वार्ता:चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य

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चंद्रगुप्त विक्रमादित्य[संपादित करें]

महाशय, एक भी इतिहासकार यह सिध्द नहीं कर पाया है कि चंद्रगुप्त द्वितीय (गुप्त वंशीय) ने विक्रम संवत् चलाया। केवल यह एक अनुमान था जो राजबली पांडेय ने और परवर्ती इतिहासकारों ने गलत सिध्द कर दिया है। थोडा पढा करो। स्वघोषित इतिहासकार मत बनो। कोई भी तुम्हें मुर्ख ही कहेगा। 74 पुरातत्वविक प्रमाणों ने मालवगणमुख्य विक्रमादित्य और मालवगण को सिध्द कर दिया है और अब सभी इतिहासकार मालव या विक्रम संवत् को मालवा का या उज्जयिनी के विक्रमादित्य द्वारा शको पर विजय के उपलक्ष में प्रवर्तित मानते हैं। तुम भाई किस जमाने में जी रहे हो। कितना अज्ञान और पिछडापन भरा तुममें। उतना पुराना मत जो कब का खण्डित हो चुका है विकिपीडिया पर चला रहे हो। हंसी आती इस मुर्खता पर। भारत के प्रतियोगिता परिक्षाओं में इसको पुछा गया था। GK की lucent publication में भी अब आ गया है कि उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य ने यह संवत् ईसा पूर्व 57 में आरंभ किया। चलो कोई बात नहीं। पकड़े रहो उसी असत्य को लेकिन हम और करोड़ों विज्ञार्थी ऐसे झुठ को मानकर पेपर देंगे तो हमारा तो सत्यानाश ही है। खाली समय था इसलिए मुर्ख को समझाया अन्यथा महाराज भर्तृहरि ने कहा भी है कि मुर्खो से विवाद निरर्थक है। जय मां भारती। Aniket M Gautam (वार्ता) 05:53, 28 जनवरी 2021 (UTC)[उत्तर दें]

57 नहीं 58 है।। (06:09, 28 जनवरी 2021 (UTC))

विक्रम संवत्[संपादित करें]

Lucent सामान्य ज्ञान ISBN 978-93-84761-58-5. के 12 वे संस्पृकरण (सन 2019) में पृ. 13. पर उद्धृत है कि शको के विजय के उपलक्ष में उज्जयिनी के या मालवा के राजा विक्रमादित्य ने विक्रम संवत् ईसा पूर्व 58 में यह संवत् आरंभ किया। और फिर विक्रम के नाम की उपाधि बन गयी जिसे बाद में अनेक सम्राटों ने धारण किया। Aniket M Gautam (वार्ता) 06:04, 28 जनवरी 2021 (UTC)[उत्तर दें]