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सार्वज्ञ्य

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सार्वज्ञ्य[1] सर्वज्ञान की क्षमता है। हिन्दू धर्म, सिख धर्म और इब्राहीमी धर्मों में, यह ईश्वर का एक गुण है। जैन धर्म में, सार्वज्ञ्य एक ऐसा गुण है जिसे कोई भी व्यक्ति अन्ततः प्राप्त कर सकता है। बौद्ध धर्म में सार्वज्ञ्य के बारे में विभिन्न मतों में विभिन्न मान्यताएँ हैं।

जैन दर्शन में सर्वज्ञ एवं सर्वज्ञता का स्वरूप

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जैन दर्शन में दर्शनकारों ने सर्वज्ञता की अनेक व्‍याख्‍याएं कही हैं। आचार्य पूज्‍यपाद कहते हैं- निरावरणज्ञाना: केवलिनः अर्थात आवरण रहित ज्ञान जिनका होता है वह केवली अर्थात सर्वज्ञ हैं।[2]

सन्दर्भ

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  1. www.wisdomlib.org (2020-04-22). "Sarvajnya, Sārvajñya, Sarva-jnya: 2 definitions". www.wisdomlib.org (अंग्रेज़ी भाषा में). अभिगमन तिथि: 2024-01-03.
  2. जैन दर्शन में सर्वज्ञ एवं सर्वज्ञता का स्वरूप