विऔद्योगीकरण

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

विऔद्योगीकरण (Deindustrialization) का अर्थ है - किसी देश या क्षेत्र में औद्योगिक क्रियाकलापों का क्रमशः कम होना तथा उससे सम्बन्धित सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन। यह औद्योगीकरण की उलटी प्रक्रिया है। विऔद्योगीकरण में विशेषतः भारी उद्योगों या निर्माण उद्योगों (manufacturing industry) में कमी आती है।

विऔद्योगीकरण बाजार पर आधारित अर्थव्यवस्था की एक विशेष प्रक्रिया है। इसमें उत्पादन क्रमशः गिरता है, आर्थिक संकट को जन्म देता है और अन्ततः एक बिलकुल नयी अर्थव्यवस्था जन्म लेती है।

विऔद्योगीकरण के बारे में निम्नलिखित बातें कही जा सकतीं है-

  • दृढ औद्योगिक रोजगार का पतन एवं श्रम के लचीलापन में वृद्धि
  • अर्थव्यवस्था के तृतीयक क्षेत्र (सेवाएँ) के साथ-साथ सूचना अर्थव्यवस्था में वृद्धि ; भारी उद्योग या तो घटते हैं या स्थिर रहते हैं या अन्यत्र चले जाते हैं।
  • आय तथा जीवन-स्तर में सुधार
  • विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार तथा उत्पादन दोनों में लगातार कमी

ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत भारत का वि-औद्योगीकरण[संपादित करें]

ब्रिटिश शासन के अंतर्गत भारत के हस्तशिल्प उद्योगों का पतन सामने आया जिसके परिणामस्वरूप कृषि पर जनसंख्या का बोझ बढ़ाता गया। ब्रिटिश शासन के अंतर्गत विऔद्योगीकरण को प्रेरित करने वाले निम्नलिखित घटक माने जाते हैं:

  • (१) प्लासी और बक्सर के युद्ध के बाद ब्रिटिश कंपनी द्वारा गुमाश्तों के माध्यम से बंगाल के हस्तशिल्पियों पर नियंत्रण स्थापित करना अर्थात उत्पादन प्रक्रिया में उनके द्वारा हस्तक्षेप।
  • (२) १८१३ ई. के चार्टर के द्वारा भारत का रास्ता ब्रिटिश वस्तुओ के लिए खोल देना,
  • (३) ब्रिटेन में भारतीय वस्तुओ पर अत्यधिक प्रतिबंध लगाये गये, अर्थात भारतीय वस्तुओं के लिए ब्रिटेन का द्वार बंद करना,
  • (४) रेलवे के माध्यम से भारत के दूरस्थ क्षेत्रों का भेदन किया गया। दूसरे शब्दों में, एक ओर जहाँ दूरवर्ती क्षेत्रों में भी ब्रिटिश फैक्ट्री उत्पादों को पहुँचाया गया, वहीं दूसरी ओर कच्चे माल को बंदरगाहों तक लाया गया।
  • (५) भारतीय राज्य भारतीय हस्तशिल्प उद्योगों के बड़े संरक्षक रहे थे, लेकिन ब्रिटिश साम्राज्यवादी प्रसार के कारण ये राजा लुप्त हो गए। इसके साथ ही भारतीय हस्तशिल्प उद्योगों ने अपना देशी बाजार खो दिया।
  • (६) हस्तशिल्प उद्योगों के लुप्तप्राय होने के लिए ब्रिटिश सामाजिक व शैक्षणिक नीति को भी जिम्मेदार ठहराया जाता है। इसने एक ऐसे वर्ग को जन्म दिया जिसका रुझान और दृष्टिकोण भारतीय नहीं, ब्रिटिश था। अतः अंग्रेजी शिक्षाप्राप्त इन भारतीयों ने ब्रिटिश वस्तुओं को ही संरक्षण प्रदान किया।

18वीं सदी में भारत में दो प्रकार के हस्तशिल्प उद्योग आस्तित्व में थे- ग्रामीण उद्योग और नगरीय हस्तशिल्प। भारत में ग्रामीण हस्तशिल्प उद्योग यजमानी व्यवस्था के अंतर्गत संगठित था। नगरीय हस्तशिल्प उद्योग अपेक्षाकृत अत्यधिक विकसित थे। इतना ही नहीं, पश्चिमी देशो में इन उत्पादों की अच्छी-खासी माँग थी। ब्रिटिश आर्थिक नीति ने दोनों प्रकार के उधोगों को प्रभावित किया। नगरीय हस्तशिल्प उद्योगों में सूती वस्त्र उद्योग अत्यधिक विकसित था। कृषि के बाद इसी क्षेत्र का स्थान था, किन्तु ब्रिटिश माल की प्रतिस्पर्धा तथा भेदभावपूर्ण ब्रिटिश नीति के कारण सूती वस्त्र उद्योग का पतन हो गया।

अंग्रेजो के आने से पूर्व बंगाल में जूट के वस्त्र की बुनाई भी होती थी। लेकिन 1835 ई. के बाद बंगाल में जूट हस्तशिल्प की भी धक्का लगा। ब्रिटिश राज की स्थापना से पूर्व भारत में कागज उद्योग का भी प्रचलन था, किन्तु 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में चार्ल्स वुड की घोषणा से स्थिति में नाटकीय परिवर्तन आया। इस घोषणा के तहत स्पष्ट रूप से यह आदेश जारी किया गया था कि भारत में सभी प्रकार के सरकारी कामकाज के लिए कागज की खरीद ब्रिटेन से ही होगी। ऐसी स्थिति में भारत में कागज उद्योग को धक्का लगाना स्वाभाविक ही था। प्राचीन काल से ही भारत बेहतर किस्म के लोहे और इस्पात के उत्पादन के लिए भी प्रसिद्ध था, किन्तु ब्रिटेन से लौहे उपकरणों के आयात के कारण यह उद्योग भी प्रभावित हुए बिना न रह सका।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]