संसाधन

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संसाधन एक ऐसा स्रोत है जिसका उपयोग मनुष्य अपने लाभ के लिये करता है। कोई वस्तु प्रकृति में हो सकता है हमेशा से मौज़ूद रही हो लेकिन वह संसाधन तब बनती है जब मनुष्य को उसके लाभप्रद उपयोग के बारे में ज्ञात होता है और वह यह लाभ प्राप्त करना शुरू करता है। प्रकृति का कोई भी तत्व तभी संसाधन बनता है जब वह मानवीय सेवा करता है। इस संदर्भ में 1933 में जिम्मरमैन ने यह तर्क दिया था कि, ‘न तो पर्यावरण उसी रूप में और न ही उसके अंग संसाधन हैं, जब तक वह मानवीय आवश्यकताओं को संतुष्ट करने में सक्षम न हो।’[1]

स्रोत के आधार पर-----

संसाधन चार प्रकार के होते हैं---

1.प्राकृतिक

2.मानव निर्मित

3.नवीकरणीय

4.अनवीकरणीय [2]

उपयोग के आधार पर-----

1.प्राथमिक(सरल उपयोगी):--

प्राथमिक संसाधन वैसी संसाधन जिसका उपयोग प्राथमिक स्तर पर बीना किसी अन्य संसाधन की सहायता के किया जा सकता है। जैसे हथौड़ा, चाकु, रेती, कोदाल, खुरपी आदी।

2.दूितिय(कठिन):--

वैसी संसाधन जिसका उपयोग करनेे के लिए किसी अन्य (प्राथमिक या सरल) संसाधन की सहायता लेनी परती है। जैसे: छेनी, कलपुर्जा(पेंच, नौट, आदि इसके उपयोग रिंच सँरसी पिलास आदि के सहायता से करतें हैं।)

3.तृतिय(जटिल):--

जिसको प्राथमिक दूितिय आदि के सहायता से बनाया गया है जिसकी बनावट और उपयोग जटिल है। जैसे:यंत्र(मशीन) वाहन, रक्षा यंत्र, वायुयान आदि।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]