूलन किया जा चुका है। यह अब अधिकाशंत: कर्क रेखा (Tropic of Cancer) से लगे गर्म देशों के उत्तरी और दक्षिणी पट्टी में ही सीमित है और उत्तरी भाग की अपेक्षा दक्षिणी भाग में अधिक है। भारत, अफ्रीका और दक्षिणी अमरीका में यह रोग अधिक व्यापक है। भारत में यह रोग उत्तर की अपेक्षा दक्षिण में अधिक है। उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और दक्षिण महाराष्ट्र में यह क्षेत्रीय रोग सरीखा है। उत्तर भारत में यह हिमालय की तराई में ही अधिक देखने में आता है।

विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में कुष्टरोग

यह रोग संक्रामक है। यह रोग सामान्यत: गंदगी में रहनेवाले और समुचित भोजन के अभाव से ग्रस्त लोगों में ही होता है; किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि स्वच्छ और समृद्धिपूर्ण जीवन बितानेवाले वकील, व्यापारी, अध्यापक आदि इस रोग से सर्वथा मुक्त है। वे लोग भी इस रोग से ग्रसित पाए जाते हैं।

इस रोग का कारण 'माइक्रो बैक्टीरयिम लेप्रे' नामक जीवाणु (बैक्टीरिया) का त्वचा में प्रवेश समझा जाता है। इन जीवाणुओं की खोज लगभग सौ वर्ष पूर्व हैनसेन नामक एक नार्वेजियन ने डेनमार्क के एक अनुसंधानशाला में की थी। इस अनुसंधान के फलस्वरूप आगे चलकर यह बात ज्ञात हुई कि ये जीवाणु क्षयरोग के जीवाणु की जाति के हैं और जो औषधियाँ क्षयरोग की चिकित्सा में सफल हैं, उनमें से अधिकांश इस रोग के जीवाणुओं को भी नष्ट करने में सक्षम हैं। किंतु यह जीवाणु किस प्रकार शरीर में प्रवेश करते हैं, अभी स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं हो पाया है। इस समय इस बात के जानने की चेष्टा की जा रही है कि कहीं ये जीवाणु भोजन अथवा साँस के साथ तो शरीर में प्रवेश नहीं करते। इनका प्रवेश जिस प्रकार भी होता है, बच्चों में इसका संक्रमण अधिक होता है और बहुधा रोगग्रस्त के दीर्घकालिक संसर्ग से ही इसका संक्रमण होता है।

आयुर्वेद के अनुसार कुष्ट चौदह प्रकार के कहे गए हैं और उसके अंतर्गत त्वचा के श्वेत रूप धारण करने को भी कुष्ट कहा गया है। किंतु आधुनिक विज्ञान उसे कुष्ट से भिन्न मानता है।

प्रकार[संपादित करें]

कुष्ट सामान्यत: तीन प्रकार का ही होता है।

  • तंत्रिका कुष्ट (Nerve leprosy)-इसमें शरीर के एक अथवा अनेक अवयवों की संवेदनशीलता समाप्त हो जाती है। सुई चुभोने पर भी मनुष्य किसी प्रकार का कोई कष्ट अनुभव नहीं करता।
  • ग्रंथि कुष्ट (Lapromatus leprosy)-इसमें शरीर के किसी भी भाग में त्वचा से भिन्न रंग के धब्बे या चकत्ते पड़ जाते हैं अथवा शरीर में गाँठे निकल आती है।
  • मिश्रित कुष्ट-इसमें शरीर के अवयवों की संवेदनशीलता समाप्त होने के साथ-साथ त्वचा में चकत्ते भी पड़ते हैं और गाँठे भी निकलती हैं।

संक्रमण[संपादित करें]

इस रोग का संक्रमण किसी रोगी पर कब और किस प्रकार हुआ, इसका निर्णय कर सकना संप्रति असंभव है। अन्य रोगों की तरह इसके संक्रमण का तत्काल विस्फोट नहीं करता। उसको गति इतनी मंद होती है। कि संक्रमण के दो से पाँच वर्ष बाद ही रोग के लक्ष्ण उभरते हैं और तब शरीर का कोई भाग संवेदनहीन हो जाता है अथवा त्वचा पर चकत्ते निकलते हैं या कान के पास अथवा शरीर के किसी अन्य भाग में गाँठ पड़ जाती है। इससे रोगी को तत्काल किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं होता। फलत: लोग इसकी ओर तत्काल ध्यान नहीं देते। रोग उभरने के बाद भी वह अत्यंत मंद गति से बढ़ता है और पूर्ण रूप धारण करने में उसे चार-पाँच बरस और लग जाते है। रोग के विकसित हो जाने के बाद भी रोगी सामान्यत: अपने को इस रोग से ग्रसित होने की कल्पना नहीं कर पाता। वह इस अवस्था में आलस्य, थकान, कार्य करने की क्षमता में कमी, गर्मी और धूप बर्दाश्त न हो सकने की ही शिकायत करता है। जब यह रोग और अधिक बढ़ता है तो धीरे-धीरे मांसमज्जा क्षय (ड्राइ अव्सार्वशन) होने लगता है। जब वह हड्डी तक पहुँच जाता है तो हड्डी भी गलने लगती है और वह गलित कुष्ट का रूप धारण कर लेता है। कभी जब संवेदना शून्य स्थान में कोई चोट लग जाती है अथवा किसी प्रकार कट जाता है तो मनुष्य उसका अनुभव नहीं कर पाता; इस प्रकार वह उपेक्षित रह जाता है। इस प्रकार अनजाने ही वह व्रण का रूप धारण कर लेता है जो कालांतर में गलित कुष्ट में परिवर्तित हो जाता है।

चिकित्सा[संपादित करें]

इस रोग के संबंध में लोगों में यह गलत धारणा है कि यह असाध्य है। गलित कुष्ट की वीभत्सता से समाज इतना आक्रांत है कि लोग कुष्ट के रोगी को घृणा की दृष्टि से देखते हैं और उसकी समुचित चिकित्सा नहीं की जाती और उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है। वास्तविकता यह है कि कुष्ट रोग से कहीं अधिक भयानक यक्ष्मा, हैजा और डिप्थीरिया हैं। यदि लक्षण प्रकट होते ही कुष्ट रोग का उपचार आरंभ कर दिया जाए तो इस रोग से मुक्त होना निश्चित है। मनुष्य स्वस्थ होकर अपना सारा कार्य पूर्ववत् कर सकता है।

इस प्रकार कुष्ट रोग होने के साथ-साथ एक सामाजिक समस्या भी है। उपेक्षित रोगी जीवन से निराश होकर प्राय: वाराणसी आदि तीर्थों एवं अन्य स्थानों पर चले जाते हैं जहाँ उन्हें रहने को स्थान और खाने को भोजन आसानी से मिल जाता है। वहाँ के भिक्षुक बनकर घूमते हैं। अत: चिकित्सा व्यवस्था के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि समाज में कुष्ट के रोगी के प्रति घृणा के भाव दूर हों।

आयुर्वेद में कुष्ट रोग की चिकित्सा के लिये मुख्यत: खदिर और बाबची का उपयोग होता है। सुश्रुत में इसके लिए भल्लक तेल का उपयोग बताया गया है। चालमोगरा का तेल खाने और लगाने का भी विधान है। चालमोगरा के तेल का प्रयोग इस रोग में आधुनिक चिकित्सक भी करते हैं। इथाइल, एस्टर, प्रोमीन, सल्फ्रटोन, आइसोनेक्स और स्ट्रेप्टोमाइसीन इस रोग की मुख्य औषधियाँ हैं।

रोकथाम[संपादित करें]

रिफैम्पीसीन (rifampicin) की केवल एक खुराक लेने से संसर्गजन्य कुष्टरोग में ५७% से लेकर ७५% तक की कमी हो जाती है। इसी तरह बीसीजी का टिका लगाने से भी कुष्ट रोग से सुरक्षा प्राप्त होती है।

वाह्य सूत्र[संपादित करें]

इतिहास
शोध