रिवर्स रेपो रेट

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पुनः क्रय अनुबंध अथवा रिपर्चेज एग्रीमेंट (Repurchase agreement) अथवा रेपो सामान्यतः सरकारी प्रतिभूतियों से लघु-अवधि उधार को कहते हैं। इसमें विक्रेता निवेशकों को विचाराधीन प्रतिभूतियों का विक्रय करता है और उसके कुछ दिनों बाद थोड़े अधिक मूल्य के साथ पुनः क्रय कर सकता है।

रिजर्व बैंक इंडिया के लिए रेपो का उपयोग[संपादित करें]

भारत में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) अर्थव्यवस्था में धन की आपूर्ति को कम या अधिक करने के लिए रेपो और रिवर्स रेपो को काम में लेता है। आरबीआई वाण्यिजिक बैंकों को जब उधार देता है तो उसे रेपो दर (repo rate) कहा जाता है। मुद्रास्फीति के समय, आरबीआई रेपो दर को बढ़ा देता है जिससे बैंकों द्वारा धन उधार लेने और अर्थव्यवस्था में धन की आपूर्ति कम होने को हतोत्साहित किया जाता है।[1] जून 2017 के अनुसार आरबीआई रेपो दर 6.25% और रिवर्स रेपो दर 6.00% थी।[2]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Definition of 'Repo Rate'" ['रेपो दर' की परिभाषा]. द इकॉनोमिक टाइम्स (अंग्रेज़ी में). अभिगमन तिथि 13 जून 2019.
  2. "RBI keeps policy rate unchanged at 6.25%" [आरबीआई ने नीति दर को 6.25% पर अपरिवर्तित रखा]. मिंट (अंग्रेज़ी में). 6 अप्रैल 2017. अभिगमन तिथि 13 जून 2019.