हिन्द-आर्य भाषाओं में श्वा विलोपन

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श्वा विलोपन वह प्रतिक्रिया है जिसमें हिन्दी, कश्मीरी, पंजाबी, गुजराती, मराठी, बंगाली, मैथिली और बहुत-सी अन्य आधुनिक हिन्द-आर्य भाषाओँ में सही उच्चारण के लिए उनकी लिपियों के व्यंजनों में निहित श्वा की ध्वनि (जो कि हिन्दी में 'अ' है) को त्यागना अनिवार्य है।[1][2] यह विलोपन करना उन भाषाओँ के मातृभाषियों के द्वारा समझे जाने के लिए और बोलने वाले का लहजा सही प्रतीत होने के लिए बहुत ज़रूरी है। इस श्वा विलोपन के बिना वाचक या तो स्पष्ट ग़ैर-मातृभाषी लगता है या फिर उसे समझने में ही कठिनाई हो सकती है। श्वा विलोपन कम्पयूटर द्वारा लिखित सामाग्री को पढ़ने में (मसलन नेत्रहीन लोगों की सुविधा के लिए) और भाषाओँ को सीखने वालों के लिए चुनौती होती है क्योंकि इन भाषाओँ की लिपियाँ अक्सर यह स्पष्ट नहीं करती कि श्वा कहाँ रखना चाहिए और कहाँ त्यागना चाहिए।[3]

हिन्दी में श्वा विलोपन[संपादित करें]

आधुनिक हिन्दी को लिखने के लिए देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जाता है, जिसमें औपचारिक रूप से हर व्यंजन के अंत में अगर हलंत न लगा हो तो 'अ' कि ध्वनि जोड़ी जाती है। लेकिन हिन्दी के सही उच्चारण के लिए हिन्दी का 'श्वा विलोपन नियम' कहता है कि शब्दों के अंत में और कुछ और परिस्थितियों में अक्सर यह श्वा हटा दिया जाता है। इसे कभी-कभी इस प्रकार से लिखा जाता है: 'अ -> ø | स्वर व्यंजन _व्यंजन स्वर'। इसका अर्थ है कि अगर लिपि के अनुसार किसी स्वर के उपरान्त आने वाले व्यंजन के बाद श्वा ('अ' ध्वनि) आता है और उसके बाद एक व्यंजन आता है जिसके पीछे भी एक स्वर लगा हो, तो उस बीच के श्वा को त्याग दिया जाता है। मसलन 'अजगर' शब्द को देखा जाए तो यह 'अ+ज्+अ+ग्+अ+र्+अ' है लेकिन शब्द के अंत वाला 'अ' और 'अ+ज्' और 'ग्+अ' के बीच का 'अ' दोनों हटा दिए जाते हैं, जिस से 'अजगर' शब्द का साधारण बोलचाल में सही हिन्दी उच्चारण 'अज्गर्' है। अक्सर यह बात अंग्रेजी में लिप्यान्तरण करने में स्पष्ट हो जाती है। 'पटना' शहर को देखा जाए तो लिपि के अनुसार यह 'प्+अ+ट्+अ+न्+आ' है, जो अंग्रेजी में 'patanā' लिखा जाएगा ('ā' दीर्घ 'आ' की ध्वनि है)। लेकिन श्वा विलोपन नियम बीच का श्वा हटा देता है, इसलिए वास्तव में सही उच्चारण 'प्+अ+ट्+न्+आ' है, यानी 'pat.nā'। उसी तरह 'उत्तर प्रदेश' को अगर औपचारिक लिपि के अनुसार देखा जाए तो यह 'uttara pradesha' होना चाहिए, लेकिन श्वा विलोपन की वजह से यह 'uttar pradesh' बन जाता है।[4][5]

ध्यान दीजिये कि श्वा विलोपन के कारण कुछ अक्षरों के गुटों का उच्चारण उनकी शब्द में परीस्थिती के अनुसार बदल जाता है। 'सरल' का उच्चारण 'स्+अ+र्+अ+ल्' (सरल् 'saral') है जिसमें अंत का श्वा विलोपित है। लेकिन 'सरला' में नियमानुसार बीच के 'र' का 'अ' हटा दिया जाता है, यानी 'स्+अ+र्+ल्' (सर्ला 'sar.lā')। उसी तरह 'पालक' (पालक् pālak) और 'पालकी' (पाल्की 'pāl.ki') में बीच के 'ल' का श्वा पहले तो रखा जाता है लेकिन दुसरे शब्द से हटा दिया जाता है। उसी तरह 'दिल की धड़कने' में 'धड़कने' का सही उच्चारण 'धड़्कने' (dhad.kane) है, यानि 'ड़' का श्वा हटाया गया। लेकिन 'दिल धड़कने लगा' में 'धड़कने' का सही उच्चारण 'धड़क्ने' (dhadak.ne) है, यानि इस दफ़ा 'ड़' का श्वा रखा गया लेकिन 'क' का श्वा हटाया गया। हिन्दी के मातृभाषी इन शब्दों को बिना सोचे आराम से सही उच्चारित करते हैं, लेकिन ग़ैर-मातिभाषियों और कम्पयूटरों के लिए यह कठिनाई पैदा करते हैं। अक्सर उनके ग़लत उच्चारण से उनकी बोली 'अजीब' और 'सुनने वाले के लिए समझनें में कठिन' लगती है।[6]

कुछ उदाहरण[संपादित करें]

शब्द सही उच्चारण लिप्यन्तरण ग़लत लिप्यन्तरण टिप्पणी
जलन जलन् jalan jalana आँखों में जलन - अंतिम अक्षर 'न' पर हलन्त न लगे होने के बावजूद हलन्त-जैसा उच्चारण अनिवार्य है
जलना जल्ना jalnā jalanā आँखों का जलना - इस रूप में शब्द के मध्य अक्षर 'ल' पर न लिखे होने पर भी हलन्त लगता है
धड़कने धड़्कने dhaṛkaneṅ dhaṛakaneṅ दिल धड़कने लगा - यहाँ 'ड़' पर श्वा ग्रहण लागू है
धड़कनें धड़क्नें dhaṛakne dhaṛakane दिल की धड़कनें - यहाँ 'क' पर श्वा ग्रहण लागू है
नमक नमक् namak namaka अहिन्दी लहजे से बोलने वाले अंतिम वर्ण ('क') पर कभी-कभी श्वा विलोपन नहीं करते जो हिन्दी मातृभाषियों को 'नमका' सा प्रतीत होता है
नमकीन नम्कीन् namkīn namakīna नमक में 'क' पर श्वा विलोपन हुआ था, लेकिन 'नमकीन' में श्वा विलोपन, शब्द के मध्य में 'म' और शब्द के अंत में 'न' पर है; अहिन्दी लहजे से बोलने वाले इन वर्णों पर कभी-कभी श्वा ग्रहण नहीं करते जो हिन्दी मातृभाषियों को 'नमाकीना' सा प्रतीत होता है
उत्तर प्रदेश उत्तर् प्रदेश् uttar pradesh uttara pradesha अहिन्दी लहजे से बोलने वाले इन वर्णों पर कभी-कभी श्वा विलोपन नहीं करते जो हिन्दी मातृभाषियों को 'उत्तरा प्रदेशा' सा प्रतीत होता है
तुलसी तुल्सी tulsī tulasī शब्द के मध्य वाले 'ल' पर श्वा विलोपन न करने से शब्द हिन्दी मातृभाषियों को 'तुलासी' सा प्रतीत होता है
पलक पलक् palak palaka आँख की पलक - एकवचन शब्द 'पलक' में 'क' पर श्वा विलोपन है
पलकें पल्कें palkeṅ palakeṅ आँखों की पलकें - बहुवचन शब्द 'पलकों' में श्वा विलोपन 'क' से हट के 'ल' पर लग जाता है

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Language, speech, and mind, Larry M. Hyman, Victoria Fromkin, Charles N. Li, Taylor & Francis, ISBN 0-415-00311-3, ... The implicit /a/ is not read when the symbol appears in word-final position or in certain other contexts where it is obligatorily deleted (via the so-called schwa-deletion rule which plays a crucial role in Hindi word phonology ...
  2. Indian linguistics, Volume 37, Linguistic Society of India, 1976, ... the history of the schwa deletion rule in Gujarati has been examined. The historical perspective brings out the fact that schwa deletion is not an isolated phenomenon; the loss of final -a has preceded the loss of medial -a-; ...
  3. A history of the Hindi grammatical tradition: Hindi-Hindustani grammar, grammarians, history and problems, Tej K. Bhatia, BRILL, 1987, ISBN 90-04-07924-6, ... Hindi literature fails as a reliable indicator of the actual pronunciation because it is written in the Devanagari script ... the schwa syncope rule which operates in Hindi ...
  4. A Diachronic Approach for Schwa Deletion in Indo Aryan Languages, Monojit Choudhury, Anupam Basu and Sudeshna Sarkar, Proceedings of the Workshop of the ACL Special Interest Group on Computational Phonology (SIGPHON), July 2004, Association for Computations Linguistics, ... schwa deletion is an important issue for grapheme-to-phoneme conversion of IAL, which in turn is required for a good Text-to-Speech synthesizer ... Sanskrit rəcəna, Hindi rəcna, Bengali rɔcona ...
  5. Prosodic rules for schwa-deletion in hindi text-to-speech synthesis, Naim R. Tyson, Ila Nagar, International Journal of Speech Technology, 2009 (12:15–25), ... Without the appropriate deletion of schwas, any speech output would sound unnatural. Since the orthographical representation of Devanagari gives little indication of deletion sites, modern TTS systems for Hindi implemented schwa deletion rules based on the segmental context where schwa appears ...
  6. A Rule Based Schwa Deletion Algorithm for Hindi, Monojit Choudhury and Anupam Basu, Proceedings of the International Conference On Knowledge-Based Computer Systems, July 2004, ... Without any schwa deletion, not only the two words will sound very unnatural, but it will also be extremely difficult for the listener to distinguish between the two, the only difference being nasalization of the e at the end of the former. However, a native speaker would pronounce the former as dha.D-kan-eM and the later as dha.Dak-ne, which are clearly distinguishable ...