साँचा:Template sandbox

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

प्रलेखन प्रतीक साँचा प्रलेखन[देखें] [संपादन] [इतिहास] [पर्ज]

पुरुषसूक्त, मन्त्र-३, भगवान् का वैभव

एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोऽस्य विश्वाभूतानि त्रिपादस्यामृतंदिवि ।।3।।

पूर्व मन्त्र में समस्त जगत् को भगवान् का स्वरूप बतलाकर निखिल जीवों को मोक्षदाता भगवान् प्रतिपादित किये गये । जड प्रकृति और चेतन जीव दोनों श्रीहरि के शरीर होने से उनके अधीन हैं । जैसे हमारा शरीर हमारे अधीन है । हमारी

इच्छा के अनुरूप ही इसकी क्रियायें होती हैं । यही स्थिति समग्र प्रकृतिमण्डल तथा जीवों की है ।
जीवों का बन्धन और मोक्ष सब भगवदधीन है । यही भगवान् का वैभव है --इस तथ्य का उद्घाटन इस तृतीय मन्त्र से करते 

हुए परमात्मा की श्रेष्ठता बतला रहे हैं ---एतावान्---- के द्वारा । सर्वजगद्रूपता सकल जीवों के लिए मोक्षप्रदत्व जीव प्रकृति

के शरीरी होने से सर्वब्रह्माण्डस्वामित्व आदि, एतावान् = इतनी ,अस्य = इन परमात्मदेव की महिमा = वैभव है। 

अतो =इसलिए पूरुषः =ये भगवान् प्रकृति तथा समस्त जीवों से ज्यायान् = श्रेष्ठ हैं । यहां मन्त्र में च शब्द आया है । जो अकथित बातों को कहता है --चकरोऽनुक्तसमुच्चयार्थकः । वे तथ्य हैं भगवान् के सर्वजगत्कारणत्वसर्वरक्षकत्व आदि--- यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते---- । विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता । इनके कारण भी भगवान् जीव और प्रकृति से श्रेष्ठ हैं; क्योंकि जन्य तथा रक्ष्य से जनक एवं रक्षक श्रेष्ठ होता है ।

मन्त्र की द्वतीय पंक्ति से भगवान् का विशिष्ट वैभव बतला रहे हैं --पादो---। अस्य = इन सर्वनियन्ता भगवान् का , विश्वाभूतानि

= अनन्तानन्त जीव तथा अनन्तप्रकृतिमण्डल,पादः = सम्पूर्ण ऐश्वर्य का चतुर्थ भाग है । और, अस्य = इन श्रीहरि का ,त्रिपादः 

= तीनो पाद अर्थात् तीनो भाग, अमृतं =अविनाशी हैं। वे हैं अहड़्कार आदि से लेकर पृथिवी पर्यन्त तत्वों के अधिष्ठातृजीव, नित्यमुक्त = जो कभी संसार में आये ही नहीं और तीसरे हैं मुक्त जीव = जो भवबन्धन से छूटकर भगवदद्धाम पहुंच गये हैं ।

अथवा वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न --ये तीनो पाद (चिन्मय भगवद्धाम में हैं) । कहां हैं वे ? इसका उत्तर देते हैं --दिवि। दिव् शब्द का अर्थ है परमाकाश, स्वर्ग ,भगवद्धाम--- द्युशब्दः परमे व्योम्नि स्वर्गे वियति कथ्यते ---निघण्टु।

वास्तविक स्वर्ग भगवान् का धाम ही है ;क्योंकि वहां कभी भी दुःख का संस्पर्श नही होता । इन्द्र के स्वर्ग पर बार बार दैत्यादिकों का आक्रमण होने से वह दुःख का अनुभावक है अतः वह वास्तविक स्वर्ग नहीं। स्वर्ग उसे कहते हैं जो सुख दुःख से मिश्रित न हो , सुख के बाद भी कभी दुःख न हो , सड़्कल्पमात्र से उपलब्ध हो---

यन्न दुःखेन सम्भिन्नं न च ग्रस्तमनन्तरम्। अभिलाषोपनीतं च तत्सुखं स्वः पदास्पदम् ।।

ये भगवद्धाम है । अनन्त योजन विस्तार वाला--इसे भी भगवान् की त्रिपादविभूति के नाम से अभिहित किया गया है--

अनन्तायामविस्तारो वैकुण्ठः संप्रकीर्तितः । तस्मादस्य त्रिपादांशो वैकुण्ठो भासतेतराम् ।। - --वैकुण्ठसंहिता। तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः --सर्वव्यापक परमात्मा के उस परमधाम को मुक्तजन सदा देखते रहते हैं । इसे ही साकेत, गोलोक,शिवलोक आदि नामों से तत्तदुपासक कहते हैं।


जय श्रीराम-----

>>>>>>>आचार्य सियारामदास नैयायिक<<<<<<<