सदस्य:Adolf bijili

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नाग प्राचीन ऐतिहासिक साक्ष्यो से स्पष्ट हो चुका है कि "पासी" जाति नाग सभ्यता का पोषण करने वाली रही है।पासी शब्द की उत्तपत्ति संस्कृत के "पाश"शब्द से मानी जाती है।जिसका अर्थ रस्सी या फंदा होता है।जो संज्ञा रूप में पाशिक होना पाया जाता है अर्थात "ऐसे लोगो का समूह जो जीवनयापन के लिए पाश का प्रयोग करने वाला हो।" प्राचीन काल मे पासी भारशिव(नाग) नाम से जाने जाते थे जो तक्षशिला के तक्षकनाग(टाक) कुल की उत्तर भारत की नवनाग शाखा के वंशज थे। प्राचीन काल मे पद्मावती,अहिच्छत्रा, कान्तितपुरी और मथुरा में नागों शासन रहा है।कुषाणों को भारत से बाहर निकलने के बाद उत्तर भारत मे नाग शासन कर रहे थे।भौतिक विजय की अपेक्षा पारलौकिक विजय में विश्वास रखने वाले नागों को गुप्तों ने हराकर इतिहास में गुप्त युग की शुरुआत की।काल गति के मारे नागजन ने गुप्तो के शासनकाल में दण्डपाषाधिकारण नामक आन्तरिक सुरक्षा विभाग में लग गए। जोकि दण्डपाशिक कहलाते थे। मध्य कालमे ये नागजन अलग अलग नामों से सम्पूर्ण भारत मे छा गए तथा दण्डपाशिक से राजपासी बनकर अवध प्रान्त की सत्ता प्राप्त कर अवध प्रान्त के शासक बन गए। नागजनो ने भारशिव बनकर कुषाणों से,राजपासी बनकर मुसलमानो से,तथा अपराधशील पासी जाति बनकर अंग्रेजो से संघर्ष कर अपने वजूद को जिंदा रखा है। संघर्ष ही नागों की पहचान है फिर चाहे अपनो से हो या गैरो से,पासी पीछे कदम नही बढ़ाते।नाग जातियो में पासी जाति के अलावा महार अहीर,गुर्जर,जाट,मीणा,भर ,बाल्मीक नाग ब्राह्मण,और नाग क्षत्रिय आदि प्रमुख है। यद्यपि यह शोध का विषय है की भारत की और कितनी जातियों ने नाग सभ्यता को स्वीकार कर उसको बढ़ाने में मदद की है।