हूण राजवंश

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search
हूण साम्राज्य
हूण राजवंश

4th शताब्दी–6ठीं शताब्दी
हूण साम्राज्य अपने स्वर्णकाल में।
राजधानी ग्वालियर, सियालकोट, कश्मीर
भाषाएँ गोजरी भाषा, प्राक्रित
धर्म शैव, हिंदुत्व
शासन राजतंत्र
ऐतिहासिक युग मध्यकालीन भारत
 -  स्थापित 4th शताब्दी
 -  गुप्त और अरब साम्राज्यो से विजय
 -  अंत 6ठीं शताब्दी
पूर्ववर्ती
अनुगामी
कुषाण राजवंश
गुर्जर प्रतिहार राजवंश
चालुक्य राजवंश
चपराणा राजवंश
चावडा राजवंश
चौहान वंश
आज इन देशों का हिस्सा है: Flag of India.svg भारत Flag of Pakistan.svg पाकिस्तान
Warning: Value specified for "continent" does not comply

परिचय[संपादित करें]

मिहिरगुल हूण राजवंश का सबसे प्रतापी सम्राट थे तथा एक महान शिव भक्त थे। आधुनिक अफगान व पाक इनके साम्राज्य का भाग था। हूणो ने अन्तत: गुप्त साम्राज्य को ध्वस्त करके मिहिरकुल के नेतृत्व में पूरे उत्तर भारत में हूण गुर्जर साम्राज्य का निर्माण किया । यशोधर्मा व बालादित्य की संयुक्त सेना भी हूण साम्राज्य को हिला न सकी क्योंकि हूण सेना उस सदी की सबसे लडाकू थी जिसका प्रकोप कोई भी शासक सहन नहीं कर पाता था।[1]

हूण राजवंश के राजा कालक्रम
चौहण ? - 421 ई.
तोमरहण 421 - 470 ई.
तोरमाण 470 - 502 ई.
मिहिर गुल / मिहिरकुल हूण 502 - 542 ई.
वशुकुल हूण 542 - 570 ई.
नरेन्द्र हूण 570 - 600 ई.
गोपालादित्य हूण 600 - ?

इसके बाद मिहिरकुल ने कश्मीर को राजधानी बनाया व पंजाब, अफगान,कश्मीर, बलूचिस्तान,राजस्थान आदि भूभाग पर साम्राज्य बनाये रखा। इन्हीं हूणो की एक शाखा लाटव सौराष्ट्र (गुजरात) चली जाती है। जो उत्तरपथ के समुद्री मार्ग पर कब्जा जमाती है, यहीं शाखा चालुक्य राजवंश कहलाती है। इन्हीं के काल में इनके द्वारा शासित भूभाग को गुर्जरत्रा और गुर्जर देश नाम से पुकारा जाने लगा।[2] इनकी उपाधियाँ भी गुर्जराधिराज, गुर्जरेश्वर, गुर्जर नरेश थी। गुर्जर प्रतिहार राजवंश हूण गुर्जरो की ही एक शाखा है।[3][4][5] हूण शिव भक्त थे परंपरागत रूप से वे सूर्य व अग्नि यानी मिहिर व अतर के उपासक थे मिहिरकुल का संस्कृत में अर्थ भी सूर्यवंशी(सूर्यपुत्र) होता है।[6] तब जैन,बौद्ध धर्मो का भी बोलबाला था, व शास्त्रार्थ की स्वस्थ परंपरा थी। बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में सिरमौर था, गुप्तो का भी उसे संरक्षण प्राप्त था। मिहिरकुल बौद्धो से किसी कारणवश रुष्ट हो जाता है और उस परिणाम वह बौद्घो का नाश करने लगता है।हजारो बौद्घ मठो को नष्ट कर, बौद्घ संतो को प्रताडित तथा हिन्दू धर्म को प्राणवान कर देता है।[7] हजारो शिव मंदिरो का निर्माण करवाता है। [8]हूणकालीन सिक्को पर जयतु वृष लिखा है जोकि शिवजी का वाहन माना जाता है । समकालीन ग्रन्थ मिहिरकुल को महायौद्धा, कठोर शासक, बडे साम्राज्य का स्वामी व बर्बर लिखते हैं। मिहिरकुल की बर्बरता व अत्याचार जैनो व बौद्घो के विरुद्घ हुआ था।जैन ग्रन्थ व बौद्घ साहित्य उसे कल्कि अवतार भी मानते हैं।[9] साहित्यकार व इतिहासकार मानते हैं कि हूणो विशेषत: मिहिरकुल का भारतीय संस्कृति पर व्यापक प्रभाव पडा व उसने हिन्दू धर्म को पुनर्जीवित करने में महान भूमिका निभायी[10] तथा प्रत्येक शिव चौदस को मिहिरकुल की जयन्ति मनायी जाती है।[11]

इतिहास[संपादित करें]

पांचवी शताब्दी के मध्य में, 450 इसवी के लगभग,हूण गांधार इलाके  के शासक  थे, जब उन्होंने वहा से सारे सिन्धु घाटी प्रदेश को जीत लिया। कुछ समय बाद ही उन्होंने मारवाड और पश्चिमी राजस्थान के इलाके भी जीत लिए। 495 इसवी के लगभग हूणों ने तोरमाण के नेतृत्व में गुप्तो से पूर्वी मालवा छीन लिया। एरण, सागर जिले में वराह मूर्ति पर मिले तोरमाण के अभिलेख से इस बात की पुष्टि होती हैं।[12] कि जैन ग्रन्थ कुवयमाल के अनुसार तोरमाण चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित पवैय्या नगरी से भारत पर शासन करता था।यह पवैय्या नगरी ग्वालियर के पास स्थित थी।[13][14]

तोरमाण के बाद उसका पुत्र मिहिरकुल हूणों का राजा बना। मिहिरकुल तोरमाण के सभी विजय अभियानों हमेशा उसके साथ रहता था। उसके शासन काल के पंद्रहवे वर्ष का एक अभिलेख ग्वालियर एक सूर्य मंदिर से प्राप्त हुआ हैं। शिलालेख में मिहिरकुल के छठी शताब्दी के प्रथम भाग में सूर्य मन्दिर के निर्माण का उल्लेख है।[15]इस प्रकार हूणों ने मालवा इलाके  में अपनी स्थति मज़बूत कर ली थी। उसने उत्तर भारत की विजय को पूर्ण किया और गुप्तो सी भी नजराना वसूल किया। मिहिरकुल ने पंजाब स्थित सियालकोट को अपनी राजधानी बनाया। मिहिकुल हूण एक कट्टर शैव था। उसने अपने शासन काल में हजारों शिव मंदिर बनवाये[16] मंदसोर अभिलेख के अनुसार यशोधर्मन से युद्ध होने से पूर्व उसने भगवान स्थाणु (शिव) के अलावा किसी अन्य के सामने अपना सर नहीं झुकाया था।[17] मिहिरकुल ने ग्वालियर अभिलेख में भी खुद को शिव भक्त कहा हैं। मिहिरकुल के सिक्कों पर जयतु वृष लिखा हैं जिसका अर्थ हैं- जय नंदी। वृष शिव कि सवारी हैं जिसका मिथकीय नाम नंदी हैं।[18] कास्मोस इन्दिकप्लेस्तेस नामक एक यूनानी ने मिहिरकुल के समय भारत की यात्रा की थी, उसने “क्रिस्टचिँन टोपोग्राफी” नामक अपने ग्रन्थ में लिखा हैं की हूण भारत के उत्तरी पहाड़ी इलाको में रहते हैं। उनका राजा मिहिरकुल एक विशाल घुड़सवार सेना और कम से कम दो हज़ार हाथियों के साथ चलता हैं,वह भारत का स्वामी हैं। मिहिरकुल के लगभग सौ वर्ष बाद चीनी बौद्ध तीर्थ यात्री हेन् सांग 629 इसवी में भारत आया। वह अपने ग्रन्थ “सी-यू-की” में लिखता हैं की सैंकडो वर्ष पहले  मिहिरकुल नाम का राजा हुआ करता था जो स्यालकोट से भारत पर  राज करता था । वह कहता हैं कि मिहिरकुल नैसर्गिक रूप से प्रतिभाशाली और बहादुर था।[19]

हेन् सांग बताता हैं कि मिहिरकुल ने भारत में बौद्ध धर्म को बहुत भारी नुकसान पहुँचाया। वह कहता हैं कि एक बार मिहिरकुल ने बौद्ध भिक्षुओं से  बौद्ध धर्म के बारे में जानने कि इच्छा व्यक्त की। परन्तु बौद्ध भिक्षुओं ने उसका अपमान किया, उन्होंने उसके पास,किसी वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु को भेजने की जगह एक सेवक को बौद्ध गुरु के रूप में  भेज दिया। मिहिरकुल को जब इस बात का पता चला तो वह गुस्से में आग-बबूला हो गया और उसने बौद्ध धर्म के विनाश कि राजाज्ञा जारी कर दी। उसने उत्तर भारत के  सभी बौद्ध बौद्ध मठो को तुडवा दिया और भिक्षुओं का कत्ले-आम करा दिया। हेन् सांग कि अनुसार मिहिरकुल ने उत्तर भारत से बौधों का नामो-निशान मिटा दिया।[20]

गांधार क्षेत्र में मिहिरकुल के भाई के विद्रोह के कारण,उत्तर भारत का साम्राज्य उसके हाथ से निकल कर,उसके विद्रोही भाई के हाथ में चला गया। किन्तु वह शीघ्र ही कश्मीर का राजा बन बैठा। कल्हण ने बारहवी शताब्दी में “राजतरंगिणी” नामक ग्रन्थ में कश्मीर का इतिहास लिखा हैं। उसने मिहिरकुल का, एक शक्तिशाली विजेता के रूप में ,चित्रण किया हैं। वह कहता हैं कि मिहिरकुल काल का दूसरा नाम था, वह पहाड से गिरते है हुए हाथी कि चिंघाड से आनंदित होता था। उसके अनुसार मिहिरकुल ने हिमालय से लेकर लंका तक के इलाके जीत लिए थे। उसने कश्मीर में मिहिरपुर नामक नगर बसाया।[21] कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ने कश्मीर में श्रीनगर के पास मिहिरेशवर नामक भव्य शिव मंदिर बनवाया था। उसने गांधार इलाके में ७०० ब्राह्मणों को अग्रहार (ग्राम) दान में दिए थे। कल्हण मिहिरकुल हूण को ब्राह्मणों के समर्थक शिव भक्त के रूप में प्रस्तुत करता हैं।[22]

मिहिरकुल ही नहीं वरन सभी हूण शिव भक्त थे। हनोल ,जौनसार –बावर, उत्तराखंड में स्थित महादेव का महासू देवता मंदिर हूण स्थापत्य शैली का शानदार नमूना हैं। कहा जाता हैं कि इसे हूण भट ने बनवाया था। यहाँ यह उल्लेखनीय हैं कि भट का अर्थ योद्धा होता हैं।

हाडा लोगों के आधिपत्य के कारण ही कोटा-बूंदी इलाका हाडौती कहलाता हैं राजस्थान का यह हाडौती सम्भाग कभी हूण प्रदेश कहलाता था। आज भी इस इलाके में हूणों गोत्र के गुर्जरों  के अनेक गांव हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध इतिहासकार वी. ए. स्मिथ, विलियम क्रुक आदि ने गुर्जरों को श्वेत हूणों से सम्बंधित माना हैं।[23] इतिहासकार कैम्पबेल और डी. आर. भंडारकर गुर्जरों की उत्त्पत्ति श्वेत हूणों की खज़र शाखा से मानते हैं।[24][25]  बूंदी इलाके  में रामेश्वर महादेव, भीमलत और झर महादेव हूणों के बनवाये प्रसिद्ध शिव मंदिर हैं। बिजोलिया, चित्तोरगढ़ के समीप स्थित मैनाल कभी हूण राजा अन्गत्सी की राजधानी थी, जहा हूणों ने तिलस्वा महादेव का मंदिर बनवाया था। यह मंदिर आज भी पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता हैं। कर्नल टाड़ के अनुसार बडोली, कोटा में स्थित सुप्रसिद्ध शिव मंदिर पंवार/परमार वंश के हूणराज ने बनवाया था।[26] इस प्रकार हम देखते हैं की हूण और उनका नेता मिहिरकुल भारत में बौद्ध धर्म के अवसान और शैव धर्म के विकास से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। शिवरात्रि के दिन शिव भक्त सम्राट मिहिर कुल  को भी याद किया जाना चाहिये।

हिंदु धर्म का उदय[संपादित करें]

भारत में हूणों ने शैव धर्म अपना लिया और वे ब्राह्मण धर्म के सबसे कट्टर समर्थक के रूप में उभरे।[27] यहाँ तक की बौद्ध चीनी यात्री हेन सांग (629-647 ई.) ने हूण सम्राट मिहिरकुल पर बौधो का क्रूरता पूर्वक दमन करना का आरोप लगाया हैं।[7] कल्हण कृत राजतरंगिणी के अनुसार मिहिरकुल हूण ने कश्मीर में मिहिरेश्वर शिव मंदिर का निर्माण कराया तथा गंधार क्षेत्र में ब्राह्मणों को 1000 ग्राम दान में दिए। [8] जे. एम. कैम्पबेल के अनुसार मिहिरकुल से जुड़ी कहानिया उसे एक भगवान जैसे शक्ति और सफलता वाला, निर्मम, धार्मिक यौद्धा दर्शाती हैं। राजतरंगिणी की प्रशंशा तथा हेन सांग की रंज भरी स्वीकारोक्तिया में यह निहित हैं कि उसे भगवान माना जाता था। [28] जैन ग्रंथो में महावीर की मृत्यु के 1000 वर्ष बाद उत्तर भारत में शासन करने वाले ‘कल्किराज़’ के साथ मिहिरकुल के इतिहास में समानता के आधार पर के. बी. पाठक मिहिरकुल को ब्राह्मण धर्म के रक्षक ‘कल्कि अवतार’ के रूप में भी देखते हैं। [29] ऐसा प्रतीत होता हैं कि उत्तर भारत की विजय से पूर्व गंधार क्षेत्र में ही हूण ब्राह्मण धर्म के प्रभाव में आ चुके थे क्योकि तोरमाणके सिक्के पर भी भारतीय देवता दिखाई पड़ते हैं। कालांतर में हूणों के ईरानी प्रभाव वाले कबीलाई देवता वराहमिहिर को भगवान विष्णु के वराह अवतार के रूप में अवशोषित कर लिया गया।[30] अतः तोरमाण द्वारा एरण में स्थापित वाराह की विशालकाय मूर्ति से प्राप्त उसके शासन काल के प्रथम वर्ष का अभिलेख वराह अवतार की स्तुति से प्रारम्भ होता हैं हूणों के नेता तोरमाण की भाति महानतम गुर्जर प्रतिहार सम्राट भोज वराह का उपासक था। भोज के अनेक ऐसे सिक्के प्राप्त हुए हैं जिन पर वराह उत्कीर्ण है।[31] भोज ने आदि वराह की उपाधि धारण की थी। [32] संभवतः वह वराह अवतार माना जाता था। गुर्जर प्रतिहारों की राजधानी कन्नौज में भी वराह की पूजा होती थी और वहा वराह मंदिर भी था। अधिकतर वराह मूर्तिया, विशेषकर वो जोकि विशुद्ध वाराह जानवर जैसी हैं, गुर्जर-प्रतिहारो के काल की हैं। [33]तोरमाण हूण द्वारा एरण में स्थापित वाराह मूर्ति भी विशुद्ध जानवर जैसी हैं। ब्राह्मणों के प्रभाव में हूण और उनके वंशज गुर्जर-प्रतिहार वराह को विष्णु अवतार के रूप में देखने लगे। वराह अवतार को मुख्य रूप से हूणों और गुर्जर-प्रतिहारो से जोड़ा जाना चाहिए।[34] उत्तर भारत में वाराह अवतार की अधिकतर मूर्तिया 500-900 ई. के मध्य की हैं, जोकि हूणों और गुर्जर प्रतिहारो का काल हैं।[35]

गुर्जर प्रतिहारो की हूण विरासत[संपादित करें]

गुर्जर प्रतिहारों का उदय ठीक हूण साम्राज्य के समाप्त होने पर होता है। इतिहासकार वी ए. स्मिथ1, विलियम क्रुक2 एवं रुडोल्फ होर्नले3 गुर्जर प्रतिहारो को हूणों से सम्बंधित मानते हैं| स्मिथ कहते हैं की इस सम्बन्ध में सिक्को पर आधारित प्रमाण बहुत अधिक प्रबल हैं।[3][4][5][36] वे कहते हैं कि हूणों तथा भीनमाल के गुर्जरों, दोनों ने ही सासानी पद्धति के के सिक्के चलाये|[37]होर्नले गुर्जर-प्रतिहारो को ‘तोमर’ मानते हैं तथा पेहोवा अभिलेख के आधार पर उन्हें जावुला ‘तोरमाण हूण’ का वंशज बताते हैं।[38] पांचवी शताब्दी के लगभग उत्तर भारत को विजय करने वाले हूण ईरानी ज़ुर्थुस्थ धर्म और संस्कृति से प्रभावित थे।[37] वो सूर्य और अग्नि के उपासक थे जिन्हें वो क्रमश मिहिर और अतर कहते थे| वो वराह की सौर (मिहिर) देवता के रूप में उपासना करते थे।[39]  हरमन गोएत्ज़  इस देवता को मात्र वराह न कहकर वराहमिहिर कहते हैं। मुख्य तर्क यह हैं कि हूण और प्रतिहारो के इतिहास में बहुत सी समान्तर धार्मिक एवं सांस्कृतिक परम्पराए हैं, जोकि उनकी मूलभूत एकता का प्रमाण हैं। कई मायनो में गुर्जर प्रतिहारो का इतिहास उनकी हूण विरासत को सजोये हुए हैं| गुर्जर प्रतिहार वंश की उत्पत्ति हूणों से हुई थी तथा उन्होंने हूणों की विरासत को आगे बढाया इस बात के बहुत से प्रमाण हैं। सबसे पहले हम हूणों के सौर देवता वराह की गुर्जर प्रतिहारो द्वारा उपासना के विषय में जानते है।।

वराह उपासक[संपादित करें]

भारत में वराह पूजा की शुरुआत मालवा और ग्वालियर इलाके में लगभग 500 ई. में उस समय हुई।[40] जब हूणों ने यहाँ प्रवेश किया। यही पर हमें हूणों के प्रारभिक सिक्के और अभिलेख मिलते हैं। भारत में हूण शक्ति को स्थापित करने वाले उनके नेता तोरमाण के शासनकाल में इसी इलाके के एरण, जिला सागर, मध्य प्रदेश में वराह की विशालकाय मूर्ति स्थापित कराई थी।[13]जोकि भारत में प्राप्त सबसे पहली वराह मूर्ति हैं| तोरमाण के शासन काल के प्रथम वर्ष का अभिलेख इसी मूर्ति से मिला हैं।[41] जोकि इस बात का प्रमाण हैं कि हूण और उनका नेता तोरमाण भारत प्रवेश के समय से ही वाराह के उपासक थे। पांचवी शातब्दी के अंत में भारत में प्रवेश करने वाले श्वेत हूण ईरानी ज़ुर्थुस्थ धर्म से प्रभावित थे। भारत में प्रवेश के समय हूण वराह की सौर देवता के रूप में उपासना करते थे। इतिहासकार हरमन गोएत्ज़ इस देवता  को वराहमिहिर कहते हैं। गोएत्ज़ कहते हैं, क्योकि हूण मिहिर ‘सूर्य’ उपासक थे, इसलिए वाराह उनके लिए सूर्य के किसी आयाम का प्रतिनिधित्व करता था।[42]  

हूणों के उपनाम ‘वराह’ का गुर्जर प्रतिहारो द्वारा प्रयोग की परंपरा[संपादित करें]

गुर्जर-प्रतिहारो द्वारा हूणों के उपनाम ‘वराह’ का प्रयोग एक अन्य परंपरा हैं जो उनके हूण सम्बंध की तरफ एक स्पष्ट संकेत हैं। वराह जंगली सूअर को कहते हैं। पांचवी शताब्दी में मध्य एशियाई हूणों की एक शाखा ने ज़हां यूरोप पर आक्रमण किया. वही अन्य शाखा ने ईरान को पराजित कर भारत में प्रवेश किया। यूरोप में वाराह को हूणों का पर्याय माना जाता हैं। यूरोप में वराह को हूणों की शक्ति और साहस का प्रतीक समझा जाता हैं।[43][44] रोमानिया और हंगरी में वाराह की विशालकाय प्रजाति को आज भी “अटीला” पुकारते हैं।[45] “अटीला” (434-455 ई.) हूणों के उस दल का नेता था,जिसने पांचवी शताब्दी में रोमन साम्राज्य को पराजित कर यूरोप में तहलका मचा दिया था।[46]  यूरोप के बोहेमिया देश में हूणों से सम्बंधित एक प्राचीन राजपरिवार का नाम ‘बोयर’ हैं।[47] [48]  ‘बोयर’ का अर्थ हैं वराह जैसा आदमी।[49]

तबारी ने श्वेत हूणों और तुर्कों के बीच हुए युद्ध का वर्णन किया हैं। तबारी के अनुसार श्वेत हूणों के अंतिम शासक का नाम वराज था।[50] गफुरोव का मानना हैं कि ‘वराज़’ पूर्वी ईरान के शासको की उपाधि थी।[51] मेस्सोन ने ‘वराज’ का अनुवाद ईरानी भाषा में ‘जंगली सूअर’ किया हैं। [52]

भारत मे भी हूणों के लिए वराह शब्द का प्रयोग हुआ हैं|अलबरूनी ने काबुल के तुर्क शाही वंश का संस्थापक बर्हतेकिन को बताया हैं। [53] बर्हतेकिन बराह तेगिन का अरबी रूपांतरण प्रतीत होता हैं| छठी शताब्दी में भारत आये चीनी यात्री सुंग युन के के विवरण के आधार पर पर कहा जा सकता हैं कि तेगिन हूणों की एक उपाधि थी, तथा भारतीय सन्दर्भ में ‘तेगिन’ उपाधि पहले श्वेत हूण शासक ने धारण की थी।[54] यह उपाधि हूण उपशासक द्वारा धारण की जाती थी जोकि प्रायः हूण शासक का भाई या पुत्र होता था।[55] बराह हूण शासक का नाम हैं या उपाधि कहना मुश्किल हैं। किन्तु भारत में हूणों शासक के लिए बराह नाम के प्रयोग का यह एक उदहारण हैं।

काबुल में तुर्क शाही वंश के संस्थापक बराह तेगिन के बाद भारत में गुर्जर-प्रतिहार सम्राटो को वराह कहा गया हैं। गुर्जर-प्रतिहार सम्राट भोज की उपाधि “वराह” थी। भोज महान के “वराह” चित्र वाले चांदी के सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिन पर वराह चित्र के साथ आदि वराह अंकित हैं।[56] अरबी  यात्री अल मसूदी (916 ई.) ने ‘मुरुज-उल-ज़हब’ नामक ग्रन्थ में  गुर्जर-प्रतिहार सम्राटों को “बौरा” यानि “वराह” कहा हैं[57] अतः वराह हूणों की भाति गुर्जर-प्रतिहारो का भी उपनाम था। अरबी इतिहासकारों द्वारा गुर्जर-प्रतिहारो के लिए प्रयुक्त ‘बौरा’ तथा बोहेमिया मे हूण राजपरिवार के लिए प्रयुक्त बोयर में भी एक साम्यता हैं।

मिहिर उपाधी की परंपरा[संपादित करें]

हूण सम्राट मिहिर कुल, गुर्जर-प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज और आधुनिक गुर्जरों द्वारा मिहिर उपाधि का प्रयोग एक और इनके बीच की सांझी परंपरा हैं जोकि इन सबकी मूल भूत एकता का प्रमाण हैं। मिहिर ईरानी शब्द हैं जोकि सूर्य का पर्यायवाची हैं। [58] हूण ‘मिहिर’ के उपासक थे|[59] हूणों की उपाधि ‘मिहिर’थी। हूण सम्राट मिहिर कुल (502-542 ई.) का वास्तविक नाम गुल था तथा मिहिर उसकी उपाधि थी। कास्मोस इंडिकोप्लेस्टस ने तत्कालीन ‘क्रिस्चन टोपोग्राफी’ नामक ग्रन्थ में उसे ‘गोल्लस’ लिखा गया हैं।[60] अतः उसे मिहिर गुल कहा जाना अधिक उचित हैं।[61]  कंधार क्षेत्र के ‘उरुजगन’ नामक स्थान से प्राप्त एक शिलालेख पर मिहिरकुल हूण को सिर्फ ‘मिहिर’ लिखा गया हैं।[62]

गुर्जर-प्रतिहार सम्राट भोज महान (836- 885 ई.) की सागरताल एवं ग्वालियर अभिलेखों से ज्ञात होता हैं कि उसने ने ‘मिहिर’ उपाधि भी धारण की थी। [63] इसलिए उसे आधुनिक इतिहासकार मिहिर भोज कहते हैं, अन्यथा सामान्य तौर पर उसे सिर्फ भोज कहा गया हैं। ‘मिहिर’ आज भी राजस्थान और पंजाब में गुर्जरों सम्मानसूचक उपाधि हैं। [64][65]गुर्जरों ने मिहिर उपाधि अपने हूण पूर्वजों से विरासत में प्राप्त की हैं।

हूण शासको के पारावारिक नाम ‘अलखान’ का नवी शताब्दी के गुर्जर शासको द्वारा धारण करना[संपादित करें]

गुर्जर प्रतिहारो की हूण विरासत का एक अन्य प्रमाण हूण शासको के पारावारिक नाम ‘अलखान’ का नवी शताब्दी के गुर्जर शासको द्वारा धारण करना हैं। राजतरंगिणी के अनुसार पंजाब के शासक ‘अलखान’ गुर्जर का युद्ध कश्मीर के राजा शंकर वर्मन (883- 902 ई.) के साथ हुआ था। यह अलखान गुर्जर कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का मित्र अथवा सामंत था। खिंगिल, तोरमाण, मिहिरकुल, आदि हूण शासको के सिक्को पर बाख्त्री भाषा ‘अलकोन्नो’ अंकित है।[66]  हरमट के अनुसार इसे ‘अलखान’ पढ़ा जाना चाहिए। अलार्म के अनुसार ‘अलखान’ इन हूण शासको की क्लेन का नाम हैं। [67] बिवर के अनुसार मिहिरकुल का उतराधिकारी  'अलखान’ था। [68] हरमट के अनुसार हूण के सिक्को पर बाख्त्री में ‘अलखान’ वही नाम हैं जोकि कल्हण की राजतरंगिणी में उल्लेखित गुर्जर राजा का हैं।[69] हूण सम्राट मिहिरकुल की राजधानी ‘स्यालकोट’ तक्क देश आदि क्षेत्र अलखान गुर्जर के राज्य का अंग थे। ऐसा प्रतीत होता हैं कि भारत में हूण साम्राज्य के पतन के बाद भी पंजाब में इस परिवार की शक्ति बची रही तथा वहां का शासक अलखान गुर्जर तोरमाण और मिहिरकुल के परिवार से सम्बंधित था। इस प्रकार गुर्जर प्रतिहारो का अप्रत्यक्ष सम्बंध तोरमाण और मिहिरकुल के घराने से बना हुआ था।

गुर्जर प्रतिहारो और हूण सिक्को में समानता[संपादित करें]

मिहिर कुल हूण का सिक्का- ऊपर की तरफ मिहिर कुल का चित्र तथा दूसरी तरफ सासानी  ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण हैं मिहिर कुल हूण का सिक्का- ऊपर की तरफ मिहिर कुल का चित्र तथा दूसरी तरफ सासानी  ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण हैं
मिहिर कुल हूण का सिक्का- ऊपर की तरफ मिहिर कुल का चित्र तथा दूसरी तरफ सासानी  ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण हैं
मिहिर भोज का सिक्का- ऊपर की तरफ मिहिर भोज वराह रूप में विजयी मुद्रा में तथा सूर्य चक्र, दूसरी तरफ ऊपर श्री मद आदि वराह लिखा हैं तथा नीचे सासानी ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण हैं।

मुख्य रूप से इसी आधार पर गुर्जरों को हूणों से जोड़ कर देखा गया। हूणों के बहुत से सिक्के हमें प्राप्त हुए हैं जिन पर ईरानी ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण हैं। [70] जोकि उनके ‘अतर” यानि अग्नि उपासक होने का प्रमाण हैं।  ‘सासानी’ ईरानी ढंग की अग्निवेदिका लगभग दो से चार फुट ऊँची प्रतीत होती हैं, जिसके समीप खड़े होकर आहुति दी जाती हैं। अग्निवेदिका के समक्ष उसकी रक्षा के लिए दो अग्निसेविका खड़ी दर्शाई गई हैं।

गुर्जर प्रतिहार वंश को भीनमाल राज्य से सम्बंधित मानते हैं। [71] भीनमाल की चर्चा हेन सांग (629-645 ई.) ने सी. यू. की नामक ग्रन्थ में ‘गुर्जर देश’ की राजधानी के रूप में की हैं। [72] नक्षत्र विज्ञानी ब्रह्मगुप्त की पुस्तक ब्रह्मस्फुत सिधांत के अनुसार भीनमाल चाप वंश के व्याघ्रमुख का शासन था। [73] व्याघ्रमुख का एक सिक्का प्राप्त हुआ हैं, इस पर भी ‘सासानी’ईरानी ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण हैं। वी. ए स्मिथ ने इस सिक्के की पहचान श्वेत हूणों के सिक्के के रूप में की थी, तथा  इस विषय पर एक शोध पत्र लिखा जिसका शीर्षक हैं“व्हाइट हूण कोइन ऑफ़ व्याघ्रमुख ऑफ़ दी चप (गुर्जर) डायनेस्टी ऑफ़ भीनमाल”। [74] एक जैन लेखक के अनुसार ‘गदहिया सिक्के’ भीनमाल से ज़ारी किये गए थे।[75]   ये सिक्के हूणों के सिक्को का अनुकरण हैं तथा उन पर भी ‘सासानी’ईरानी ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण हैं। गदहिया सिक्को का सम्बन्ध गुर्जरों से रहा हैं तथा इनके द्वारा शासित पश्चिमी भारत में शताब्दियों, विशेषकर सातवी से लेकर दसवी शताब्दी, तक भारी प्रचलन में रहे हैं।[76]

गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज के सिक्को पर एक तरफ वराह अवतार का चित्र उत्कीर्ण हैं। इन सिक्को के दूसरी तरफ आदि वराह’ अंकित हैं।[77][78] तथा ‘सासानी’ ईरानी ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण हैं।[79] ‘‘आदि वराह’ आदित्य वराह का संछिप्त रूप हैं। अतः स्पष्ट हैं कि सिक्को में उत्कीर्ण वराह सौर देवता हैं तथा ‘आदि वराह’ ‘आदित्य वराह’ अर्थात ‘वराह मिहिर’ के पर्यायवाची के रूप में प्रयोग किया गया हैं। गुर्जर प्रतिहारो द्वारा हूणों के सिक्को पर उत्कीर्ण ईरानी ढंग की अग्निवेदिका का अनुकरण उनकी हूण उत्पत्ति का प्रबल प्रमाण हैं।   

हूण शाखा के वंश[संपादित करें]

हूणों के पतन के बाद हूण साम्राज्य कई शाखाओं में बंट गया

चालूक्या वंश (हूण)[संपादित करें]

ये हूण मूल के गुर्जर थे।[80][81][82][83] होर्नले के अनुसार मालवा में यशोधर्मण से 528 ई. में हारने के  के पश्चात हूणों का एक दल नर्मदा नदी पार कर दक्कन चल गया, कालांतर में इन्होने ही वातापी के चालुक्य वंश कि स्थापना की।[83] [84] गुर्जर-प्रतिहारो की तरह ही चालुक्यो का शाही निशान भी वाराह था।[85] उनके सिक्को पर भी वाराह अंकित रहता था। इन सिक्को को वाराह के नाम से पुकारा जाता था। चालुक्यो ने “हूण” नाम के सिक्के भी चलवाए। [86] [87] बाद में उत्तर की एक और शाखा ने आधुनिक गुजरात में गुर्जर या गुर्जर मंडल या गुर्जरत्रा नाम का एक राज्य स्थापित किया। चालूक्या वंश अभी भी महाराष्ट्र के डोरे गुर्जर और उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के गुर्जर के बीच पाया जाता है।[88] वी. ए. स्मिथ ने वातापी के चालुक्यो को गुर्जर माना हैं। [83] होर्नले ने इन्हें हूण मूल का गुर्जर बताया हैं।[89]

चौहाण वंश (हूण)[संपादित करें]

  चौहाण या चौहान वंश हूण मूल का एक गुर्जर राजवंश था। [80][90][82] तथा गुर्जर प्रतिहारो के सामंत थे। १२वीं शताब्दी तक शासन किया। [85] चौहान वंश गुर्जरो के प्रसिद्ध वंशों में से अन्यतम है।[90][89] इतिहासकारों के अनुसार अग्निकुल गुट मूल रूप से गुर्जर थे और चौहान गुर्जरो का प्रमुख कबीला था।[91] चौहान गुर्जर के हूणो के चेची कबीले से मूल निकाले जाते हैं। [92]बंबई गजेटियर के अनुसार चेची गुर्जरो ने अजमेर पर 700 साल राज किया। [93] इससे पहले मध्य एशिया में तारिम बेसिन (झिंजियांग प्रांत) के रूप में जाना जाता क्षेत्र में रहते थे। चु - हाण /हान (200 ईसा पूर्व), "चू" राजवंश और "हान" राजवंश के बीच वर्चस्व की लड़ाई जो yuechis / Gujars का हिस्सा थे। गुर्जर जब भारत मे अरब बलों से लड़ते थे । जब वे चू-हाण शीर्षक अपने बहादुर सैनिकों को सम्मानित करने के लिए प्रयोग किया जाता था जो बाद मे चौहाण/चौहान कहा जाने लगा।।[94][95][96]

तंवर वंश (हूण)[संपादित करें]

तंवर अथवा तोमर एक प्राचिन गुर्जर वंश है।[80][90][82] हिंदी में एक कहावत है "दिली तंवरो की" जिसका अर्थ है कि दिल्ली तंवरो के अंतर्गत आता है।[97]दिल्ली के शुरुआती इतिहास का स्थान, अभी भी तंवर गूजरो द्वारा बसा हुआ है। [95] दिल्ली के महरौली को पहले मिहिरावली के रूप में जाना जाता था जिसका अर्थ था मिहिरों (गुर्जरो) का निवास या मिहिरों के घरों की पंक्ति (मिहिरो वाली)। इसे हुण सम्राट मिहिरकुल द्वारा स्थापित किया गया था क्योंकि मिहिर हुणो का दूसरा नाम है। महरौली, 7 प्राचीन शहरों में से एक है, जो वर्तमान दिल्ली राज्य को बनाता है।दिल्ली से सटे फरीदाबाद जिले के महरौली से दूर दिल्लीपति राजा अनंगपाल तंवर के नाम पर गुर्जर गाँव अनंगपुर है। दिल्ली के महरौली क्षेत्र के बारे में पहले से ही उल्लेख है कि अभी भी तोमरा / तंवर गुर्जरो के बारह गाँव हैं तथा दिल्ली से सटे राज्य मे 75 गांव है। जो इस धारणा को मजबूत करते हैं कि यह मूल रूप से गुर्जर कबीला था। जिनमें तंवर/तोमरो को पिहोवा शिलालेख के अनुसार हुणो का वंशज कहा गया है।[98] तोमर/तंवरो को सम्राट मिहिरकुल के पिता, तोरमाण/तोमराण हूण का वंशज माना जाता है।[99] तोमर / तंवर प्रमुख अनंगपाल ने महरौली के लालकोट किले का निर्माण किया और बाद में अनंगपाल तंवर द्वितीय ने 11वी सदी मे अपनी राजधानी को कन्नौज से लालकोट ले आया। कन्नौज शूरू से ही हूणो की राजधानी रही। हूणवंशी सम्राट नागभट के अरबो से लगातार युध्द जीतने और देश की रक्षा करने पर ही उनको प्रतिहार (रक्षक) की उपाधी मिली और इनके गुर्जर साम्राज्य को "गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य" कहा गया। गुर्जर प्रतिहार शासको की राजधानी भी कन्नोज ही थी।[100] [101]

दिल्ली का तंवर / तोमर वंश अनंगपाल तोमर- II तक रहा। अनंगपाल तंवर द्वितीय ने अपनी बेटी के बेटे (अजमेर के राजा का पुत्र) को गुर्जर राजा पृथ्वीराज चौहान को वारिस के रूप में नियुक्त किया। कुछ इतिहासकारों का मानना ​​है कि जब तक उनके दादा जीवित थे तब तक पृथ्वीराज महज एक कार्यवाहक राजा थे। पृथ्वीराज को दिल्ली में कभी ताज पहनाया नहीं गया था, इसलिए यह देखने के लिए वजन जोड़ा गया कि चौहान शासक ने अपने नाना से सिंहासन की रक्षा की। अनंगपाल तंवर द्वितीय के 23 भाई थे और उनमें से प्रत्येक का अपना क्षेत्र था। बर्ड्स (या जगस) द्वारा रखे गए रिकॉर्ड के अनुसार, राजा अनंगपाल तंवर ने पृथ्वीराज चौहान को केवल एक धार्मिक यात्रा पर जाते समय कार्यवाहक के रूप में बनाया, क्योंकि उस समय उनके अपने बेटे बहुत छोटे थे। जब राजा अनंगपाल तंवर वापस लौटे, तो पृथ्वीराज ने अपने नाना को राज्य सौंपने से इनकार कर दिया। आज गुर्जरों के दिल्ली के महरौली क्षेत्र मे ही 12 गाँव तोमर या तंवर गुर्जर हैं जो इस धारणा को मजबूत करते हैं कि यह मूल रूप से गुर्जर कबीला था। ये गुर्जर तंवर आज़ादी के पहले युद्ध के दौरान 1857 में अंग्रेजों के लिए सबसे मुश्किल विद्रोही साबित हुए थे, जिसकी शुरुआत मेरठ के कोतवाल (पुलिस प्रमुख) 'कोतवाल धन सिंह गुर्जर' ने की थी। उन्होंने 12 दिनों के लिए मैटलफ़ेफ़ हाउस पर कब्जा कर लिया और ब्रिटिश सेनाओं को सभी आपूर्ति काट दी और दिल्ली के लिए स्वतंत्रता की घोषणा की।[95]

चावडा/चपराणा वंश (हूण)[संपादित करें]

चाप, चावडा, छावडा,चप, चपराणा, चपोत्कट, चावडी, छावडी गुजरात का एक प्राचीन राजवंश था। इसका कालखण्ड ६९० से ९४२ ईस्वी के मध्य था। चापो को संस्कृत के शब्द चापोतकट के नाम से भी जाना जाता है। चाप शब्द संस्कृत का है जिसका अर्थ धनुष होता है।हूणों का वो हिस्सा जो धनुष के साथ जंग किया करता था उसे भारतीय राजाओ द्वारा चापोतकट कहा गया।[102] उन धनुषधारी सैनिको ने बाद मे एक भारत का महान राजवंश खड़ा किया जिसे चाप/चावडा/चपोत्कट राजवंश कहा गया।[100] [103] गुर्जरो मे 'चपराणा" गोत्र है जो चाप राजवंश के ही वंशज है चपराणा का अर्थ चाप(धनुष)+राणा(राजा)=धनुषधारी राजा निकलता है।इनके चलाए बाण अचूक कहे जाते और अपनी तीरअंदाजी के लिए पूरे विश्व मे मशूहर थे। इनके तीर दूर तक अचूक थे। ये घोटे पर खडे होकर ,पीछे मुडकर ,एक हाथ से या कहें कि हर प्रकार से तीर चलाने में सक्षम थे। गुर्जरो का चपराणा गोत्र "हूण' गुर्जरो की ही एक शाखा है।[104] हूणो के सैनिको मे बडा हिस्सा तिरंदाजो का था जो चाप के हूण से सम्बन्ध को गहरा करता है। हूणों को समकालीन दुनिया का सबसे अच्छा घुड़सवार और धनुर्धर माना जाता था।सातवीं शताब्दी में भीनमाल से गुर्जरदेश (आधुनिक राजस्थान) पर शासन करने वाले राजा व्याघ्रमुख गुर्जर चाप वंश के थे।[2]। उसका सिक्का हुणो के सिक्कों की नकल है, इसलिए इसे वी.ए. स्मिथ द्वारा 'राजा व्याघ्रमुख चपराणा' के हुण सिक्के के रूप में कहा गया।[105] मध्यप्रदेश के चंबल संभाग में चपराणा और हुण गुर्जर पाग-पटल भाई के रूप में जाने जाते हैं। वनराज चावड़ा, जिन्होंने अनिलवाड़ा शहर की स्थापना की थी, पंवार और पंवार हुण मूल के गुजराती थे, इस प्रकार चाप, चपराना, चावड़ा, चपोटक, छावडा, छावडी भी हुण मूल के हैं।[83] होर्नले ने इन्हें हूण मूल का गुर्जर बताया हैं।[89]

आठवी शताब्दी के आरम्भ में गुर्जर-प्रतिहार उज्जैन के शासक थे। नाग भट प्रथम ने उज्जैन में गुर्जरों के इस नवीन राजवंश की नीव रखी थी। संभवत इस समय गुर्जर प्रतिहार भीनमाल के चप/चावडा वंशीय गुर्जर के सामंत थे।[85] नक्षत्र विज्ञानी ब्रह्मगुप्त की पुस्तक ब्रह्मस्फुत सिधांत के अनुसार भीनमाल चाप वंश के व्याघ्रमुख का शासन था|51व्याघ्रमुख का एक सिक्का प्राप्त हुआ हैं, इस पर भी ‘सासानी’ईरानी ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण हैं| वी. ए स्मिथ ने इस सिक्के की पहचान श्वेत हूणों के सिक्के के रूप में की थी, तथा  इस विषय पर एक शोध पत्र लिखा जिसका शीर्षक हैं“व्हाइट हूण कोइन ऑफ़ व्याघ्रमुख ऑफ़ दी चप (गुर्जर) डायनेस्टी ऑफ़ भीनमाल” [83] होर्नले ने इन्हें हूण मूल का गुर्जर बताया हैं।[89] भीनमाल के रहने वाले ज्योत्षी ब्रह्मगुप्त ने शक संवत 550  (628 ई.) में अर्थात हेन सांग के वह आने के 13 वर्ष पूर्व ‘ब्रह्मस्फुट’ नामक ग्रन्थ लिखा जिसमे उसने वहाँ के राजा का नाम व्याघ्रमुख और उसके वंश का नाम चप (चपराणा, चापोत्कट, चावडा) बताया हैं। [106]

पंवार/परमार वंश (हूण)[संपादित करें]

राजस्थान के कोटद्वार में बडोली के कर्नल टॉड शिव मंदिर द्वारा दर्ज एक किंवदंती के अनुसार, पंवार वंश के हुण राजा द्वारा बनाया गया था। किंवदंती पंवारों के हुण मूल का समर्थन करती है।[95] पाकिस्तान में पुट्टोहर जिले का हुण जुगदेव पंवार से अपने वंश का दावा करता है जो हूणों के साथ पंवारों की एकता को प्रमाणित करता है। फुरथुर के इस संबंध का संबंध इस तथ्य से सिद्ध होता है कि हुण गुर्जरो के बिधुडी सूबेदार भी जगदेव पंवार के वंशज होने का दावा करते हैं। पंवार गुर्जरो के ख़ोबाद उप-कबीले के पास सहारनपुर जिले के 84 गाँव हैं। वे जगदेव पंवार से अपने वंश का भी दावा करते हैं। खोबाड की हंगरी मे काबर जनजाति के नाम के साथ एक उल्लेखनीय ध्वन्यात्मक समानता है जो अटिला के हूणों के वंश का दावा करती है।[107] खोबड/खूबड पंवारों के अनुसार, वे धार के मालवा के धार से चले गए हैं। मालवा लंबे समय तक हूणों की मजबूत पकड़ बना रहा और यशोधर्मन द्वारा अपनी हार के बाद वे सभी दिशाओं में फैल गए। जुगदेव पंवार की कथा उनके पूर्वज के रूप में कई गुर्जर कुलों में विशेष महत्व है क्योंकि हुणो सहित कई कबीले उन्हें अपना पूर्वज मानते हैं। इस पौराणिक नायक की ऐतिहासिकता हैदराबाद के पूर्व राज्य से जैनद शिलालेख द्वारा सिद्ध होती है। जिसके अनुसार जगदेव महादेव ने 1093 में अरबुडा क्षेत्र पर विजय प्राप्त की।[108] पंवारों सहित गुर्जरो का प्रारंभिक इतिहास अरबुडा या अबू क्षेत्र के साथ जुड़ा हुआ है।[109]

हूण गुर्जरों के गाँवो का सर्वेक्षण[संपादित करें]

भारत में हूण आज भी गुर्जरों का एक प्रमुख गोत्र हैं जिसकी आबादी अनेक प्रदेशो में हैं। छठी शताब्दी के उतरार्ध में हूण साम्राज्य के पतन के बाद हूण गुर्जरों की उपस्थिति नवी-दसवी शताब्दी में पंजाब में प्रमाणित होती हैं। हूण सम्राट तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल (502-542) ई. के सिक्को पर उनके कुल का नाम ‘अलखान’ अंकित हैं।[27] राजतरंगिणी के अनुसार पंजाब के शासक ‘अलखान’ गुर्जर का युद्ध कश्मीर के राजा शंकर वर्मन (883- 902 ई.) के साथ हुआ था।इतिहासकार हरमट के अनुसार हूणों के सिक्को पर बाख्त्री भाषा में उत्कीर्ण ‘अलखान’ वही नाम हैं जोकि कल्हण की राजतरंगिणी में उल्लेखित गुर्जर राजा का हैं।[8] इतिहासकार अलार्म के अनुसार ‘अलखान’ हूण शासको की क्लेन / कुल का नाम हैं। इतिहासकार बिवर के अनुसार मिहिरकुल का उतराधिकारी ‘अलखान’ था। अतः भारत में हूण साम्राज्य के पतन के बाद भी पंजाब में तोरमाण और मिहिरकुल के परिवार की शक्ति अक्षुण बनी रही तथा नवी शताब्दी में पंजाब पर शासन करने वाला अलखान गुर्जर उनके ‘अलखान’ परिवार का वारिस था।[28]

वर्तमान में उत्तराखंड राज्य के हरिद्वार जिले में लक्सर कस्बे के पास हूण गोत्र का चौगामा यानि चार गाँव का समूह हैं। कुआँ खेडा, मखयाली, रहीमपुर और भुर्ना गाँव इस ‘हूण’ चौगामे का हिस्सा हैं। इनके अतिरिक्त मंगलोर के पास बिझोली गाँव में हूण गुर्जर हैं। वास्तविकता में कुआ खेडा गाँव के एक हूण परिवार के पूर्वज बिझोली से आकर बसे थे। बिझोली गाँव में आज भी इस परिवार की पुश्तैनी ‘सती देवी’ के मंदिर हैं। कुआ खेडा का दूसरा परिवार कनखल स्थित प्राचीन मायापुरी नगरी से आया हैं। मायापुरी में भी इनके पूज्य सती मंदिर हैं। इनके अतिरिक्त उत्तराखंड के हरिद्वार जिले मे ही झबरेडा के पास हूण गुर्जरों का एक बड़ा गाँव हैं, जिसका नाम ‘लाठ्हरदेवा हूण’ हैं।[51]

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में सरसावा रेलवे स्टेशन के पास ‘अलीपुर-काजीपुर’ हूण गुर्जरों के गाँव हैं| मुज़फ्फरनगर जिले में पुरकाजी के पास शकरपुर और भदोलीगाँव  में हूण गोत्र के गुर्जर हैं| उत्तर प्रदेश के हापुड़ और मेरठ जिले में हूण गोत्र के गुर्जरों का बाराह गांव हैं। बारहा  का अर्थ हैं-12 गाँव की खाप या समूह। गोहरा, मुदाफरा, औरंगाबाद, मुक्तेसरा, माधोपुर, पीरनगर, दतियाना, सालारपुर, सुकलमपुरा, मडैय्या, अट्टा और नवल इस' हूण खाप के गाँव हैं। इसमें पहले 11 गाँव हापुड़ जिले में तथा बारहवा गाँव नवल मेरठ जिले में हैं। मेरठ में शाहजहाँपुर के पास सदुल्लाह्पुर गाँव में भी हूण गुर्जरों के परिवार रहते हैं। आगरा जिले में भी हूण गुर्जरों के गाँव है

राजस्थान में हूण गुर्जर मुख्य रूप से अलवर, भरतपुर, दौसा, अजमेर, सवाई माधोपुर, टोंक, बूंदी, कोटा, चित्तोडगढ और भीलवाड़ा जिले में पाए जाते हैं।  पूर्व मध्य काल में कोटा, बूंदी आदि जिलो का हाड़ोती क्षेत्र हूण प्रदेश कहलाता था। अलवर जिले में हूण गुर्जरों के 7 गाँव में हूण गुर्जर निवास करते हैं। अलवर जिले की तहसील लक्ष्मण गढ़ में बांदका हूण गुर्जरों का प्रमुख गाँव हैं।

भरतपुर जिले में डीग के पास महमदपुर हूण गुर्जरों का गाँव हैं। इसी के पास अधावाली गाँव में भी हूण गुर्जरों के कुछ परिवार निवास करते हैं। भरतपुर जिले के बसावर क्षेत्र में इटामदा और महतोली हूण गुर्जरों के गाँव हैं।

दौसा जिले में सिकंदरा के पास पीपलकी हूण गुर्जरों का प्रसिद्ध गाँव हैं, जोकि अपनी बहादुरी के लिए जाना जाता हैं।

अजमेर जिले में नारेली, लवेरा, बासेली, घोड़दा और भेरूखेड़ा हूण गुर्जरों के मुख्य गाँव हैं। टोंक जिले में सरोली, गांवडी, कल्याणपुर, बसनपुरा, चान्दली माता और रंगविलास ग्रामो में हूण गुर्जरों का निवास हैं। गांवडी गाँव में हूण गुर्जरों का पूज्य एक सती मंदिर भी हैं। कहते हैं कि गांवडी में पहले तंवर गुर्जर रहते थे इन्होने अपनी एक बेटी का विवाह भीलवाड़ा जिले के टीकर गाँव के हूण गुर्जर के साथ कर दिया। किसी कारण वश दोनों परिवारों में संघर्ष हो गया। जिसमे तंवर परिवार के दामाद की मृत्यु हो गई और उसकी पत्नी सती हो गई। बाद में हूण गुर्जर गाँव में आबाद हो गए और उन्होंने अपनी पूर्वजा की याद में सती मंदिर का निर्माण करवाया। हिण्डोली और बूंदी के कुछ हूण परिवार गांवडी से ही प्रव्रजन कर वहां बसे हैं।

कोटा-बूंदी का क्षेत्र पूर्व मध्य काल में हूण प्रदेश के नाम से जाना जाता था। बूंदी इलाके  में रामेश्वर महादेव, भीमलत और झर महादेव हूणों के बनवाये प्रसिद्ध शिव मंदिर हैं। बिजोलिया, चित्तोरगढ़ के समीप स्थित ‘मैनाल’ कभी हूण राजा अन्गत्सी की राजधानी थी, जहा हूणों ने तिलस्वा महादेव का मंदिर बनवाया था। यह मंदिर आज भी पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता हैं। कर्नल टाड़ के अनुसार बडोली, कोटा में स्थित सुप्रसिद्ध शिव मंदिर हूणराज ने बनवाया था।[110] आज भी इस इलाके में हूणों गोत्र के गुर्जरों  के अनेक गांव हैं। बूंदी शहर के बालचंद पाड़ा मोहल्ले में भी हूण गुर्जरों की पुरानी आबादी हैं। बूंदी जिले में राणीपुरा, नरसिंहपुरा, रामपुरा, झरबालापुरा, सुसाडिया, नीम का खेडा, झाल आदि हूण गुर्जरों के प्रसिद्ध गाँव हैं। हिण्डोली में नेहडी, सहसपुरिया, टरडक्या, टहला, सलावलिया और खंडिरिया हूण गुर्जरों के गाँव हैं। सती माँ का एक मंदिर ग्राम मांगटला, जिला भीलवाडा में हैं जोकि खंडिरिया, झाल, बूंदी शहर के बालचंद पाड़ा तथा नेहडी के कुछ हूण परिवार की कुल देवी हैं। नेहडी के अधिकांश हूण परिवारो की कुल देवी, सती माँ का मंदिर बूंदी जिले के खेरखटा ग्राम में हैं। कोटा जिले में ‘रोजड़ी’, राजपुरा और पीताम्बपुरा हूण गुर्जरों के मुख्य गाँव हैं।

चित्तोडगढ जिले की बेगू तहसील में ‘पारसोली’ हूण गुर्जरों का प्रमुख गाँव हैं। भीलवाड़ा जिले की जहाजपुर तहसील में टिटोडा. बरोदा,  मोतीपुरा मोहनपुरा और गांगीथला तथा शाहपुरा तहसील में ‘बच्छ खेड़ा’ हूण गुर्जरों के गाँव हैं।भीलवाड़ा की केकड़ी तहसील में गणेशपुरा गाँव में हूण गुर्जर निवास करते हैं। छठी शताब्दी के पूर्वार्ध में मध्य प्रदेश के ग्वालियर क्षेत्र में हूणों का आधिपत्य था। [57]हूण सम्राट मिहिरकुल के शासन काल के पंद्रहवे वर्ष का एक अभिलेखग्वालियर के पास से एक सूर्य मंदिर से प्राप्त हुआ हैं। ग्वालियर जिले की डबरा तहसील में भारस हूण गुर्जरों का प्रमुख गाँव हैं। आज भी चंबल संभाग ग्वालियर तथा इसके समीपवर्ती जिलो के गुर्जर बाहुल्य अनेक गाँवो में हूण गुर्जरों की बिखरी आबादी हैं। ग्वालियर की डबरा तहसील में भारस हूण गुर्जरों का मुख्य गाँव हैं। भरास के पास ही चपराना गुर्जरों का बडेरा गाँव हैं। दोनों गोंवो के लोग पग-पलटा भाई माने जाते हैं तथा आपस में शादी नहीं करते। [111]मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में नरवर के पास डोंगरी, और टिकटोली हूण गुर्जरों का प्रसिद्ध गाँव हैं। डोंगरी नल-दमयंती के पौराणिक आख्यान के पात्र मनसुख गुर्जर का गाँव माना जाता हैं।[112] मनसुख हूण गोत्र का गुर्जर था तथा राजा नल का दोस्त था। मनसुख गुर्जर ने संकट के समय राजा नल का साथ निभाया था। आम समाज आज भी मनसुख गुर्जर को एक आदर्श दोस्त के रूप में देखता हैं। डोंगरी में एक किले के भग्नावेश भी हैं जोकि मनसुख गुर्जर का किला माना जाता हैं। भारत के प्रथम हूण सम्राट तोरमाण का अभिलेख मध्य प्रदेश के सागर जिले स्थित एरण स्थान से प्राप्त हुआ हैं। मध्य प्रदेश में हूण गुर्जर भोपाल तक पाए जाते हैं। महाराष्ट्र के दोड़े गुर्जरों में हूण गोत्र हैं। खानदेश गजेटियर के अनुसार दोड़े गुर्जरों के 41 कुल हैं। इनमे से एक अखिलगढ़ के हूण हैं।[113]

सियालकोट हूणो की प्राचीन राजधानी[संपादित करें]

हुण शासक तोरमाण ने उत्तर पश्चिमी हिंदुस्तान पर अपना शासन स्थापित किया, और उनके बेटे मिहिरकुला (502-542 ईस्वी) द्वारा छठी शताब्दी की शुरुआत में सफल हुए थे। जिनकी राजधानी सकाला आधुनिक पाकिस्तानी पंजाब सियालकोट थी। भारत भ्रमण पर आए हींग तुंग के सी-यूयू के अनुसार सातवीं शताब्दी में मिहिरकुल हुण ने सकाला/सियालकोट से पूरे हिंदुस्तान पर शासन किया । तेरहवीं शताब्दी में लिखी गई कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार, मिहिकुला हुण ने श्रीलंकाई राजा पर भी हमला किया और उन्हें हरा दिया। मिहिरकुला ने ग्वालियर और चित्तौड़ सहित कई किले बनाए।[114][115]

पंजाबी लोक-कथा के अनुसार, सियालकोट का प्रारंभिक इतिहास राजा शालिवाहन और उनके बेटे रिसालू की परंपराओं के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है। यह एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक तथ्य है कि राजा 'शालिवाहन और रसालू' भाटी वंश के थे। शालिवाहन ने सियालकोट शहर को फिर से स्थापित किया और रावी और चिनाब नदियों के बीच के क्षेत्र पर शासन किया। माना जाता है कि शालिवाहन ने पत्थर के स्लैब और चट्टानों के साथ किले की मरम्मत और विस्तार के लिए 10,000 से अधिक मजदूरों और राजमिस्त्री का इस्तेमाल किया, जिन्हें पठानकोट से लाया गया था।[116]

सियालकोट क्षेत्र सोलहवीं शताब्दी में भी एक गुर्जर गढ़ था, 'बाबर नामा, बाबर रिकॉर्ड: अगर कोई हिंदुस्तान में जाता है, तो जाट और गुर्जर हमेशा पहाड़ी से अनगिनत भीड़ में नीचे गिरते हैं। ये बदकिस्मत लोग बेहूदा ज़ालिम हैं। पहले, उनके कर्मों ने हमारी चिंता नहीं की क्योंकि क्षेत्र एक दुश्मन था। लेकिन उन्होंने वही बेहूदा काम किया जिसके बाद हमने उस पर कब्जा कर लिया। जब हम सियालकोट पहुँचे, तो उन लोगों पर झपट्टा मारा, जो शहर से हमारे कैंप की तरफ आ रहे थे। मेरे पास बुद्धिहीन ब्रिगेड थी, और उनमें से कुछ को टुकड़ों में काटने का आदेश दिया [117] [118]

वर्तमान मे सियालकोट पाकिस्तान में पंजाब प्रांत के उत्तर-पूर्व में चेनाब नदी के पास कश्मीर पहाड़ियों के तल पर स्थित है। यह शहर लाहौर से लगभग 125 किलोमीटर उत्तर में है। सियालकोट गुर्जर आबादी वाले क्षेत्रों से घिरा हुआ है, उत्तर में जम्मू, उत्तर-पश्चिम में गुजरात, पश्चिम में गुजरांवाला और दक्षिण में नरोवाल से घिरा है। सियालकोट में ही 25% गुर्जर आबादी है।

संदर्भ[संपादित करें]

  1. Atreyi Biswas, The Political History of Hunas in India, Munshiram Manoharlal Publishers, 1973.
  2. भगवत शरण उपाध्याय, भारतीय संस्कृति के स्त्रोत, नई दिल्ली, 1991.
  3. वी. ए. स्मिथ, “दी गुर्जर्स ऑफ़ राजपूताना एंड कन्नौज”,जर्नल ऑफ़ दी रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड, 1909, प. 53-75.
  4. विलियम क्रुक,” इंट्रोडक्शन”, अनाल्स एंड एंटीक्विटीज़ ऑफ़ राजस्थान, खंड I, ( संपा.) कर्नल टॉड.
  5. ए. आर. रुडोल्फ होर्नले, “सम प्रोब्लम्स ऑफ़ ऐन्शिएन्ट इंडियन हिस्ट्री, संख्या III. दी गुर्जर क्लैन्स”, जे.आर.ए.एस.,1905, प. 1- 32.
  6. हरमन गोएत्ज़, “दी अर्ली वुडेन टेम्पल ऑफ़ चंबा: रीजोइंडर”, आर्टईबुस एशिए (Artibus Asiae), खंड 19, संख्या 2, 1956, प. 162.
  7. सेमुअल बील,बुद्धिस्ट रिकॉर्ड ऑफ़ वेस्टर्न वर्ल्ड, (हेन सांग, सी यू की का अनुवाद), लन्दन, 1906, प. 165-173.
  8. एम. ए स्टीन (अनु.), राजतरंगिणी, खंड II प. 464.
  9. K.B Pathak, "New Light on Gupt Era and Mihirkul", Commemorative Essay Presented to Sir Ramkrishan Gopal Bhandarkar, poona, 1909, Page - 195-222.
  10. Harman Goetz, Studies in History and art of Kashmir and The Indian Himalyas, 1969, Page - 81.
  11. आर.सी.मजूमदार, प्राचीन भारत.
  12. ऐरण सागर अभिलेख.
  13. जे. एफ. फ्लीट, कोर्पस इनस्क्रिपशनम इंडीकेरम, खंड III, कलकत्ता, 1888, प. 158-160.
  14. K C Ojha, History of foreign rule in Ancient India,  Allahbad, 1968.
  15. The dates of Mihirakula are not know but he can be assigned to c. AD 535; Richard Salomon, "New Inscriptional Evidence for the History of the Aulikaras of Mandasor," Indo-Iranian Journal 32 (1989): 1-39.
  16. राजतरंगिणी, खंड II प. 464.
  17. मंदसोर अभिलेख.
  18. Prameswarilal Gupta, Coins, New Delhi, 1969.
  19. भारत मे हूणो का राजनैतिक इतिहास, अत्रेयी बिसवाश.
  20. Upendera Thakur, The Hunas in India.
  21. कल्हण राजतरंगिणी ग्रंथ.
  22. Tod, Annals and Antiquities of Rajasthan, vol.2.
  23. V A Smith, Earley History of India.
  24. J M Campbell, The Gujar, Gazeteer of Bombay Presidency, vol.9, part.2, 1896.
  25. D R Bhandarkarkar Gurjaras, J B B R A S, Vol.21, 1903.
  26. Tod, Annals and Antiquities of Rajasthan, edit. William Crooke, Vol.1, Introduction.
  27. सुशील भाटी, “शिव भक्त सम्राट मिहिरकुल हूण”,आस्पेक्ट ऑफ़ इंडियन हिस्ट्री, समादक- एन आर. फारुकी तथा एस. जेड. एच. जाफरी, नई दिल्ली, 2013, प. 715-717.
  28. जे.एम. कैम्पबैल, दी गूजर”, बोम्बे गजेटियर, खण्ड IX, भाग 2, 1901, प. 501.
  29. के. बी. पाठक, “न्यू लाइट ऑन गुप्त इरा एंड मिहिरकुल”, कोमेमोरेटिव एस्से प्रेजेंटीड टू सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर, पूना,1909, प.195-222.
  30. हरमन गोएत्ज़, स्टडीज इन हिस्ट्री एंड आर्ट ऑफ़ कश्मीर एंड दी इंडियन हिमालयाज, 1969, प. 81.
  31. रामशरण शर्मा, इंडियन फ्यूडलइस्म, दिल्ली, 2009, प.110.
  32. राजेंदर प्रसाद, ए हिस्टोरिकल-डेवलपमेंटल स्टडी ऑफ़ क्लासिकल इंडियन फिलोसफी ऑफ़ मोराल्स,खंड XII भाग II  प.409.
  33. "हरमन गोएत्ज़, दी अर्ली वुडेन टेम्पल ऑफ़ चंबा, लिडेन,1955, प. 85".
  34. वही,हरमन गोएत्ज.
  35. वही, हरमन गोएत्ज, प.85.
  36. वही, वी. ए. स्मिथ, प. 61.
  37. वही, वी. ए. स्मिथ, प. 60-61.
  38. वही, ए. आर. रुडोल्फ होर्नले, प. 1- 4.
  39. "हरमन गोएत्ज़, "दी अर्ली वुडेन टेम्पल ऑफ़ चंबा: रीजोइंडर", आर्टईबुस एशिए (Artibus Asiae), खंड 19, संख्या 2, 1956, प. 162".
  40. एच. वी. इस्टाटेनक्रोन (H V Stietencron) द्वारा उदधृतहिन्दू मिथ, हिन्दू हिस्ट्री, दिल्ली, 2005, प 21.
  41. वही,J.F.Flit, Corps Inscriptionam Indicareum, Part 3, Calcutta, 1888, 158-160.
  42. वही, हरमन गोएत्ज़.
  43. "कैथरीन विल्किनसन (परियोज़ना संपादक), साइन एंड सिंबल: एन इलसट्रेटिड टू देयर ओरिजिन एंड मीनिंग, लन्दन, 2008, पेज 5". आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 140533648X.
  44. "एस. वी. टोमोरी, न्यू व्यू ऑफ़ अर्थुरियन लेजेंड्स, प 92" (PDF).
  45. वैलरे पोर्टर तथा अन्य, मैसनस वर्ल्ड एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ लाइवस्टॉक ब्रीड्स एंड ब्रीडिंगस, बोस्टन, 2016 प. 522 .
  46. "रोस्स लेडलॉ, अटीला दी स्करेज़ ऑफ़ गॉड, ईडनबर्ग, 2007". आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0857900714.
  47. ""बुजाईस" (Buzice),Czech Statistical Office: Municipalities of Strakonice District".
  48. "लार्ड ऑफ़ रोज़ेन्टल,The Hunnic Languages of the Attila Clan" - Omeljan Pritsak - Cambridge study, 1982" (PDF).
  49. वही,रोस्स लेडलॉ, अटीला दी स्करेज़ ऑफ़ गॉड, ईडनबर्ग, 2007.
  50. "सी. ई. बोस्वर्थ, हिस्ट्री ऑफ़ अल ताबारी, खंड V, न्यूयोर्क,1999 प.152". आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0791497224.
  51. ए. कुर्बनोव, दी हेप्थालाइटस: आरकिओलोजिकल एंड हिस्टोरिकल एनालिसिस ( पी.एच.डी थीसिस) बर्लिन 2010, प. 100n.
  52. वही,ए. कुर्बनोव.
  53. डी. बी. पाण्डेय, दी शाहीज़ ऑफ़ अफगानिस्तान एंड दी पंजाब, दिल्ली, 1973, प 55.
  54. वही, डी. बी. पाण्डेय, दी शाहीज़ ऑफ़ अफगानिस्तान एंड दी पंजाब, दिल्ली, 1973, प 56-57.
  55. वही,डी. बी. पाण्डेय, दी शाहीज़ ऑफ़ अफगानिस्तान एंड दी पंजाब, दिल्ली, 1973, प. 56.
  56. अर्थर एल. फ्राइडबर्ग एंड इरा एस फ्राइडबर्ग, गोल्ड कोइंस ऑफ़ दी वर्ल्ड फ्रॉम एंशीएन्ट टाइम्स टू दी प्रेजेंट, न्यू जर्सी, प.457.
  57. बी. एन. पुरी, हिस्ट्री ऑफ गुर्जर-प्रतिहार, नई दिल्ली, 1986, प. 12-13.
  58. ए. बी. कीथ, ए हिस्ट्री ऑफ़ संस्कृत लिटरेचर, दिल्ली, 1996, प. 25.
  59. वही, हरमन गोएत्ज़, “दी अर्ली वुडेन टेम्पल ऑफ़ चंबा: रीजोइंडर”.
  60. आर. सी. मजुमदार तथा ए. एस.अल्तेकर, वाकाटक-गुप्त ऐज सिरका 200-550 A.D, दिल्ली 1986, प.198.
  61. डी. आर. भण्डारकर, “फारेन एलीमेण्ट इन इण्डियन पापुलेशन”, इण्डियन ऐन्टिक्वैरी खण्डX L, 1911,.
  62. वही, ए. कुर्बनोव, प. 65.
  63. वही, बी. एन. पुरी, प. 51.
  64. (क) वही, जे.एम. कैम्पबैल, प. 493.
  65. राजपूताना गजेटियर, खंड I, कलकत्ता, 1879, प.90.
  66. वही, ए. कुर्बनोव, प. 96n- 97.
  67. वही, ए. कुर्बनोव द्वारा उदधृत, प. 96n.
  68. वही, ए. कुर्बनोव द्वारा उदधृत, प. 100.
  69. वही, ए. कुर्बनोव द्वारा उदधृत, प. 16.
  70. वही, वी. ए. स्मिथ, प. 53-75.
  71. वही, V.A.smith,.
  72. वही, सेमुअल बील, प. 269-270.
  73. वही, जे.एम. कैम्पबैल,  प. 488.
  74. वी. ए. स्मिथ, “व्हाइट हूण कोइन ऑफ़ व्याघ्रमुख ऑफ़ दी चप (गुर्जर) डायनेस्टी ऑफ़ भीनमाल”, जर्नल ऑफ़ रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड, 1907, प 923-928.
  75. वही, वी. ए. स्मिथ, “दी गुर्जर्स ऑफ़ राजपूताना एंड कन्नौज”, जर्नल ऑफ़ दी रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड, 1909, प. 53-75.
  76. वी.ऐ.स्मिथ, प 60.
  77. "वही, अर्थर एल. फ्राइडबर्ग एंड इरा एस फ्राइडबर्गप.457".
  78. वही, रामशरण शर्मा, इंडियन फ्यूडलइस्म, दिल्ली, 2009, प.111.
  79. वही, रमाशंकर त्रिपाठी, प. 247.
  80. चन्द्र बरदाई कृत पृथ्वीराज रासो.
  81. D R Bhandarkar, Gurjaras, J B B R A S, Vol. 21, 1903.
  82. A. R. Rudolf Hornle, “The Gurjara clans, some problems of ancient Indian History” No. III. JRAS, 1905, pp 1-32.
  83. विन्सेंट ए. स्मिथ, दी ऑक्सफोर्ड हिस्टरी ऑफ इंडिया, चोथा संस्करण, दिल्ली.
  84. जे.एम. कैम्पबैल, दी गूजर (लेख), बोम्बे गजेटियर खण्ड IX भाग 2, बोम्बे, 1899.
  85. बी. एन. पुरी. हिस्ट्री ऑफ गुर्जर-प्रतिहार, नई दिल्ली, 1986.
  86. होर्नले, भारतीय इतिहास.
  87. A. Cunningham, Ancient Geography of India, London, 1870.
  88.  J M Campbell, ‘The Gujar’ Gazeteer of Bombay Presidency, Vol. IX, Part II, 1896.
  89. ऐ.आर.रडोल्फ होर्नले, “The Gurjara clans, some problems of ancient Indian History” No. III. JRAS, 1905, pp 1-32.
  90. D R Bhandarkar, Gurjaras, J B B R A S, Vol. 21, 1903, According to Chandra Bardai, Prithviraj Raso, the monastery of Gurjar-Pratihar, Chalukya / Solanki, Parmar / Panwar and Chauhan were the Gurjars of Huna origin. Hornelo Historians consider Tomars Chalukyas as the Gurjar of Hun's origin.
  91. डी.आर.भंडारकर, दी गुर्जर,.
  92. विन्सेंट ए. स्मिथ, दी ऑक्सफोर्ड हिस्टरी ऑफ इंडिया, दिल्ली.
  93. बोम्बे गजेटियर.
  94. V. A. Smith, W. 61, A. R. Rudolf Hornley, "Some Problems of Ancient Indian History, Number III. The Gurjar Clans ", J.R.A.S., 1905, p. 1-32.
  95. Tod, Annals and antiquities of Rajasthan, Edit. William Crooke, Vol. I, Introduction.
  96.  J M Campbell, ‘The Gujar’ Gazeteer of Bombay Presidency, 1896.
  97. डी.सी.गांगुली 1981, पृ॰ 704.
  98. Sailendra Nath Sen 1999, पृ॰ 339.
  99. Dilip Kumar Ganguly 1984, पृ॰प॰ 116-117.
  100. A.M.T. Jackson, Binhamal (article), Bombay Gazetteer section 1 part 1, Bombay, 1896.
  101. Vincent A. Smith, The Oxford History of India, Fourth Edition, Delhi.
  102. Puri 1957.
  103. Vincent A. Smith, The Oxford History of India, Fourth Edition, Delh.
  104. विन्सेंट ए. स्मिथ.
  105. वी.ऐ.स्मिथ, व्हाइट हूण कोइन ऑफ़ व्याघ्रमुख ऑफ़ दी चप (गुर्जर) डायनेस्टी ऑफ़ भीनमाल.
  106. ब्रह्मस्फुट ग्रंथ.
  107. Aurel Stein, Ázsia halott szívében (In Asia’s dead heart), Budapest, 1985, Helikon.
  108. जैनद शिलालेख, हैदराबाद.
  109. R. Rudolf Hornle, “The Gurjara clans, some problems of ancient Indian History” No. III. JRAS, 1905, pp 1-32.
  110. कर्नल टाॅड.
  111. वी. ए. स्मिथ, “व्हाइट हूण कोइन ऑफ़ व्याघ्रमुख ऑफ़ दी चप (गुर्जर) डायनेस्टी ऑफ़ भीनमाल”,जर्नल ऑफ़ रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड, 1907, प 923-928.
  112. डी. आर. भण्डारकर, “फारेन एलीमेण्ट इन इण्डियन पापुलेशन”, इण्डियन ऐन्टिक्वैरी खण्डX L, 1911.
  113. "खानदेश डिस्ट्रिक्ट गजेटियर".
  114. Kalhan's Rajtaranini of 13th CE.
  115. Rama Shankar Tripathi, History of Ancient India, Delhi, 1987.
  116. P.C Bagchi, India and Central Asia, Calcutta, 1965.
  117. Babarnama, Babar Records.
  118. V.A.Smith, Early History of India.