शुकनासोपदेश

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शुकनासोपदेशः (शुकनास का उपदेश),

कादम्बरी का ही एक अंश है। गीता की तरह शुकनासोपदेश का भी स्वतंत्र महत्व है। यह एक ऐसा उपदेशात्मक ग्रंथ है जिसमें जीवन दर्शन का एक भी पक्ष बाणभट्ट की दृष्टि से ओझल नहीं हो सका। इसमें राजा तारापीड का नीतिनिपुण एवं अनुभवी मन्त्री शुकनास राजकुमामार चन्द्रापीड को राज्याभिषेक के पूर्व वात्सल्य भाव से उपदेश देते हैं और रूप, यौवन, प्रभुता तथा ऐश्वर्य से उद्भूत दोषों से सावधान रहने की शिक्षा देते हैं। यह प्रत्येक युवक के लिए उपादेय उपदेश है।

चन्द्रापीड को दिये गये शुकनासोपदेश में कवि की प्रतिभा का चरमोत्कर्ष परिलक्षित होता है। कवि की लेखनी भावोद्रेक में बहती हुर्इ सी प्रतीत होती है। शुकनासोपदेश में ऐसा प्रतीत होता है मानो सरस्वती साक्षात मूर्तिमती होकर बोल रही हैं। इसमें बाणभट्ट की शब्दचातुरी प्रदर्शित हुई है।

शुकनासोपदेश का नायक राजकुमार चन्द्रापीड है, जो सत्व, शौर्य और आर्जव भावों से युक्त है। शुकनास एक अनुभवी मन्त्री हैं जो चन्द्रापीड को राज्याभिषेक के पूर्व वात्सल्यभाव से उपदेश देते हैं। वे उसे युवावस्था में सुलभ रूप, यौवन, प्रभुता एवं ऐश्वर्य से उद्भूत दोषों के विषय में सावधान कर देना उचित समझते हैं। इसे युवावस्था में प्रवेश कर रहे समस्त युवकों को प्रदत्त ‘दीक्षान्त भाषण’ कहा जा सकता है।

'शुकनासोपदेश', कादम्बरी का प्रवेशद्वार माना जाता है। इसमें लक्ष्मी की ब्याजस्तुति ब्याज निन्दा का अत्यन्त मनोरम वर्णन है। ‘गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति’ इस उक्ति को चरितार्थ करने वाला यह साहित्य है। इसके अध्ययन से काव्यात्मक तत्व का तो ज्ञान होता ही है, साथ में तत्कालीन सामाजिक ज्ञान भी प्राप्त होता है।

लक्ष्मी के बारे में शुकनासोपदेश का एक अंश देखिये-

आलोकयतु तावत् कल्याणाभिनिवेशी लक्ष्मीमेव प्रथमम्। इयं हि सुभटखड्गमण्डलोत्पलवनविभ्रमभ्रमरी लक्ष्मीः क्षीरसागरात्पारिजातपल्लवेम्यो रागम्, इन्दुशकलादेकान्तवक्रताम्, उच्चैः श्रवसश्चंचलताम्, कालकूटान्मोहनशक्तिं मदिराया मदम्, कौस्तुभमणेर्नैष्ठुर्यम्, इत्येतानि सहवासपरिचयवशात् विरहविनोदचिह्नानि गृहीत्वैवोद्गता। न ह्येवंविधमपरिचितमिह जगति किंचिदस्ति यथेयमनार्या। लब्धापि खलु दुःखेन परिपाल्यते। दृढगुणपाशसन्दाननिस्पन्दीकृता अपि नश्यति। उद्दामदर्पभटसहस्नोल्लासितासिलतापंजरविधृता अप्यपक्रामति। मदजलदुर्दिदनान्धकारगजघटितघनघटापरिपालिता अपि प्रपलायते। न परिचयं रक्षति। नाभिजनमीक्षते। न रूपमालोकयते। न कुलक्रममनुवर्तते। न शीलं पश्यति। न वैदग्ध्यं गणयति। न श्रुतमाकर्णयति। न धर्ममनुरुध्यते। न त्यागमाद्रियते। न विशेषज्ञतां विचारयति। नाचारं पालयति। न सत्यमनुबुध्यते। न लक्षणं प्रमाणीकरोति। गन्धर्वनगरलेखा इव पश्यत एव नश्यति।
(...हे प्रजा का कल्याण चाहने वाले (राजकुमार), पहले लक्ष्मी (की प्रकृति) को ही देखें। यह लक्ष्मी योद्धाओं एवं शस्त्रों के समूह रूपी कमल पर भ्रमण करने वाली मधुमखी है। वह क्षीरसागर से निकली है (और अपने साथ निकलने वाले अन्य वस्तुओं के गुण उसने धर लिये हैं।) उसने पारिजात वृक्ष के पल्लवों से लाल रंग (आनन्द के लिये आकर्षण का गुण) ले लिया, चन्द्रमा की कला उसकी एकान्तवक्रता ले ली, उच्चैःश्रवा से उसकी चंचलता ग्रहण कर लिया, कालकूट से मोहने की शक्ति और मदिरा (वारुणी) से उसका मद ले लिया, कौस्तुभ मणि से उसकी कठोरता (निठुरता) ले ली। इस प्रकार की दूसरी अपरिचित वस्तु संसार में और कोई नहीं है जैसी यह अनार्या है। यह पाकर भी दुःख से बचाई जाती है। सन्धिविग्रहादि दृढ़ बन्धनों से बाँधकर निश्चल की गई भी यह पलायन कर जाती है। उत्कट अभिमानी योद्धाओं की उठाई गई हजारों तलवारों के समूहरूपी पिंजड़े में बन्दी करके रखी गई भी (यह अनार्या लक्ष्मी) गायब होती जाती है। मदजल की निरन्तर होने वाली वर्षा के कारण दुर्दिन जैसा अन्धकार बना देने वाली हाथियों की घनी घटाओं से घिरी हुई भी भाग जाती है। (यह दुष्टा लक्ष्मी) जान पहिचान की रक्षा नहीं करती, उत्तम कुल का भी ध्यान नहीं रखती, सुन्दरता को नहीं देखती, कुलक्रम का अनुगमन नहीं करती, शील को नहीं देखती, पाण्डित्य को नहीं गिनती, शास्त्रों के (ज्ञान) को नहीं सुनती, धर्म का अनुरोध नहीं करती, त्याग का आदर नहीं करती, विशेषज्ञता को नहीं विचारती, आचरण का पालन नहीं करती, सत्य को नहीं जानती, सामुद्रिक शास्त्रानुसार छत्रचामरादि चिह्नों को भी प्रमाणित नहीं करती है। गन्धर्व नगरलेखा की भाँति देखते-देखते यह नष्ट हो जाती है। )

शुकनासोपदेश सार[संपादित करें]

कादम्बरी कथान्तर्गत शुकनासोपदेश अत्यन्त महत्वपूर्ण शिक्षाप्रद अंश है। इसमें तारापीड के पुत्र राजकुमार चन्द्रापीड को मंत्री शुकनास के द्वारा राज्याभिषेक होने के पूर्व उपदेश दिया गया है।

राजकुमार चन्द्रापीड विधिवत् विद्याध्ययन कर राजभवन को वापस लौट आते हैं तथा राज्याभिषेक की तैयारी में वह एक दिन महामंत्री शुकनास के दर्शन के लिए उनके घर पहुँच जाते हैं। महामंत्री शुकनास युवराज चन्द्रापीड के जीवन में स्वाभाविक रूप से आने वाले दोषों तथा उत्तरदायित्वों को समझाने का उपयुक्त अवसर जान कर इस प्रकार राजकुमार को उपदेश देते हैं -

हे तात चन्द्रापीड! आप सभी शास्त्रों, विद्याओं तथा कलाओं का विधिवत् ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं। अब आपको कोई भी विषय अज्ञात नहीं है अतः वास्तव में मुझे आपसे कुछ कहना नहीं है, पर यौवन में स्वाभाविक रूप से ऐसा अन्धकार उत्पन्न होता है जो कि सूर्य के प्रकाश, रत्नों के आलोक तथा प्रदीपों की प्रभा से भी दूर नहीं हो सकता है। लक्ष्मी का दारुण मद शान्ति का विनाश कर देता है। ऐश्वर्य के कारण अाँखों में छायी हुई तिमिरान्धता अंजनवर्तिका से भी नहीं मिटाई जा सकती है। दर्पहाज्वर की गर्मी किसी भी शीतोपचार (चन्दनांगरागादि लेप) से नहीं दूर की जा सकती है। विषयरूपी विषास्वाद से उत्पन्न हुआ मोह मंत्रों तथा औषधियों के उपचार से भी समाप्त नहीं किया जा सकता है। रागरूपी मल का लेप इतना गाढ़ा चढ़ जाता है कि वह स्नान तथा स्वच्छ बनाने वाली क्रियाओं से भी स्वच्छ नहीं होता है। राज्य सुख से उत्पन्न हुई घोर निद्रा रात्रि समाप्त होने पर भी समाप्त नहीं होती है। शास्त्र रूपी जल से स्वच्छ (निर्मल) बनायी गयी बुद्धि भी युवावस्था आने पर कलुषित हो जाती है। जन्मजात प्रभुता, अभिनव यौवन, अनुपम सुन्दरता तथा असाधारण शक्ति यह प्रत्येक अनर्थ मूल हैं तो फिर इनके समुदाय का कहना ही क्या? कामिनी तथा कांचन की आसक्ति मनुष्य को पथभ्रष्ट कर देती है। गुरुजनोपदेश आप सदृश निर्मल बुद्धि वाले व्यक्ति ही ग्रहण कर सकते हैं। साधारण व्यक्ति को दिया गया यह उपदेश शूल जैसा लगता है। गुरुजनों द्वारा दी गयी शिक्षा सम्पूर्ण दोषों को भी गुणों में परिवर्तित कर देती है। वह एक ऐसा दिव्य आकाश है जिसकी ज्योति सूर्य-चन्द्रादि से भी अधिक है। प्रथम तो भय से कोई राजाओं को उपदेश देने का साहस ही नहीं करता है। फिर वे उपदेशवचनों को सुनते भी नहीं हैं अथवा सुनकर भी राजमद से आँखे मींच लेते हैं। राजलक्ष्मी राज्याभिमानरूपी विष चढ़ा कर मूर्च्छा उत्पन्न कर देती है।

हे राजकुमार! आप का कल्याण हो। आप सर्वप्रथम लक्ष्मी को ही देख लें। समुद्र मंथन से जब यह उत्पन्न हुई तो क्षीर सागर के पारिजात पल्लवों से राग, चन्द्रमा से वक्रता, उच्चैःश्रवा से संचलता, कालकूट से मोहनशक्ति, मदिरा से मादकता, कौस्तुभ मणि से कठोरता ग्रहण कर उन-उन वस्तुओं के विरह में अपने मनोरंजन के लिए उनके चिह्नों के साथ बाहर निकली। जन्मकाल में मथनी रूपी मन्दराचल के घूमने से क्षीर सागर में जो भंवर पड़ गयी उसकी भ्रामकता लक्ष्मी में आज भी विद्यमान है। यह निःस्पृह तथा बड़ी चंचल है। दृढ़ता से बांधकर रखने पर भी चली जाती है। यह किसी से जान पहचान नहीं रखती है तथा कुल-शीलादि का भी विचार नहीं करती है। अपने विविध मायावी रूपों को दिखाने के लिए ही लक्ष्मी ने विराट् पुरुष विष्णु भगवान् का आश्रय लिया है। यह मूर्खों के पास निवास करती है तथा सरस्वती के उपासकों से सदा दूर रहती है। इसने अपने विरोधी चरित्र का संसार में एक जाल-सा बिछा रखा है। देखिये न, जल से उत्पन्न होने पर भी लक्ष्मी तृष्णा को बढ़ाती है। उन्नत होकर भी स्वभाव में नीचता लाती है। अमृत की सहोदरा होकर भी कडुका फल देती है। यह चंचला लक्ष्मी जैसे-जैसे चमकती है वैसे-वैसे दीपशिखा की भाँति मलिन काजल रूपी कर्म उत्पन्न करती है। यह शास्त्ररूपी नेत्रों के लिए अज्ञानरूपी रतौंधी है, शिष्टाचार को हटाने के लिए बेंत की छड़ी है, धर्मरूपी चन्द्रमा को ग्रसन करने के लिए राहु की जीभ है।

इस प्रकार यह दुष्टा लक्ष्मी राजाओं द्वारा ग्रहण किये जाने पर भी उन्हें छोड़ देते है। लक्ष्मी के कुप्रभाव से राजा लो ग अनेक प्रकार के अविनयों के घर बन जाते हैं। राज्याभिषेक के मंगल कलशों के जल के अभिषेक से राजाओं की चतुरता धुल जाती है। रेशमी पगड़ी बाँधते ही आने वाले बुढ़पे को वे भूल जाते हैं। श्वेतछत्र धारण करते ही उन्हें परलोक दिखाई नहीं पड़ता है। लक्ष्मी के प्रलोभन में पड़ राजा लोग ऐसा ज्ञात होता है जैसे किसी दुष्ट ग्रह ने उन्हें पकड़ लिया हो। कामगणों से आहत वे विविध भाव-भंगिमाएँ करते हैं। सप्तपर्ण के वृक्ष की भाँति रजोविकारों से वे निकटवर्ती लोगों में शिरदर्द उत्पन्न कर देते हैं। मरणासन्न व्यक्ति के समान वे सगे संबंधियों तक को नहीं पहचानते हैं। अहंकार रूपी खम्भे से बँधे दुष्ट हाथी के समान उपदेश वचनों की वे उपेक्षा करते हैं। तृष्णा रूपी विषवेला से लिपटे रहने के कारण वे संसार को कनकमय ही देखते हैं। असमय में खिले हुए फूलों के समान वे संसार का नाश करने को उतारू हो जाते हैं। श्मशान-वह्नि की भाँति उनकी सम्पत्ति भी भयानक होती है। सैकड़ों दुर्व्यसनों में कसे हुए वे बांवी के ऊपर जमी घास से टपके हुए जल बिन्दुओं के समान अपने पतन को भी नहीं जान पाते हैं।

स्वार्थ-साधन में जुए, धन पर गीधों की भाँति टूटने वाले और सभामण्डप रूपी सरोवर में बगुलों की भाँति घुस कर दोषों को भी गुण बतलाने वाले नीच व्यक्ति, जुआ खेलना एक प्रकार का मनोरंजन है, परस्त्रीगमन करना चतुरता है, व्यर्थ पशु संहार (शिकार) करना व्यायाम है, गुरु वचनों पर ध्यान न देना स्वतंत्रता है, नाच ना, गाना, बजाना एक प्रकार की रसिकता है,

इसी प्रकार की उलटी बातों से राजाओं को वंचित कर उन्हें कुमार्ग पर डालते हैं। वे राजाओं को ठग कर मन ही मन उनको हँसी उड़ाते हैं। वे उनकी ऐसी झूठी प्रशंसा करते हैं कि साक्षात् विष्णु तथा शिव का अवतार राजा अपने को मान बैठते हैं एवं विचित्र अवांछित चेष्टाएँ करने लगते हैं, लोगों को दर्शन देना उन पर कृपा करना, किसी से बात करना उन्हें पुरस्कार देना, अपनी आज्ञा को उनके लिए वरदान मानते हैं। वे मंत्रियों के हितकर वचनों की अवहेलना करते हैं, अपने झूठे प्रशंसकों को निकट बिठलाते हैं। निष्करुण कौटिल्य शास्त्र को ही वह प्रमाण मानते हैं, पशुबलि कराने वाले पुरोहितों को ही अपना गुरु मानते हैं। धूर्त मंत्री जिनके उपदेश हैं, अनेक राजाओं के द्वारा उपभोग कर छोड़ दी गयी राजलक्ष्मी में जिसकी आसक्ति रहती है ऐसे राजाओं में उचित तथा अनुचित का ज्ञान कहा? हे राजकुमार! अति कुटिल, कष्टकदायक, सैकड़ों चेष्टाओं से भीषण राजतंत्र के विषय में तथा अत्यन्त मोहक इस युवावस्था में आप ऐसा व्यवहार करें कि लोग आपकी हँसी न कर सकें, गुरुजनों की फटकार आपको न सुननी पड़े, आपके व्यवहार से विद्वान् दुःखी न हों। आप ऐसा उपाय करें जिससे नीच पुरुष आपका धन न लूट सकें, कामनियाँ आपको अपने रूप-जाल में न फँसा सकें, लक्ष्मी आपका स्वभाव न बिगाड़ सकें तथा सुख को अभिलाषा आपको कुमार्ग पर अग्रसर न कर सके।

हे राजकुमार! मैं भलीभाँति जानता हूँ कि आप स्वभाव से धीर तथा शास्त्रीय संस्कारों से युक्त है। राजमद की गन्ध आपको छू तक नहीं गयी है, पर आपकी गुण ग्राहता से सन्तुष्ट होकर ही मैं इस प्रकार कह रहा हूँ। आप राज्याभिषेक के बाद अपने पिताजी के द्वारा जीती गयी सप्तदीपों वाली पृथ्वी को पुनः विजित करें, क्योंकि जो राजा आरम्भ में अपना प्रभाव जमा लेता है उसकी की आज्ञाएँ सिद्ध पुरुषों के वचनों के समान अमोघ होती है।

इतना सुनकर शुकनास शान्त हो गये। चन्द्रापीड उनके वचनों से प्रबुद्ध एवं पवित्र होकर प्रसन्नचित्त अपने राजभवन को लौट आये।