सदस्य:Samyukta ingulika/कादम्बरी

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कादम्बरी[संपादित करें]

कादम्बरी

कादम्बरी संस्कृत में रूमानी ढंग से लिखा गया एक रोमांचक उपन्यास है। यह उपन्यास बाणभट्ट द्वारा ७ वी सदी की शुरुवात में लिखा गया था। परन्तु, उसकी समाप्ति तक वह जीवित नहीं रह सके तब यह उपन्यास उनके पुत्र भूषणभट्ट के द्वारा समाप्त किया गया। इस उपन्यास के दो भाग है: १) पूर्वभाग- जों स्वयं बाणभट्ट द्वारा लिखा गया। २) उत्तरभाग- जों उनके पुत्र भूषणभट्ट द्वारा लिखा गया।

इसका मानक संस्करण पीटरसन और केन द्वारा लिखा गया। इस उपन्यास का अंग्रजी रूपांतर केल, लेन, रीडिंग द्वारा किया गया। इसका गुजराती में संक्षिप्तीकरण भालन ने किया और इसके संपादक केशव ध्रुव है। कादम्बरी के अलावा बाणभट्ट ने हर्षचरित्र भी लिखा जों की राजा हर्षवर्धन की जीवनी है। कादम्बरी एक अत्यंत जटिल साजिश है जोंकि कटाई के साथ संक्षेप में प्रस्तुत करने के लिए मुश्किल है। यह एक रोमांटिक उपन्यास है, जिसके मुख्य पात्र नायक चन्द्रपीड और नायिका कादम्बरी है। इस उपन्यास में कई घटनाक्रम हैं। नायिका का उपन्यास में प्रवेश मध्यभाग में होता है। इस उपन्यास में कई चरित्र हैं जोंकि भिन्न-भिन्न रूपों में प्रस्तुत होते हैं। कभी मनुष्य रूप में, देवताओं के रूप में तो कभी जानवरों के रूप में। इस कहानी का मुख्य कथावाचक एक तोता है, जों कि पूरी कथा सुनाता है। यह कथा उस तोते को एक संन्यासी के द्वारा सिखाई गयी थी। कहां जाता है कि कादम्बरी को राजा सुमन की कहानी गुणाढ्य के वृहतकथा से लिया गया है। जोकि विलुप्त पैशाची भाषा में कहानियों का एक संग्रह है। उस समय का यह पहला रोमांटिक उपन्यास है। मराठी और कन्नड़ में रोमांटिक शब्द के लिए आज भी कादम्बरी का प्रयोग करते हैं।

कहानी का विषय[संपादित करें]

एक समय मे एक विशाल और समृद्ध राज्य विदिशा के राजा शूद्रक थे। एक दिन एक चांडाल(नीचि जाति) दरबार में आया और राजा को एक तोता भेट में दिया, तोते का नाम 'वैशम्पायन' था। भोजन करने के बाद तोते ने राजकक्ष में राजा से कहा कि यह एक लम्बी कहानी है किन्तु यदि आप इसे सुनने के लिए इच्छुक हैं तभी में बयान करूँगा। तब तोते ने कहा कि वह उसके बूढ़े पिता के साथ विन्ध्य जंगल में रहता था। एक दिन जंगल में एक शिकारी दल 'शबरस' ने जानवरों पर हमला कर बहुत नुकसान पहुचाया। तोते के पिता को भी बाहर निकाल कर मार डाला। उसके बाद तोते ने एक संन्यासी 'जबाली' के आश्रम में शरण ली। जबाली ने उसे एक कथा सुनाई, जोकि कादम्बरी का एक बड़ा भाग है।

जबाली कहते हैं कि अवन्ती राज्य में उज्जैनी नामक एक नगर था, जिसके राजा 'तरपीडा' थे। वह बहुत गुणी, धनी व शास्त्रों के ज्ञाता थे। वे एक बड़े महल में रहते थे। उनका कोंई पुत्र नहीं था। एक दिन राजा ने स्वप्न में देखा कि चन्द्र देव उनकी महारानी 'विलासवती' के मुख में प्रवेश करते हैं। वह आपने मुख्य मंत्री 'शुकनासा' को यह स्वप्न बताते हैं तब मंत्री शुकनासा भी उन्हें आपने स्वप्न के बारे में बताते हैं कि सफेद कपडे में लिपटा एक शिशु कमल में उनकी पत्नी 'मनोरमा' की गोद में रखा गया। कुछ ही दिनों में दोनों पत्निया गर्भवती हो गई। प्रत्येक ने एक पुत्र को जन्म दिया, तरपीडा के पुत्र का नाम 'चन्द्रपीड' रखा गया। शुकनासा के पुत्र का नाम वैशम्पायन रखा। दोनों पुत्र परममित्र बन गए और दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की और बड़े हुए। चन्द्रपीड एक शक्तिशाली घोड़े 'इन्द्रायुध' का पालिक था, शिक्षा समाप्त कर जब दोनों राज महल लोटे तो उनके सम्मान में कई उत्सवो का आयोजन हुआ। महारानी विलासवती ने एक राज कन्या पत्रलेखा को आपने पुत्र से मिलवाया। राजा ने चन्द्रपीड को आपना उत्तराधिकारी घोषित किया। चन्द्रपीड और वैशम्पायन, शुकनासा की सलाह पर एक विशाल सीना को लेकर अपने राज्य का विस्तार करने निकल पड़ते हैं। चन्द्रपीड कई राजाओ को हराकर एक जगह सुवर्णपुरा(हिमालय)विश्राम के लिए ठहरते हँ। तभी वह किन्नेरो के दल को देखते है। वह अपने आपको एक नदी के तट पर पते हैं। वह पानी पीकर अपनी प्यास बुझाते हैं। तभी उन्हें मधुर वीणा की आवाज सुनाई देती है। वे देखते हैं कि एक देवी जों साध्वी के वेश में थी भगवन शिव के मंदिर में बेठ कर वीणा बजा रही थी, वह एक गंधर्व कन्या 'महाश्वेता'थी जोकि लक्ष्मी देवी के पुत्र 'पुंडरिक' को चाहती थी। उसकी मृत्यु के बाद वह अपने प्राणों को त्यागने के लिए तैयार हो जाती है तभी उसे दिव्य वाणी सुनाई देती है कि उनका मिलन अवश्य होगा।

महाश्वेता की परममित्र का नाम कादम्बरी था, जोकि गन्धर्व राजा 'चित्ररथ' और रानी 'मदिरा' की पुत्री थी। महाश्वेता जब चन्द्रपीड के साथ कादम्बरी से मिलने जाती है तो कादम्बरी और चन्द्रपीड एक दुसरे को चाहने लगते हैं। और अंत में महाश्वेता और पुंडरिक तथा कादम्बरी और चन्द्रपीड का मिलन होता है। और वे सब सुखपूर्वक रहते हैं। यह कथा कादम्बरी इस तरह तोता वैशम्पायन राजा को सुनाता है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

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  1. https://www.google.co.in/webhp?gfe_rd=cr&ei=fhkrWJjIOIny8AfFyb_IDw#q=kadambari+by+banabhatta
  2. https://en.wikipedia.org/wiki/Kadambari
  3. https://archive.org/details/Kadamabari_Uttarabhaga-PV_Kane_1913