जैव सूचना विज्ञान

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मानव X गुणसूत्र का चित्रण (एन सी बी आई वेबसाइट से); मानव जीनोम का चित्रण जैवप्रौद्योगिकी की सबसे बड़ी उपलब्धि है
इन्फ्लुएन्जा के विषाणु का प्रारूप (मॉडल)

जैवसूचनाविज्ञान (Bioinformatics) जीव विज्ञान की एक शाखा है। बायोइंफॉर्मैटिक्स या जैव सूचना विज्ञान, जीव विज्ञान का एक नया क्षेत्र है, जिसके अन्तर्गत जैव सूचना का अर्जन, भंडारण, संसाधन, विश्लेषण, वितरण, व्याख्याआदि कार्य आते हैं। इस कार्य में जीव विज्ञान, सूचना तकनीक तथा गणित की तकनीकें उपयोग में लाई जातीं हैं।

अपेक्षित साधन[संपादित करें]

बायोइन्फॉर्मैटिक्स में निम्न साधन अपेक्षित हैं:

  1. कम्प्यूटर एवं अन्य हार्ड्वेयर
  2. इंटरनेट कनेक्शन
  3. वर्ल्ड-वाइड-वेब
  4. डाटाबेस
  5. उपयुक्त सॉफ्टवेयर

कुछ महत्वपूर्ण डाटाबेस[संपादित करें]

इनमें तीन प्रमुख होते हैं:

  1. न्यूक्लिक अम्ल अनुक्रम डाटाबेस
  • ई.एम.बी.एल. न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम डाटाबेस
  • एन.सी.बी.आई. जीन बैंक
  • डी.डी.बी.जे.
  1. प्रोटीन अनुक्रम डाटाबेस
  • स्विस प्रोट
  • पी.आई.आर.
  • एम.आई.पी.एस
  1. प्रोटीन संरचना का डाटाबेस
  • प्रोटीन डाटाबेस

कुछ महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर[संपादित करें]

इंटरनेट के अलग अलग सर्वर्स पर बायोइन्फॉर्मैटिक्स से संबंधित बहुत से सॉप्टवेयर उपलब्ध हैं। इनमें से प्रमुख हैं:-

  • डाटाबेस सर्च
  1. डब्ल्यू ए आई एस
  2. एस एफ़ गेट
  3. गैट एन्ट्री
  4. पब मिड
  5. एंट्रेज़ज़
  • होमोलॉजी सर्च
  1. ब्लास्ट
  2. फ़स्टा
  3. स्मिथ-वॉटरमैन
  • सीक्वेंस एनालिसिस
  1. डी एन ए टु ए.ए.
  2. प्रोस्कैन
  3. सिग्नल स्चन
  4. एस.एस.पी.एन
  5. जीन फ़ीचर
  6. ओ.आर.एफ़. फ़ाइंडर
  7. टी.एफ़. सर्च
  8. मोटिफ़
  9. ब्लॉक
  10. एम.ई.एम.ई
  11. क्लस्ट ए.एल.डब्ल्यू
  • प्रिडिक्ल्शन ऑफ़ सैकिंडरी स्ट्रक्चर
  1. सैकिण्ड स्ट्रक्चर
  2. प्रिडिक्शन प्रिडिक्ट प्रोटीन

आशाएं[संपादित करें]

बायोइन्फ़ॉर्मैटिक्स ने जैविकी के क्षेत्र में शोध करने के तरीके को ही बदल दिया है। प्रयोगात्मक उपमार्ग के बजाय अब किसी भी शोध का प्रारंभ कम्प्यूटर पर उपलब्ध डाटाबेसेज़ की उपयुक्त सॉफ़्टवेयर द्वारा तलाश एवं तुलना से होता है। किसी वैज्ञानिक द्वारा एक जीन के बेस अनुक्रम को प्राप्त कर लेने के पश्चात, उसकी किसी डाटाबेस पर पहले से विद्यमान किसी अनुक्रम से तुलना की जा सकती है। दोनों अनुक्रमों में कितनी समानता है, इस आधार पर नए जीन की कार्यशैली या उत्पत्ति पर प्रकाश डाला जा सकता है। इससे निम्न क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन की आशाएं हैं:-

  1. किसी जानलेवा बीमारी के लिए उत्तरदायी जीन-समूह का पता लगाना।
  2. औषधि निर्माण के लिए एक लक्ष्य को निर्धारित करना।
  3. उस लक्ष्य को हिट करने के लिए उपयुक्त अणुओं (लिंगेड्स) का डिज़ाइन तैयार करना।
  4. एक उपयुक्त औषधि को उसके वैध प्राप्तकर्ता तक आसानी तथ शीघ्रता से पहुंचाना।
  5. किसी पौधे के जीन में इस प्रकार से परिवर्तन करना कि पुनर्योजी प्रोटीन का उपयोग मानव कल्याण में हो सके।

संदर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]