सप्तपर्ण

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सप्तपर्ण वृक्ष
सप्तपर्ण की एक डाली

विवरण[संपादित करें]

हि० - सतौना, सतवन, छतिवन, सतिवं। बं० - छातिम्। म० - सातवीण। गु० - सातवण। क० - हाले। ते० - एडाकुलरि। ता० - एलिलैप्पालै। ले० - Alstonia Scholaris.

सप्तपर्ण (वानस्पतिक नाम:Alstonia scholaris) का वृक्ष बहुत बड़ा होता है। इसे हिन्दी में छितवन भी कहते हैं। यह भारतीय उपमहाद्वीप का देशज वृक्ष है जो उष्णकटिबन्धीय तथा सदापर्णी (सदाबहार) है।

सतिवन का वृक्ष प्रायः सब आर्द्र प्रांतों में पाया जाता है। किंतु विशेषरुप से प० समुद्र के किनारे के जंगलों मेंं अधिक पाया जाता है। इसका वृक्ष - सुंदर, विशाल, सीधा, सदाहरित एवं क्षीरयुक्त होता है। शाखाएं तथा पत्ते चक्रिक क्रम में निकले रहते हैं।

पत्ते- प्रति वक्र में ३-७, प्रायः ६, चिकने, आयताकार-भालाकार या अभिअंडाकार ऊपर से चमकीले किंतु नीचे से श्वेताभ, ४-८ इंच लंबे तथा ६-१३ मि० मी० लंबे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-हरिताभ श्वेत तथा गुच्छे में आते हैं। फली- दो-दो एक साथ, नीचे लटकी हुई, १-२ फीट लंबी तथा ३ मि० मी० व्यास की होती है। बीज- ६ मि० मी० लंबे, चिपटे तथा रोमश होते हैं। छाल- टहनियों की ३-४ मि० मी० मोटी, मुडी हुई एवं काण्ड की ७ मि० मी० मोटी होती है। बाहर से नवीन छाल गहरे धूसर या भूरे रंग की तथा पुरानी बहुत खुरदरी, असमान, फटी हुई होती है। तथा उन पर अनेक गोल या आडे धूसर या सफेद धब्बे रहते हैं। अंदर से यह भूरे पीताभ या गहरे धूसराभ भूरे रंग की, कुछ धारीदार तथा गढेदार रहती है। यह गंधहीन एवं स्वाद में तित्क रहती है।

इसकी छाल, पत्र, पुष्प तथा दुग्ध क उपयोग किया जाता है।

रासायनिक संगठन[संपादित करें]

छाल में क्षाराभ की मात्रा ०.१३-०.२७% रहती है जिस में प्रधानता एचिटेमाइन (Echitamine, C23 H28 O4 N2 H2O) की मात्रा में एचिटामिडीन (Echitamidine, C20 H26 O3 N2) रहता है। क्षीर में केउटचौक (Caoutchouc) तथा राल होती है तथा इसका स्वाद कडुवा होता है।

गुण और प्रयोग[संपादित करें]

इसकी छाल उष्ण, तित्क, तित्कपौष्टिक, कषाय, स्तंभन, कृमिघ्र, स्तन्यजनन, दीपन एवं कुष्ठ्घ्न है। इसका उपयोग ज्वर, विषमज्वर, अतिसार, पवाहिका, चर्मरोग एवं कृमि में किया जाता है।

१. इससे ज्वर कम होता है। आधुनिक परीक्षणों से देखा गया है कि मलेरिया में कोई विशेष काम नहीं होता, केवल ज्वर का वेग कम होता है तथा बाद में तित्क पौष्टिक रुप में इससे लाभ होता है जिससे पाचन सुधरता है तथा मंदज्वर भी चला जाता है।

२. अतिसार एवं प्रवाहिक की जीर्णावस्था में समग्र त्वचा का काय लाभदायक होता है।

३. प्रसूति के पश्र्वात इसके साथ सुगंधि द्रव्य देने से दुग्ध की मात्रा बढती है तथा ज्वर नहीं आता तथा पाचन ठीक रहता है।

४. पुराने व्रणों पर इसका लेप करते हैं चर्मरोगों में क्षीर का लेप भी लाभदायक है।