डोरिस लेसिंग
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डोरिस लेसिंग |
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| जन्म: | 22 अक्तूबर, 1919 [[]], [[]], [[]] |
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| कार्यक्षेत्र: | |
| राष्ट्रीयता: | ब्रिटिश |
| भाषा: | अंग्रेज़ी |
| काल: | [[]] |
| विधा: | उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक, एकांकी इत्यादि |
| पहली कृति: | उपन्यास- द ग्रास इज़ सिंगिंग |
प्रसिद्ध ब्रितानी लेखिका डोरिस लेसिंग को २००७ का साहित्य का नोबल पुरस्कार दिया गया है। उन्हें यह पुरस्कार अपने पांच दशक लंबे रचनाकाल के लिए दिया गया। महिला, राजनीति और अफ्रीका में बिताए यौवनकाल उनके लेखन के प्रमुख विषय रहे। इसी वर्ष 88 साल की होने जा रहीं लेसिंग 1901 से प्रारंभ इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाली केवल 11 वीं महिला लेखिका है।
[संपादित करें] जीवन परिचय
डोरिस लेसिंग का जन्म पर्शिया(आज के ईरान) में 22 अक्तूबर 1919 को हुआ। इनकी माता-पिता दोनों ब्रिटिश थे। पिता पर्शिया के इम्पीरियल बैंक में क्लर्क व माँ एक नर्स थीं। 1925 में परिवार (आज के) जिम्बाब्वे में स्थानांतरित हो गया। जिन सपनों को लेकर वे यहाँ आए थे- वे चकनाचूर हो गए। लेसिंग के अनुसार उनका बचपन सुख व दु:ख की छाया था,जिसमें सुख कम व पीड़ा का अंश ही अधिक रहा। अपने भाई हैरी के साथ प्राकृतिक जगत् के रहस्यों को बूझने में लगी लेसिंग को अनुशासन, घरेलू साफ़- सफ़ाई व घरेलू तथा सामान्य लड़की बनाने आदि के प्रति माँ बहुत सतर्क व कठोर रहीं। 13 वर्ष की आयु में लेसिंग की विधिवत् शिक्षा का अंत हो गया । किंतु ये अन्य दक्षिण अफ़्रीकी लेखिकाओं की भाँति न रह कर शिक्षा से वहीं विरत न हो गईं अपितु स्वयम् ही शिक्षार्जन की दिशा में बढ़ती रहीं । अभी पिछले दिनों दिए इनके एक वक्तव्य के अनुसार--" दु:खी बचपन 'फ़िक्शन"(लेखन) का जनक होता है, मेरे विचार से यह बात सोलह आने सही है" ।
इनके 2 विवाह हुए। पहला 1939 में फ़्रैन्क विज़डम से, जिससे इन्हें 2 बच्चे हुए। किन्तु यह सम्बंध 4 वर्ष ही रहा और 1943 में तलाक हो गया। दूसरा विवाह एक जर्मन राजनैतिक कार्यकर्ता गॉटफ्रीड लेसिंग से किया जिसकी परिणति भी 1949 में तलाक के रूप में हुई। इस विवाह से हुए एकमात्र बेटे को लेकर ये ब्रिटेन आ गई थीं। ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य रह चुकी डोरिस ने हंगरी पर रूसी आक्रमण से व कार्यप्रणाली व नीतियों से क्षुब्ध होकर 1954 में पार्टी ही छोड़ दी ।
अपने आरम्भिक दिनों में लेसिंग ने डिकेंस, स्कॊट,स्टीवेन्सन, किपलिंग, डी.ऎच. लोरेन्स, स्टेन्थॊल, टॊल्स्टॊय, डास्टाव्स्की आदि को जी भर पढ़ा। अपने लेखकीय व्यक्तित्व में माँ की सुनाई परीकथाओं की बड़ी भूमिका को डोरिस रेखांकित करती हैं। प्रथम विश्वयुद्ध में अपंग हो चुके पिता की स्मृतियाँ उन्हें अभी भी आती हैं। 15 वर्ष की आयु में घर से दूर घरेलू-नर्स की नौकरी अपनाने के बाद गृहस्वामी द्वारा उपलब्ध कराई गई राजनीति व समाजशास्त्र की पुस्तकें पढ़तीं।
19 वर्ष की आयु में 1937 में सैलिस्बरी आने पर टेलीफ़ोन ऒपरेटर के रूप में भी इन्होंने कार्य किया। यहीं उनका पहला व दूसरा विवाह हुआ। पश्चात् दूसरे विवाह से हुए बेटे के साथ 1949 में लंदन चली गईं। इसी वर्ष पहला उपन्यास " द सिंगिंग ग्रास " प्रकाशित हुआ और यहीं से विधिवत् इनके लेखकीय 'करियर' की शुरुआत हुई।
[संपादित करें] साहित्यिक जीवन
इनका साहित्य अधिकांश अपने अफ़्रीका के जीवनानुभवों से जुड़ा है, जिसमें बचपन की स्मृतियाँ, राजनीति से जुड़ाव व समाज-संलग्नता ही अधिकाँश है। साँस्कृतिक टकराव, जड़ों में जमा अन्याय, वर्णभेद, आत्मद्रोह, आत्मद्वन्द्व की स्थितियाँ इनके साहित्य में बहुतायत से हैं। दक्षिण अफ़्रीका में श्वेत उपनिवेशवाद के प्रति असहमत लेखन के कारण 1956 में इन्हें वर्जित लेखक तक घोषित कर दिया गया।
उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक, एकाँकी, आदि विधाओं के अतिरिक्त भी इन्होंने लिखा है। "अडर माई स्किन:वोल्यूम वन ऒफ़ माई आटोबॊयोग्राफ़ी टू1949" (1995 में प्रकाशित) के लिए इन्हें 'जेम्स टैईट ब्लैक प्राईज़' से सम्मानित किया गया।
1995 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने इन्हें ऒनरेरी डिग्री प्रदान की। इसी वर्ष ये 40 वर्ष बाद पुन: दक्षिणी अफ़्रीका गईं और बेटी व नाते - पोतियों से मिलीं। 40 वर्ष पूर्व जिस लेखन के लिए इन्हें प्रतिबन्धित व निष्कासित किया गया था, उसी लेखन के कारण इस बार इनका वहाँ गर्मजोशी से स्वागत-सत्कार किया गया ।
1954 से 2005 तक देश विदेश में अपने साहित्य व लेखन पर मिले अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों व पुरस्कारों की श्रॄंखला में 2007 का 'नोबेल' साहित्य पुरस्कार इस वर्ष इन्हें मिला है। इनका नवीनतम उपन्यास है - " द क्लेफ्ट" | जिसका कथानक समुद्र के किनारे रहने वाले स्त्री-समुदाय ‘क्लेफ़्ट’ पर केन्द्रित है। यह समुद्र के तटों पर रहने वाली महिलाओं का अतिप्राचीन समुदाय ऐसा है, जिसे पुरुषों के अस्तित्व के विषय तक में कुछ ज्ञात नहीं। ये सदा से बिना पुरुषों के रहती आने वाली प्रजाति है, जिनका प्रजनन भी चंद्रमा की गति से संचालित होता है, इन्हें कभी पुरुषों की आवश्यकता तक नहीं अनुभव हुई होती। इस समुदाय में उत्पन्न होने वाली सभी सन्तानें भी लड़कियाँ ही होती हैं। किन्तु अकस्मात् एक दिन एक महिला एक विचित्र शिशु को जनमती है, जिसे देखकर पूरे समुदाय में अचम्भा व घबराहट भर जाती है। यह शिशु एक लड़का होता है। इस समुदाय के जीवन की खोज व उन तक पहुँचने का कार्य, मानव-उत्पत्ति के रहस्यों की खोज मे लगे एक रोमन सीनेटर से जुड़ा है, जो जीवन के अन्तिम चरण में बड़े जुगुप्सा भाव से अपने मानवजाति की उत्पत्ति के कारणों व रहस्यों पर जानकारियाँ जुटाने व उन्हें हल कर लेने की अपनी जिद में लगा है। इस पुरुष- सन्तान के जन्म से ऐसी स्थितियाँ बनती हैं कि पूरा समुदाय समुदाय- भावना से विरत हो जाता है, सामंजस्य टूट- बिखर जाता है व आगे का सामजिक जीवन तक इस एक घटना के परिणामों को भुगतता है।
आज भी वे निरन्तर जागरूकता से लिख रही हैं व इतना ही नहीं वे अपने ब्लॊग http://www.myspace.com/dorislessing पर भी लोगों से लगातार सम्वाद में हैं।

