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सण्डीला

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सण्डीला
Sandila
सण्डीला is located in उत्तर प्रदेश
सण्डीला
सण्डीला
उत्तर प्रदेश में स्थिति
सूचना
प्रांतदेश:हरदोई ज़िला
उत्तर प्रदेश
 भारत
जनसंख्या (2011):58,346
मुख्य भाषा(एँ):हिन्दी
निर्देशांक:27°05′N 80°31′E / 27.08°N 80.52°E / 27.08; 80.52

उत्तर प्रदेश जिला हरदोई तहसील सण्डीला भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के हरदोई में स्थित एक नगर है। इसके अतिरिक्त संण्डीला प्रशासन प्रणाली में एक तहसील का दर्जा रखता है।। यहां के लड्डू बहुत मशहूर हैं।। आप लोग कभी भी आएं तो एक बार यहां के लड्डू जरुर खाएं और अपने अपने घर भी जरुर ले जाएं।। [1][2]

यह काफी समय पूर्व नैमिषारण्य तीर्थ का हिस्सा थी और यहीं पर शाण्डिल्य ऋषि ने तपस्या की थी। प्रदेश की राजधानी लखनऊ से पश्चिम 54 किमी0 दूर शाण्डिल्य ऋषि की तपोभूमि सण्डीला स्थित है।

संडीला की स्थापना सालीह नमक पासी ने की थी

  1. REPORT OF THE LAND REVENUE SETTLEMENT OF THE LUCKNOW DISTRICT ,BY MR.H.H. BUTTS, (1873) page 124,126

and to have been founded by Maliah Pásí,

whose brother Saliah founded Sandílá in Hardoi.

  1. GAZETTEER OF THE PROVINCE OF OUDH.VOL. II.-H. TO M. Page  ,427,428

It is said to have been the chief seat of the

Arakhs or Pásis, and to have been

founded by Malia Pási, whose brother

Salia founded Sandíla in Hardoi.

संडीला को अपनी राजधानी बना कर यहां राज्य किया

इंडस्ट्री

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सण्डीला में बहुत सी बड़ी कंपनियों का निर्माण शहर है इसके लिए यहां सोना शहर प्रसिद्ध है यह बहुत से लोगो को रोजगार देता है।

मां शीतला देवी का मन्दिर

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सण्डीला कस्बे पश्चिम सिरे पर एक विशाल सरोवर के किनारे लगभग 1000 वर्ष पुराना मां शीतला देवी का भव्य मन्दिर है। सिद्ध पीठ रूप में विख्यात यह मन्दिर विगत कई वर्षों से मां की महिमा के कारण क्षेत्र में चर्चित है। यही कारण है कि नवरात्रि के दिनों में आस - पास के जनपदों से भारी मात्रा में श्रद्धालु आते हैं और गदर्भ सवार माँ शीतला के मन्दिर में माथा टेकते हैं। माता सभी की मनोकामना पूर्ण करती है एवं उनकी खाली झोली भर जाती है। इस मन्दिर की ऐतिहासिकता के बारे में बताया जाता है कि जबसे यहां शाण्डिल्य ऋषि ने तपस्या की थी तभी से यहां मां का वास है। ब्रिटिश शासन काल में एक अंगे्रज गर्वनर यहां शिकार खेलने आया था, उसने जंगल के बीच छोटी मठिया में देवी की मूर्ति को देखा और उस मूर्ति पर पूजन सामग्री पुष्प आदि चढ़े दिखाई दिये। यह मूर्ति मां शीतला की थी जो आज भी मौजूद है। इस मूर्ति के अवतरण के बारे में कोई जानकारी नहीं है। मठिया के पास एक छोटा सा तालाब था जो आज विशाल सरोवर (तीर्थ) के रूप में विद्यमान है। माता के दर्शन के बाद उस गर्वनर पर मां का इतना प्रभाव पडा कि उसने जंगल में शिकार करने पर पाबन्दी लगा दी। उन्ही दिनों चिनहट निवासी दो भाई सण्डीला में व्यापार के सिलसिले में आये थे उनको व्यापार में लगातार घाटा हो रहा था इससे वह बेहद परेशान थे। इस परेशानी में दोनों भाई टहलते हुए जंगल की ओर निकल गये, वहां पर स्थापित मूर्ति के दर्शन कर प्रार्थना की यदि उनका व्यापार फला-फूला तो यहां पर वह भव्य मन्दिर बनवायेंगे। माता के आशीर्वाद से दोनों भाई क्रमशः लाल्ता शाह व शीतला प्रसाद शाह ने वहां पर भव्य मन्दिर व सरोवर का निर्माण कराया। अंग्रेज गर्वनर ने भी लाल्ता शाह के नाम पर 18 बीघा जमीन को पट्टा कर दिया। इन भाईयों का व्यापार कलकत्ता से चलता रहा। इसी बीच कलकत्ता के व्यापारी मनमोहन लाल जैन वसूली करने सण्डीला आये। मां शीतला के दर्शन कर वह भी मन्त्र मुग्ध हो गये। उन्होने मन्दिर के नाम 50 हजार रूपये जमा कर दिये। इनके नाम का पत्थर आज भी सरोवर के किनारे लगा हुआ है। सरोवर के उत्तर की ओर गऊ घाट, पश्चिम की ओर जनाना घाट और पूरब व दक्षिण की ओर मर्दाना घाट है। इसके बाद शाह भाइयों ने मन्दिर की देख रेख के लिए एक पुजारी नियुक्ति किया और वसीहत लिख दी कि भविष्य में उनके खानदान के लोग मन्दिर का प्रबन्धन कार्य देखेंगे। शीतला मन्दिर के चारों ओर राम जानकी मन्दिर, ठाकुर जी मन्दिर, हनुमान मन्दिर, शिव जी मन्दिर, के अतिरिक्त लगभग आधा दर्जन मन्दिर बने हुए हैं। कुछ वर्षों पूर्व इस उपेक्षित पड़े मन्दिर को शासन प्रशासन एवं युवाओं ने जीर्णोद्धार करने का प्रण किया और निर्माण कार्य प्रारम्भ करा दिया। परिसर की नई बाउन्ड्रीवाल बनवाई गई। अन्दर से लेकर बाहर तक मर्बल्स लगाये गये एवं समस्त निकासी द्वारा नये बनवाये गये।

गहावर देवी का मन्दिर

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मां गहावर देवी जी के मंदिर का एतिहासिक महत्व है। मां गहावर देवी जी की दुर्लभ मूर्ति करीब 200 वर्ष पहले मांडर कस्बे के उत्तर पश्चिम में एक कुएं की खुदाई में मिली थी। इस सिद्धपीठ के संबंध में प्रचलित है कि इस पवित्र स्थान पर मां का स्मरण करने से उपासक के महापातक कट जाते हैं। करीब दो सौ वर्ष पूर्व मांडर में लोगों को पानी की समस्या थी। गांव के उत्तर-पश्चिम में लाला चंद्रिका प्रसाद का घना जंगल था। जंगल में एक कुआं था, जो बंद पड़ा था। ग्रामीणों ने उस कुएं की खुदाई की। जब कुआं काफी गहराई में खोदा जा रहा था, तब उसमें एक मूर्ति निकली थी। जिसकी लंबाई चार फिट और चौड़ाई तीन फिट थी। मूर्ति में शेर पर सवार माता रानी की मूर्ति थी। ग्रामीणों ने कुएं के पास ही मूर्ति की स्थापना रखी। बाबा रामशरण पाठक ने सारे ग्रामीणों को कुएं के पाए एकत्र किया और बताया कि रात में स्वप्न में मैंने देखा कि मुझसे एक देवी कह रही है कि आप लोग मेरी पूजा अर्चना गहावर देवी नाम से की जाए। तब ग्रामीणों के बुलंद सहयोग से एक मंदिर का निर्माण कराया गया तथा करीब 15 बिस्वा में बाउंड्रीवाल बनाई गई। मंदिर के नाम पर 30 बिस्वा भूमि भी कर दी गई। मंदिर के पुजारी राजेश पाठक बताते हैं कि मूर्ति रंग भी बदलती है। सुबह दूधिया दोपहर में भूरा व रात में काले रंग की दिखती है। मूर्ति देखने में अतुल शोभनीय है। मंदिर के अंदर घुसते ही गेट के पूरब में माता काली, माता शारदा देवी का छोटा मंदिर है। उसी से सटा हुआ एक छोटा शिवलिंग भी है। माता जी के उत्तर में सरस्वती माता जी का एक छोटा मंदिर बना है। इसके ठीक सामने बड़ा सा हनुमान जी का भव्य मंदिर भी बना है। यहां पर एक वर्ष में चार बार मेला लगता है। पहला मेला चैत्र की नवरात्र, दूसरा बैसाख की अष्टमी, तीसरा ज्येष्ठ की अष्टमी को और चौथा क्वार को नवरात्र में लगता है। यहां पर दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। मेले में रामलीला भी होती है।

इन्हें भी देखें

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सन्दर्भ

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  1. "Uttar Pradesh in Statistics," Kripa Shankar, APH Publishing, 1987, ISBN 9788170240716
  2. "Political Process in Uttar Pradesh: Identity, Economic Reforms, and Governance Archived 2017-04-23 at the वेबैक मशीन," Sudha Pai (editor), Centre for Political Studies, Jawaharlal Nehru University, Pearson Education India, 2007, ISBN 9788131707975