सदस्य:Sneha george/प्रयोगपृष्ठ/2

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दो स्रोत परिकल्पना

परीकल्पना[संपादित करें]

प्रस्तावन[संपादित करें]

मनोवैज्ञानिक शोध का वप चाह प्र्योगात्मक हो या अप्र्योगात्मक हो, शोध समस्या का वैज्ञानिक तरीका से चयन हो जाने के पस्रीत शोधकता ʽपरिकल्पना का निर्माण करता है । अब प्रश्र यह उठता है की परीकल्पना से शोधकता का क्या तात्पर्य होता है तथा इसका है तथा इसका प्रतिपादन क्यों किया जाता है । चूँकि अब तक आप शोध समस या के बारे मैं जान एवं समझ चुके होंगे अत:प्रस्तुत इकाई मैं हम समस्या चयन के समाधान की दिशा मैं दूसरा कदम रखेंगे । इस इकाई मैं आप परिकल्पना का अर्थ एवं उसके विभिन्न्न प्रकारों के बारे मैं जानकारी प्राप्त करेंगे । परीकल्पना का ज्ञान आपको किसी भी शोध की समस्या के समधान की दीशा मैं चींतन का नया प्रदान करेगा ओर आपको वैज्ञानिक तरीके से परीकल्पना का निर्माण करने मैं सहायता [[प्रदान करेगा

परीकल्पनो के प्रकार[संपादित करें]

मनोविज्ञान ,समाजशास्त्र तथा शिक्षा के क्ष्॓त्र मैं ˞˞शोधकत्ता॔ओं द्वारा बनाये गए परिकल्पनाओ के स्वरूप पर यिद ध्यान दिया जाए तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि उसे कई प्रकारों मैं बाँटा जा सकता है | शोध वशेष ने परिकल्पना का निमनांकित तीन आधारों पर किया है ।


चरों के संख्या के आधार पर[संपादित करें]

सधारण परिकल्पना[संपादित करें]

[[साधारना परीकल्पना ऐसी परीकल्पना ऐसी परीकल्पन को कहा जाता है जिसमें चरों की संख्या मात्र दो होती है ओर सिर्फ इन्हीं दो चरों के सम्बन्ध द्वारा शोध समस्या का एक प्रस्तिवत उत्तर दिया जाता है । उदारण के लिए ,"बच्चों की बुद्धि"।

जिटल परिकल्पना[संपादित करें]

जिटल परिकल्पना ऐसी परिकल्पना को कहा जाता है जिसमें चरों की स्ंख्या दो से अधिक होती है ओर उनमें एक खास सम्बन्ध बतलाकर शोध समस्या का प्रसतिवत उत्तर तैयार किया जाता है । जैसे ,"शहर के उच्च सामािजक "

चरों मैं विशेष सम्बन्ध के आधार पर[संपादित करें]

सार्वत्रिक परिकल्पना[संपादित करें]

जैसा कि नाम से ही स्पप्ट है ,इस तरह के परिकल्पना का स्वरूप ही कुछ ऐसा होता है जो निहत चरों के सभी तरह के मानों के बीच सम्बन्ध को हर परिस्थित में हर समय बनाये रखता है । जैसे ,"मानव की सीखने की प्रक्रिया पुरस्कार तथा प्र्शंसा द्व्र्रा तेजी से होती है ",ऐसी परिकल्पना का उदारण है जिसमें बतालाया गया सम्बन्ध हर परिस्थित में हर समय प्रत्येक मानव पर लागू होता है ।

अस्तित्वात्मक परिकल्पना[संपादित करें]

वैसी परिकल्पना को कहा जाता हैं जो सभी व्यित्तयो या परिस्थितयों के लिए नहीं तो कम-से-कम एक व्यित्त या परिस्थित के लिए निनिश्रत रुप से सही होती है। जैसे , यिद यह परिकल्पना विकिसत की जाता है कि वग्र में कम-से-कम एक छात्र तो ऐसा है जिसमें सीखनें कि प्रक्रिया द्ण्ड देने से तेजी से होता है ।

विशिष्ट उद्देश्य के आधार पर[संपादित करें]

करणत्व परिकल्पना[संपादित करें]

व्यवहार के करणो को नियंनत्रित करने तथा उसकी व्यख्या के उद्देश्य के अनुसार शोधकर्ता कारणत्व परिकल्पना का निर्माण करते है। कारणत्व परिकल्पना एक ऐसी परिकल्पना होती है। जिसके माध्यम से व्यवहार का विशिष्ट करण या व्यवहार पर पडने वाले विशिष्ट प्र्भाव का व्यवहार होती हैं । उदारण के लिये शोधकर्ता यह परिकल्पना कर सकात है कि यकान से अभिराम में हास्य होता है।

वर्णनात्मक परिकल्पना[संपादित करें]

व्यवहार के बारे में पुर्वकथन तथा उसका वणॅन करने से शोधकर्ता वर्णनात्मक परिकल्पना का निर्माण करत है।वर्णनात्मक परिकल्पना वैसे परिकल्पना को कहा जाता है जो व्यवहार की व्याख्या उसकी विशेषताओं या उस पीरिस्थित जिसमें वह होता है,के रुप में करता है । इस तरह की परिकल्पना शोधकर्ता को व्यवहार के गुणों की पहचान करने में मदद करता है ओर उसे पूर्वकथन करने में भी मदद करता है ।

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  1. https://stattrek.com/hypothesis-test/hypothesis-testing.aspx
  2. https://en.wikipedia.org/wiki/Hypothesis