वार्ता:संन्यास

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 ऋषियों ने घर-बार, धन-सम्पत्ति व रिस्ते-नाते त्याग कर सन्यासी आश्रम के वरण को सर्वोत्कृष्ट बतलाया है। शास्त्र भी इसे जीवन की सर्वोच्च अवस्था बतलाते हैं। जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए इस अवस्था तक पहुँचना अनिवार्य है। परन्तु आइए विचार करें कि क्या वे सभी लोग जो सन्यासी वेश धारण कर लते हैं, जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त कर पाते हैं कि नहीं। वे कौन से लाभ है जो सन्यासी जीवन में ही प्राप्त हो सकते हैं, अन्य किसी आश्रम में नहीं।
   यह तो सभी जानते हैं कि प्रबुद्ध और विवेकी पुरुष चाहे किसी भी आश्रम में रहे, अपनी इच्छाओं को संयमित अवश्य कर लेता है। उसका अपने शरीर,  इन्द्रियों तथा मन पर पूरा नियंत्रण रहता है। वह बडी निष्ठापूर्वक सत्य का अनुसंधान भी करता है। ठीक इसके विपरीत एक कमजोर मानसिकता वाला व्यक्ति सन्यासी वेश में भी इधर-उधर भटकते हुए व्यर्थ ही समय गंवाता रहता है। इससे न ही उसे स्वयं कोई लाभ मिलता है और न ही समाज को। उसका पूरा जीवन ही आलस्य, प्रमाद तथा भयभीत मानसिकता के साथ व्यतीत होता है। फिर ऐसा निकृष्ट जीवन जीने वाला व्यक्ति जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को कैसे प्राप्त कर सकता है। यह सत्य है कि एक गृहस्थ दिव्य शुचिता का इतनी अच्छी तरह पालन नहीं कर पाता जितना कोई सन्यासी नगरों की आपा-धापी व शोरगुल से दूर वनांचल के सुरम्य वातावरण में कर सकता है। किन्तु ऐसे भी साधक कम नहीं हैं जो जगत् में रहते हुए भी निर्लिप्त बने रहते हैं। वे शरीर में रहते हुए भी उससे ऊपर उठकर आत्मानन्द में मग्न रहते है। ब्रह्म चिन्तन में लीन रहते हुए वे भौतिक आवश्यकताओं के प्रति उदासीन हो जाते हैं। शरीर व इन्द्रियों से ऊपर उठने के कारण तथा सांसारिक आकर्षणों से विमुख होने से संसारी लोग उन्हें बडे आश्चर्य से देखते हैं। कई बार तो समाज के भौतिक परिवेष में ऐसे साधक अलग-थलग पड जाते हैं। लोग उन्हें जगत् के लिये अयोग्य मानकर उपेक्षा भी करने लगते हैं। ऐसे निष्ठावान साधकों को, यदि वे सचमुच विवेक व वैराग्य से युक्त तथा ज्ञान निष्ठा से सम्पन्न हैं, अवश्य ही अपना घरबार छोडकर प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण एकान्त आश्रम या मठ में चले जाना चाहिये। शान्त व पवित्र वातावरण से साधना में बहुत सहायता मिलती है।
    परन्तु केवल इस डर से वनों की ओर भाग जाना कि कहीं भौतिक आकर्षण उन्हें फँसा न ले, कायरता के अतिरिक्त कुछ नहीं है। यह पलायन है, सन्यास नहीं। यह उसी प्रकार है जैसे शिकारी के डर से हिरन जंगल में भाग जाते हैं। वास्तव में वीर पुरुष तो वे हैं जो प्रबल भावोद्वेगों के बावजूद दृढता से सन्मार्ग पर चलते रहते हैं। इसलिये कहा भी गया है-
     " विकारहेतौ सति विक्रियन्ते येषां न चेतांसि त एव धीरा:"
    मन की कमजोरी के कारण भागना एक बात है और दृढतापूर्वक प्रयास करते हुए अपने आपको खतरों से बचाना भिन्न बात हैं आग का स्पर्श जलायेगा अवश्य और विषैले सर्प भी काटेंगे जरूर। इसी प्रकार इन्द्रिय विषयों के बीच रहकर विकृति से बचना कैसे सम्भव है? विषय सुख का आकर्षण किसी को नहीं छोडता फिर चाहे वह सन्यासी हो या गृहस्थ।
    स्थिर व निर्मल मन वाले व्यक्तियों की भौतिक सुखों के जाल में फँसने की उतनी ही सम्भावना रहती है जितनी कि अज्ञानी व मूर्ख लोगों की। फिर प्रश्न उठता है कि दोनों म अन्तर क्या है? क्या मन को स्थिर व परिष्कृत करने के लिये शास्त्रों में वर्णित साधनायें अर्थहीन हैं? गीता में ' स्थित प्रज्ञ' के लक्षण बहुत विस्तार से बताये गये हैं। क्या इसकी कोई उपयोगिता नहीं है? जब हम इन सभी प्रश्नों पर विचार करते हैं तो यह निष्कर्ष निकलता है कि विषय वस्तुओं में आकर्षित करने का गुण स्वाभाविक है। इसे बदला नहीं जा सकता। जैसे कपडे को घडा नही बनाया जा सकता उसी प्रकार यदि विषय सुख बन्धन का कारण है तो फिर उन्हें मुक्ति का हेतु कदापि नहीं बनाया जा सकता। इसलिये विषय वस्तुओं के लक्षण को समझना और उससे अपने आपको बचाये रखना, दोनों बहुत आवश्यक है।
    सच्चा महात्मा वही है जिसने सांसारिक सुखों को विष के समान त्याग दिया है। विवेक द्वारा उत्पन्न वैराग्य के फलस्वरूप जिसकी इच्छायें समाप्त हो गई हैं तथा वह सतत् आत्मस्वरूप के आनन्द में मग्न रहता है। ऐसे आत्मज्ञानी पुरुष चाहे जहाँ और जिस अवस्था में रहें, वह सर्वत्र उसी एक आत्मस्वरूप के दर्शन करता रहता है। उसे फिर न तो कोई आकर्षण लुभा पाता है और न कोई बन्धन बाँध सकता है। यदि किसी साधक का मन उत्तेजनाओं और प्रलोभनों के मध्य भी शान्त व स्थिर बना रहता है तो वह निश्चित ही दूसरे साधारण व्यक्तिय से भिन्न होगा और इससे कोई फर्क नहीं पडेगा कि वह घर-परिवार में रह रहा है या वन में। ऐसा साधक सदैव प्रसन्नचित, निर्भय और अविचल रहता है। इस स्थिति को प्राप्त साधक ही समाधि के योग्य हैं। कभी जब इस स्थिति को प्राप्त साधक किन्हीं कारणों से अवरुद्ध हो जाता है, तो वह अगले जन्म में प्रारम्भ से ही इन सद्गुणों से सम्पन्न रहता है और घर पर रहते हुए भी शीघ्र ही समाधि अवस्था तक पहुँच जाता है। ऐसे साधकों को गीता में "योगभ्रष्ट" की संज्ञा दी गई है, अर्थात् वह साधक जो योग के कठिन मार्ग में कहीं भटक गया हो। ऐसे कुछ साधक आत्मसाक्षात्कार के लिये परिस्थितियों की अनुकूलता पाकर सन्यास आश्रम का वरण कर लेते हैं। सन्यास ग्रहण करने के पीछे उनका मुख्य उद्देश्य सत्य के मार्ग पर आगे बढना व अनावश्यक अवरोधों तथा आकर्षणों से अपने आपको सुरक्षित करना होता है।
    त्यागानन्द कभी अपने एकान्त के क्षणों में विचार करता कि सन्यास आश्रम की यह परम्परा आगे भी अक्षुण्य बनी रहेगी? वर्तमान समय में तो आत्मानुभूति के पथिकों के लिये यही एकमात्र व सर्वोत्कृष्ट मार्ग है। जिस प्रकार एक मधुमक्खी तरह-तरह के फूलों से रस एकत्र कर शहद बनाती है और फिर उसके रसानन्द में मुग्ध रहती है, उसी प्रकार एक भिक्षुक शास्त्रों के ज्ञान व कठिन तपश्चर्या के फलस्वरूप प्राप्त आत्मानुभूति के आनन्द में मग्न महिमामय जीवन व्यतीत करता है। इसी कारण आज भी बडे-बडे प्रतिभावान् तथा सर्वसम्पन्न साधक अपना सब कुछ त्यागकर इस महान् व विलक्षण परम्परा का अनुसरण करते हैं। त्यागानन्द ने भी प्राचीन ऋषियों के आदर्श को अपनाते हुए बहुत विचारपूर्वक सन्यास आश्रम में प्रवेश किया था। वह अपने निर्णय से पूरी तरह सन्तुष्ट व प्रसन्न था।

कठिन जीवन

    सन्यासी वेश में ऋषिकेश पहुँचने के पश्चात् त्यागानन्द ने अपने आपको केवल एक समय के भोजन पर निर्भर कर लिया। वह किसी अन्नक्षेत्र या फिर किसी अन्य आश्रम में भिक्षा ग्रहण कर लेता था। प्रारम्भ के कुछ दिन उसने ऋषिकेश के आबादी वाले इलाके में व्यतीत किये और फिर शहर से करीब दो मील दूर स्थित ब्रह्मानन्द आश्रम में चला गया। यह आश्रम पवित्र गंगा के किनारे एक शान्त व रमणीक स्थान में था। इसके प्रमुख स्वामी हृदयानन्द जी थे, जिनके सानिध्य में उसने नासिक में कुछ समय व्यतीत किया था। स्वामी हृदयानन्द जी अब स्थायी रूप से नासिक में ही रहने लगे थे। उन्होंने ही नासिक प्रवास के समय त्यागानन्द से इस आश्रम में रुकने का आग्रह किया था। ऋषिकेश आश्रम की देखभाल व व्यवस्था स्वामी नारायणपुरी नामक भक्त करते थे। वे मलयाली थे। उन्होंने वेदान्त ग्रन्थों का गहन अध्ययन तो नहीं किया था किन्तु फिर भी वे स्वयं को बहुत विद्वान् समझते थे। वैसे तो उनमें प्रेम व नम्रता जैसे सद्गुणों का अभाव था, फिर भी उन्होंने त्यागानन्द के प्रति बहुत स्नेह व आभार व्यक्त किया। इस सद्व्यवहार का मुख्य कारण यह था कि त्यागानन्द भी केरल निवासी थे तथा स्वामी हृदयानन्द जी के परिचित थे। आश्रम के एकान्त व शान्त वातावरण को पाकर त्यागानन्द ने अपनी तपश्चर्या को और कठिन बना लिया। शारीरिक सुख व दुःखों की परवाह किये बिना उसका अधिकांश समय आत्मानन्द की अनुभूति में ही व्यतीत होता था। उन दिनों आश्रम की व्यवस्था कुछ गडबडाई हुई थी। आश्रम में रह रहे साधुओं तक के लिये नियमित भोजन नहीं बनता था। इसलिये त्यागानन्द को भी कभी-कभी बाहर किसी अन्य स्थान से भिक्षा ग्रहण करनी पडती थी।
    धीरे-धीरे शीत ऋतु आने लगी। दक्षिण निवासी होने के कारण त्यागानन्द कम तापमान में रहने का अभ्यस्त नहीं था। ठंड के शीर्ष पर पहचते-पहचते स्वामी जी की कठिनाई बहुत ज्यादा बढ गई। पौष्टिक भोजन के अभाव व अल्पता के कारण उनका शरीर कृशकाय व कमजोर पड गया था। उनके पास कडकती ठंड से निपटने के लिये पूरे गर्म कपडे भी नहीं थे। इसलिये ठंड के बढने से उनकी समस्या बहुत गम्भीर हो गई। ठंड ने उन्हें उसी प्रकार जकड लिया जिस प्रकार एक निहत्था व्यक्ति एक सुसज्जित शत्रु के हाथों परास्त हो जाता है। वसे तो स्वामी जी बहुत पहले से ही एक समय भोजन ले रहे थे, परन्तु अब उन्हें उत्तर भारतीय भोजन पर निर्भर होना पड रहा था जो उनके नैसर्गिक स्वाद के अनुकूल नहीं था। शारीरिक कमजोरी का यह भी एक कारण था। पहले वे चावल, हरी सब्जियों से युक्त सांभर तथा दही के रूप में पौष्टिक भोजन लेते थे। अब उन्हें गेहुँ के आटे की रोटियों से भूख मिटानी पड़ती थी। इस कारण वे बहुत दुबले और कमजोर हो गये। ठंड की मार व कमजोर शरीर के कारण त्यागानन्द को असहनीय पीडा हुई। इतनी परेशानी उसे पहले कभी नहीं हुई थी, किन्तु उसने फिर भी सब कुछ धैर्यपूर्वक व प्रसन्न रहते हुए सहन कर लिया। उसका मानना था कि यह सब तपश्चर्या का अनिवार्य अंग है। इतनी तकलीफ के बावजूद उसने न कभी शिकायत की और न कभी उदास हुआ। वह शास्त्रों के कथन "तानि व एतानि अपराणि तपांसि। न्यासएवात्यरेचयत्" से भलीभाँति परिचित था और सहमत भी।
    ' तप का अर्थ है दु: ख व कष्टों में भी आनन्द का अनुभव करना '। फिर कोई सच्चा साधक क्यों दु:ख व कष्टों से दूर भागेगा। इसलिये शरीर को गला देने वाली कडकडाती ठंड में भी त्यागानन्द ने प्रतिदिन गंगा स्नान का नियम नहीं तोडा। जब तक वह ऋषिकेश में रहा उसने नित्य गंगा स्नान के क्रम में कोई बाधा नहीं आने दी।
    एक सन्यासी के लिये निष्क्रिय बैठना किसी भी दृष्टि से उत्तम नहीं है। उसे तो सदैव सजग व सक्रिय होकर जीवन व्यतीत करना चाहिये। उसकी सक्रियता लोक-संग्रह व साधना में निहित हैं उसका जीवन समाज के लिये आदर्श व प्रेरणास्रोत होता है। इसलिये सन्यासिय को बहुत सतर्कतापूर्वक जीवन यापन करना चाहिये। अन्यथा जीवन का यह सर्वोत्कृष्ट मार्ग भी तिरस्कारित होने लगेगा। त्यागानन्द ने अपने गहन अध्ययन, मनन व अभ्यास के फलस्वरूप इस सत्य को भलीभाँति जान लिया था। उसने शीघ्र ही अपनी दिनचर्या का एक क्रम निश्चित कर लिया और दृढता से उसका पालन करने लगा। उसकी एक विशेष बात थी कि वह नियमों को भारस्वरुप न मानकर उनमें प्रसन्नता का अनुभव करता था। स्वयं निर्धारित नियम सहज ही उसकी दिनचर्या के अंग बन जाते थे। धार्मिक ग्रन्थों के अध्ययन व ज्ञानार्जन की उसकी स्वाभाविक रुचि थी। इसलिये नियमित अध्ययन को उसने अपनी दिनचर्या में विशेष स्थान दिया था। आश्रम के पास ही स्वामी रामतीर्थ जी की स्मृति में स्थापित एक पुस्तकालय था। इसमें दर्शनशास्त्र व विभिन्न धर्मों से सम्बन्धित पुस्तकों का बहुत अच्छा संग्रह था। उसने अपनी रुचि के अनुसार एक-एक पुस्तक लेकर एक विद्यार्थी की तरह गहन अध्ययन किया। पाँच छ: साल के अपने ऋषिकेश प्रवास के समय उसने हिन्दी, अंग्रेजी व संस्कृत की सभी अच्छी-अच्छी किताब पढ़ डालीं। उसने बौद्ध, जैन व क्रिश्चियन आदि धर्मों से सम्बन्धित पुस्तकों का भी अध्ययन किया। विश्व के सभी धर्मों व दर्शन पद्धतियों को जानने से उसे बहुत लाभ हुआ। वह मानने लगा कि दृष्टि की व्यापकता के लिये यह अध्ययन आवश्यक है।

Sunil Yadav----Varanasi.