व्यवहार

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हिन्दू विधि के सन्दर्भ में व्यवहार एक महत्वपूर्ण संकल्पना है और विधिक प्रक्रिया का पर्याय है। कात्यायन ने इस शब्द का विश्लेषण इस प्रकार किया है- वयवहार = वि + अव + हार ; 'वि' का अर्थ 'विभिन्न' तथा 'अव' का अर्थ सन्देह है तथा हार का अर्थ 'हरना' या 'दूर करना' है। अर्थात यह (व्यवहार) विभिन्न प्रकार के सन्देहों को दूर करता है।

न्यायालय[संपादित करें]

बृहस्पति स्मृति के अनुसार भारत में चार प्रकार के न्यायालय होते थे --

  • १. प्रतिष्ठित (जो किसी पुर या ग्राम में प्रतिष्ठित हो),
  • २. अप्रतिष्ठित (जो एक स्थान पर प्रतिष्ठित न होकर विभिन्न ग्रामों में समय-समय पर स्थापित किये जाते थे),
  • ३. मुद्रित, तथा
  • ४. शासित।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]