सैमुअल पी॰ हंटिंगटन

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सैमुअल पी॰ हंटिंगटन
Samuel P. Huntington (2004 World Economic Forum).jpg
जनवरी 2004 में हंटिंगटन
जन्म

सैमुअल फ़िलिप्स हंटिंगटन

Samuel Phillips Huntington
18 अप्रैल 1927
न्यू यॉर्क शहर, न्यू यॉर्क, संयुक्त राज्य अमेरिका
मृत्यु दिसम्बर 24, 2008(2008-12-24) (उम्र 81)
Martha's Vineyard, मैसाचुसेट्स, संयुक्त राज्य अमेरिका
राष्ट्रीयता अमेरिकी
राजनैतिक पार्टी डेमोक्रेटिक पार्टी[1]

सैमुअल फिलिप्स हंटिंगटन (अप्रैल 18, 1927 - 24 दिसंबर, 2008) एक अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक, सलाहकार और अकादमिक थे। उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में पचास साल से ज़्यादा बिताए, जहां वे हार्वर्ड के सेंटर फॉर इंटरनेशनल अफेयर्स के निदेशक और प्रोफ़ेसर थे। जिमी कार्टर की अध्यक्षता के दौरान, हंटिंगटन नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के लिए सुरक्षा योजना के व्हाइट हाउस समन्वयक थे। दक्षिण अफ्रीका में 1980 के रंगभेद युग के दौरान, उन्होंने पीडब्लू बोथा की सुरक्षा सेवाओं के सलाहकार के रूप में कार्य किया। उनकी विवादास्पद पुस्तक "हू आर वी? द चैलेंजेस टू अमेरिकाज नेशनल आइडेंटिटी " (कौन हैं हम? अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौतियाँ) (2004) ने अमेरिका से आह्वान किया कि वह "लातिनो और इस्लामी प्रवासियों के खतरों" से अपने आप को बचाने के लिए "प्रोटेस्टेंट धर्मों" को अपनाए और इन प्रवासियों को अंग्रेज़ी भाषा अपनाने के लिए बाध्य करे। उन्हें डर था कि ऐसा न करने पर अमेरिका भविष्य में दो अलग गुटों में बँट सकता है।

" क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन्स " (सभ्यताओं का संघर्ष) उनका सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत है, जो उन्होंने 1993 में दिया था। यह शीत युद्ध की समाप्ति के बाद बानी नई विश्व व्यवस्था के संदर्भ में था। इसमें उन्होंने तर्क दिया कि भविष्य के युद्ध देशों के बीच नहीं, बल्कि संस्कृतियों के बीच लड़े जाएंगे, और यह कि इस्लामी चरमपंथ विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाएगा। हंटिंगटन को नागरिक-सैन्य संबंधों, राजनीतिक विकास और तुलनात्मक प्रशासन पर अमेरिकी विचारों को आकार देने में मदद करने का श्रेय दिया जाता है- यहां तक कि वर्तमान ट्रम्प प्रशासन में भी। [1]

अमेरिकी विदेश नीति पर उनके प्रभाव की तुलना ब्रिटिश विदेश नीति पर जोज़फ अर्नाल्ड ट्वानबी के प्रभाव से की जाती है।

उल्लेखनीय तर्क[संपादित करें]

"सभ्यताओं का संघर्ष"[संपादित करें]

हंटिंगटन की "सभ्यताओं के संघर्ष" से नौ "सभ्यताओं" का नक्शा।

हंटिंगटन ने 1993 में फ़ॉरेन अफ़ेयर्स पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख "द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन?" से अंतर्राष्ट्रीय संबंध सिद्धांतकारों के बीच एक बड़ी बहस भड़काई। अपने लेख में उन्होंने यह तर्क दिया कि, सोवियत संघ के पतन के बाद, इस्लाम दुनिया पर पश्चिमी देशों के प्रभुत्व को क़ायम रखने में सबसे बड़ी बाधा बन जाएगा। उनके मुताबिक़ पश्चिम का अगला बड़ा युद्ध इसलिए अनिवार्य रूप से इस्लाम के साथ होगा।[2] शीतयुद्ध के बाद की भू-राजनीति और "अस्थिरता की अनिवार्यता" का इसका वर्णन उनके शिष्य फ्रांसिस फुकुयामा के प्रभावशाली सिद्धांत इतिहास का अंत (जिसके अनुसार पश्चिमी उदारवादी लोकतंत्र की उत्पत्ति मनुष्य के राजनैतिक विकास की चरम सीमा है) के ठीक उलट है।

हंटिंगटन ने "सभ्यताओं के संघर्ष?" का विस्तार करते हुए एक किताब लिख दी- "द क्लैश अव सिविलिजेशंस एंड द रिमेकिंग अव वर्ल्ड ऑर्डर" (सभ्यताओं का संघर्ष और विश्व व्यवस्था का पुनर्निर्माण)। लेख और पुस्तक का कहना है कि शीत युद्ध के बाद का सबसे अधिक और हिंसक रूप का संघर्ष वैचारिक मतभेदों के बजाय सांस्कृतिक रूप से होगा। शीत युद्ध के दौरान, पूंजीवादी पश्चिम और साम्यवादी पूर्व के बीच संघर्ष हुआ। अब इसके दुनिया की प्रमुख सभ्यताओं के बीच होने की संभावना थी - सात की पहचान, और एक संभावित आठवें:

  1. पश्चिमी
  2. लैटिन अमेरिकी
  3. इस्लामिक
  4. सिनिक (चीनी)
  5. हिंदू
  6. रूढ़िवादी ईसाई
  7. जापानी
  8. अफ्रीकी

यह सांस्कृतिक तौर पर संगठन उस समय की सोच से भिन्न है, जब राज्यों को सार्वभौमिक मानकर चिंतन किया जाता था। वर्तमान और भविष्य के संघर्ष को समझने के लिए नीतिकारों को विभिन्न संस्कृतियों में मौजूद द्वंद्व को समझना चाहिए। इस प्रकार सांस्कृतिक तनावों के अपरिवर्तनीय स्वरूप को पहचानने में यदि वे विफल हुए, तो पश्चिमी राष्ट्र अपनी प्रबलता खो देंगे। हंटिंगटन ने तर्क दिया कि भू-राजनीतिक संगठन और संरचना में शीत-युद्ध के इस बदलाव के बाद पश्चिम को सांस्कृतिक रूप से अपने लोकतांत्रिक सार्वभौमिकता के आदर्श और निरंतर रूप से दूसरे देशों में सैन्य हस्तक्षेप करना छोड़ कर खुद को सांस्कृतिक तौर पर मज़बूत बनाना होगा। इस बिंदु को रेखांकित करते हुए, हंटिंगटन ने 1996 के विस्तार में लिखा, "जातीय संघर्ष और सभ्यतागत संघर्ष की उभरती दुनिया में, पश्चिमी सभ्यता की यह सोच कि पश्चिमी संस्कृति सार्वभौमिक है, यह तीन समस्याओं से ग्रस्त है: यह गलत है; यह अनैतिक है; और यह खतरनाक है।" [3]

न्यू यॉर्क टाइम्स ने सैमुअल हंटिंगटन की मृत्यु पर जारी शोक संदेश में बताया कि उनका "राज्यों या जातीयताओं के विपरीत, उनका प्राचीन धार्मिक साम्राज्यों पर जोर, [वैश्विक संघर्ष के स्रोतों के रूप में] ... 11 सितम्बर के हमलों के बाद और अधिक स्वाभाविक सिद्ध हुआ।" [4]

चयनित प्रकाशन[संपादित करें]

  • द सोल्जर एंड द स्टेट: द थ्योरी एंड पॉलिटिक्स ऑफ़ सिविल-मिलिट्री रिलेशंस (1957)
  • आम रक्षा: राष्ट्रीय राजनीति में रणनीतिक कार्यक्रम (1961)
  • बदलते समाजों में राजनीतिक आदेश (1968)
  • लोकतंत्र का संकट: मिशेल क्रोज़ियर और जोजी वतनुकी (1976) के साथ लोकतंत्र की प्रशासनशीलता पर
  • राजनीतिक शक्ति: यूएसए यूएसएसआर - समानताएं और विरोधाभास, कन्वर्जेंस या ज़बिनग्यू ब्रेज़िनिन्स (118) के साथ विकास
  • अमेरिकन पॉलिटिक्स: द प्रॉमिस ऑफ डिसोर्मनी (1981)
  • "लोकतंत्र की तीसरी लहर।" लोकतंत्र का जर्नल 2.2 (1991): 12-34। ऑनलाइन
  • द थ्री वेव: डेमोक्रेटाइज़ेशन इन द लेट ट्वेंटीथ सेंचुरी (1991)
  • द क्लैश ऑफ सिविलाइज़ेशन एंड रिमेकिंग ऑफ़ वर्ल्ड ऑर्डर (1996)
  • "बीस साल बाद: तीसरी लहर का भविष्य।" लोकतंत्र का जर्नल 8.4 (1997): 3-12। ऑनलाइन
  • हम कौन है? द हिस्पैनिक चैलेंज, फॉरेन पॉलिसी, मार्च / अप्रैल 2004 [5] लेख के आधार पर अमेरिका की राष्ट्रीय पहचान (2004) को चुनौती

संपादक के रूप में:

  • कल्चर मैटर्स: हाउ वैल्यूज़ शेप ह्यूमन प्रोग्रेस विथ लॉरेंस ई। हैरिसन (2000)
  • कई भूमंडलीकरण : पीटर एल बर्जर (2002) के साथ समकालीन दुनिया में सांस्कृतिक विविधता

संदर्भ[संपादित करें]

  1. Lewin, Tamar (December 28, 2008). "Samuel P. Huntington, 81, Political Scientist, Is Dead". The New York Times. अभिगमन तिथि June 9, 2015. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> अमान्य टैग है; "nytimes" नाम कई बार विभिन्न सामग्रियों में परिभाषित हो चुका है
  2. Haruna, Mohammed (26 September 2001). "Nigeria: September 11 And Huntington's Prophecy". Daily Trust.
  3. "A Guide to the Work of Samuel Huntington". contemporarythinkers.org.
  4. Samuel P. Huntington of Harvard Dies at 81, The New York Times, December 27, 2008
  5. Previous location, archived link

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]