५ सितंबर

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2017

५ सितंबर ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का २४८वॉ (लीप वर्ष मे २४९वॉ) दिन है। साल मे अभी और ११७ दिन बाकी है।


प्रमुख घटनाएँ[संपादित करें]


    • इतिहास-स्मृति
  • पर्यावरण संरक्षण हेतु अनुपम बलिदान*

प्रतिवर्ष पांच जून को हम ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ मनाते हैं; लेकिन यह दिन हमारे मन में सच्ची प्रेरणा नहीं जगा पाता। क्योंकि इसके साथ इतिहास की कोई प्रेरक घटना के नहीं जुड़ी। इस दिन कुछ जुलूस, धरने, प्रदर्शन, भाषण तो होते हैं; पर उससे सामान्य लोगों के मन पर कोई असर नहीं होता। दूसरी ओर भारत के इतिहास में पाँच सितम्बर, 1730 को एक ऐसी घटना घटी है, जिसकी विश्व में कोई तुलना नहीं की जा सकती।

राजस्थान तथा भारत के अनेक अन्य क्षेत्रों में बिश्नोई समुदाय के लोग रहते हैं। उनके गुरु जम्भेश्वर जी ने अपने अनुयायियों को हरे पेड़ न काटने, पशु-पक्षियों को न मारने तथा जल गन्दा न करने जैसे 29 नियम दिये थे। इन 20 + 9 नियमों के कारण उनके शिष्य बिश्नोई कहलाते हैं।

पर्यावरण प्रेमी होने के कारण इनके गाँवों में पशु-पक्षी निर्भयता से विचरण करते हैं। 1730 में इन पर्यावरण-प्रेमियों के सम्मुख परीक्षा की वह महत्वपूर्ण घड़ी आयी थी, जिसमें उत्तीर्ण होकर इन्होंने विश्व-इतिहास में स्वयं को अमर कर लिया।

1730 ई. में जोधपुर नरेश अजय सिंह को अपने महल में निर्माण कार्य के लिए चूना और उसे पकाने के लिए ईंधन की आवश्यकता पड़ी। उनके आदेश पर सैनिकों के साथ सैकड़ों लकड़हारे निकटवर्ती गाँव खेजड़ली में शमी वृक्षों को काटने चल दिये।

जैसे ही यह समाचार उस क्षेत्र में रहने वाले बिश्नोइयों को मिला, वे इसका विरोध करने लगेे। जब सैनिक नहीं माने, तो एक साहसी महिला ‘इमरती देवी’ के नेतृत्व में सैकड़ों ग्रामवासी; जिनमें बच्चे और बड़े, स्त्री और पुरुष सब शामिल थे; पेड़ों से लिपट गये। उन्होंने सैनिकों को बता दिया कि उनकी देह के कटने के बाद ही कोई हरा पेड़ कट पायेगा।

सैनिकों पर भला इन बातों का क्या असर होना था ? वे राजज्ञा से बँधे थे, तो ग्रामवासी धर्माज्ञा से। अतः वृक्षों के साथ ही ग्रामवासियों के अंग भी कटकर धरती पर गिरने लगे। सबसे पहले वीरांगना ‘इमरती देवी’ पर ही कुल्हाड़ियों के निर्मम प्रहार हुए और वह वृक्ष-रक्षा के लिए प्राण देने वाली विश्व की पहली महिला बन गयी।

इस बलिदान से उत्साहित ग्रामवासी पूरी ताकत से पेड़ों से चिपक गये। 20वीं शती में गढ़वाल (उत्तराखंड) में गौरा देवी, चण्डीप्रसाद भट्ट तथा सुन्दरलाल बहुगुणा ने वृक्षों के संरक्षण के लिए ‘चिपको आन्दोलन’ चलाया, उसकी प्रेरणास्रोत इमरती देवी ही थीं।

भाद्रपद शुक्ल 10 (5 सितम्बर, 1730) को प्रारम्भ हुआ यह बलिदान-पर्व 27 दिन तक चलता रहा। इस दौरान 363 लोगों ने बलिदान दिया। इनमें इमरती देवी की तीनों पुत्रियों सहित 69 महिलाएँ भी थीं। अन्ततः राजा ने स्वयं आकर क्षमा माँगी और हरे पेड़ों को काटने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। ग्रामवासियों को उससे कोई बैर तो था नहीं, उन्होंने राजा को क्षमा कर दिया।

उस ऐतिहासिक घटना की याद में आज भी वहाँ ‘भाद्रपद शुक्ल 10’ को बड़ा मेला लगता है। राजस्थान शासन ने वन, वन्य जीव तथा पर्यावरण-रक्षा हेतु ‘अमृता देवी बिश्नोई स्मृति पुरस्कार’ तथा केन्द्र शासन ने ‘अमृता देवी बिश्नोई पुरस्कार’ देना प्रारम्भ किया है। यह बलिदान विश्व इतिहास की अनुपम घटना है। इसलिए यही तिथि (भाद्रपद शुक्ल 10 या पाँच सितम्बर) वास्तविक ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ होने योग्य है। .......................... http://hardinpavan.blogspot.in/search/label/33%20-%20सितम्बर%20पहला%20सप्ताह?m=0

जन्म[संपादित करें]


    • जन्म-दिवस
  • भीलों के देवता मामा बालेश्वर दयाल*

भारत एक विशाल देश है। यहाँ सब ओर विविधता दिखाई देती है। शहर से लेकर गाँव, पर्वत, वन और गुफाओं तक में लोग निवास करते हैं। मध्य प्रदेश और गुजरात की सीमा पर बड़ी संख्या में भील जनजाति के लोग बसे हैं। श्री बालेश्वर दयाल (मामा) ने अपने सेवा एवं समर्पण से महाराणा प्रताप के वीर सैनिकों के इन वशंजों के बीच में देवता जैसी प्रतिष्ठा अर्जित की।

मामा जी का जन्म पाँच सितम्बर, 1906 को ग्राम नेवाड़ी (जिला इटावा, उ.प्र.) में हुआ था। सेवा कार्य में रुचि होने के कारण नियति उन्हें मध्य प्रदेश ले आयी और फिर जीवन भर वे भीलों के बीच काम करते रहे। 1937 में उन्होंने झाबुआ जिले में ‘बामनिया आश्रम’ की नींव रखी तथा भीलों में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने में जुट गये। इससे तत्कालीन जमींदार, महाजन और राजा उनसे नाराज हो गये और उन्हें जेल में बन्द कर दिया; पर वहाँ की यातनाओं को सहते हुए उनके संकल्प और दृढ़ हो गये।

कुछ समय बाद एक सेठ ने उनसे प्रभावित होकर ‘थान्दला’ में उन्हें अपने मकान की ऊपरी मंजिल बिना किराये के दे दी। यहाँ मामा जी ने छात्रावास बनाया। धीरे-धीरे स्थानीय लोगों में विश्वास जागने लगा। 1937 के भीषण अकाल के बाद ईसाई मिशनरी वहाँ राहत कार्य हेतु आये; पर उनकी रुचि सेवा में कम और धर्मान्तरण में अधिक थी। यह देखकर मामा जी ने पुरी के शंकराचार्य की लिखित सहमति से भीलों को क्रॉस के बदले जनेऊ दिलवाया। कुछ रूढ़िवादी हिन्दू संस्थाओं ने इसका विरोध किया; पर मामा जी उस क्षेत्र की वास्तविक स्थिति को अच्छी तरह जानते थे। अतः वे इस कार्य में लगे रहे। इससे वहाँ धर्मान्तरण पर काफी रोक लगी।

धीरे-धीरे उनकी चर्चा सर्वत्र होने लगी। सेठ जुगलकिशोर बिड़ला ने बामनिया स्टेशन के पास पहाड़ी पर एक भव्य राम मन्दिर बनवाया। आज भी उसकी देखरेख उनके परिवारजनों की ओर से ही होती है। मिशनरी वहाँ चर्च बनाने वाले थे; पर मामा जी ने उनका यह षड्यन्त्र विफल कर दिया।

मामा जी आर्य समाज तथा सोशलिस्ट पार्टी से भी जुड़े रहे। उनके आश्रम में सुभाषचन्द्र बोस, आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण, डा0 राममनोहर लोहिया, चौधरी चरणसिंह, जार्ज फर्नांडीस जैसे नेता आते रहते थे; पर मामा जी ने राजनीति की अपेक्षा सेवा कार्य को ही प्रधानता दी।

मामा जी का जन्म एक सम्पन्न परिवार में हुआ था; पर जब उन्होंने सेवा व्रत स्वीकार किया, तो फिर वे भीलों की बीच उनकी तरह ही रहने लगे। वे भी उनके साथ चना, जौ और चुन्नी के आटे की मोटी रोटी खाते थे। आश्रम द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘गोबर’ का छह वर्ष तक मामा जी ने सम्पादन किया। उनका देहान्त 26 दिसम्बर, 1998 को आश्रम में ही हुआ।

मामा जी के देहान्त के बाद आश्रम में ही उनकी समाधि बनाकर प्रतिमा स्थापित की गयी। तत्कालीन खाद्य मन्त्री शरद यादव एवं रेलमन्त्री नितीश कुमार उसके अनावरण के समय वहाँ आये थे। निकटवर्ती जिलों के भील मामा जी को देवता समान मानते हैं तथा आज भी साल की पहली फसल आश्रम को भेंट करते हैं।

प्रतिवर्ष तीन बार वहाँ सम्मेलन होता है, जहाँ हजारों लोग एकत्र होकर मामा जी को श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। बामनिया आश्रम से पढ़े अनेक छात्र आज ऊँची सरकारी एवं निजी सेवाओं में हैं। उनके नेत्र सेवामूर्ति ‘मामा जी’ को याद कर अश्रुपूरित हो उठते हैं। .................................... http://hardinpavan.blogspot.in/search/label/33%20-%20सितम्बर%20पहला%20सप्ताह?m=0

निधन[संपादित करें]

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