राज्य की मार्क्सवादी अवधारणा

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कार्ल मार्क्स ने अपने पीएचडी शोध-प्रबंध के बाद लिखी गयी पहली लम्बी रचना में काफ़ी गहनता से राज्य की अवधारणा का विश्लेषण किया था। इस रचना का शीर्षक था : 'क्रिटीक ऑफ़ हीगेल्स फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ स्टेट' (1843)। बाद में मार्क्स ने अपने ऐतिहासिक लेखन में राज्य पर गहराई से विचार किया। इस संदर्भ में 'क्लास स्ट्रगल इन फ़्रांस' (1850), 'एट्टींथ ब्रूमेर ऑफ़ लुई बोनापार्ट' (1852) और 'सिविल वार इन फ़्रांस' (1871) का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है। एंगेल्स ने भी एंटी-ड्युहरिंग (1878) और ऑरिजिन ऑफ़ फैमिली (1894) में राज्य पर विस्तार से चर्चा की है। लेनिन ने बोल्शेविक क्रांति से ठीक पहले लिखे गये अपने प्रबंध स्टेट ऐंड रेवोल्यूशन में राज्य के मार्क्सवादी सिद्घांत की पुनर्व्याख्या करने की कोशिश की। परवर्ती मार्क्सवादी चिंतकों में ग्राम्शी ने भी राज्य की भूमिका पर गहराई से विचार किया। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मार्क्सवाद में होने वाले वाद-विवाद में राज्य पर कम ध्यान दिये जाने का एक बड़ा कारण आधिकारिक या सोवियत मार्क्सवाद के भीतर स्तालिनवाद का वर्चस्व था। इसके तहत कोशिश रहती थी कि मार्क्सवाद के भीतर विभिन्न श्रेणियों के बारे में किसी गहरे वाद-विवाद को बढ़ावा न दिया जाए। इसके अलावा, मार्क्सवाद पर अक्सर हावी होने वाले आर्थिक निर्धारणवाद के कारण भी राज्य की अवधारणा की उपेक्षा की गयी। इसके तहत मान लिया गया था कि राज्य अधिरचना का भाग है, जिसकी रूपरेखा और प्रकृति हमेशा ही आर्थिक आधार द्वारा तय होती है। लेकिन साठ के दशक से मार्क्सवाद के भीतर राज्य और इसकी ‘सापेक्षिक स्वायत्तता’ के बारे में काफ़ी गहराई से वाद-विवाद शुरू हुआ। इसमें अलथुसे, पोलांत्साज़ और मिलिबैंड जैसे विद्वानों ने योगदान किया।

परिचय[संपादित करें]

मार्क्स ने हीगेल के राजनीतिक दर्शन की समीक्षा करते हुए राज्य के बारे में अपने विचारों का विकास किया। हीगेल ने फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ राइट्स में यह बताया है कि सामाजिक जीवन के तीन स्तर होते हैं : परिवार, नागर समाज और राज्य। परिवार के भीतर ‘विशिष्ट परमार्थवाद’ होता है, जिसमें व्यक्ति अपने परिजनों की भलाई के लिए अपने हितों को भी कुर्बान कर देता है। दूसरी ओर, नागर समाज ‘सार्वभौम अहंवाद’ (युनिवर्सल इगोइज़म) का क्षेत्र है। यहाँ हर व्यक्ति दूसरों के हितों की तुलना में अपने हितों को ज़्यादा महत्त्व देता है। नागर समाज में लोग एक-दूसरे पर निर्भर भी होते हैं। लेकिन दूसरों के प्रति उसका व्यवहार यांत्रिक और स्वार्थ से भरा होता है। हीगेल मानते हैं कि राज्य एक ऐसा दायरा है जो ‘सार्वभौमिक परमार्थवाद’ (युनिवर्सल अल्ट्रूइज़म) का प्रतिनिधित्व करता है। वे इसे मानवीय चेतना का आख़िरी और सर्वोच्च पड़ाव मानते हैं। उनकी निगाह में राज्य हर व्यक्ति की इच्छाओं को प्रतिबिम्बित करता है। मार्क्स परिवार और नागर समाज के बारे में तो हीगेल के विचारों को स्वीकार करते हैं, लेकिन राज्य के बारे में नहीं। मार्क्स का कहना है कि नागर समाज में विभिन्न व्यक्तियों और वर्गों के बीच होने वाली होड़ का विस्तार राज्य तक होता है। प्रभुत्वशाली वर्ग (पूँजीवाद में पूँजीपति वर्ग) अपने हितों को पूरा करने और दूसरे वर्गों पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए राज्य का उपयोग करता है। असल में, मार्क्स के लेखन में पूँजीवादी राज्य के बारे में दो तरह के विचार मिलते हैं। आम तौर पर पहले सिद्घांत की ज़्यादा चर्चा होती जिसका वर्णन कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो (1848) में किया गया है। इसके अनुसार, ‘आधुनिक राज्य की कार्यपालिका पूरे बूर्ज़्वा मामलों का प्रबंधन करने वाली समिति है।’ यहाँ राज्य को शासक वर्ग के एक यंत्र के रूप में देखा गया है। यानी पूँजीवादी व्यवस्था में पूँजीपतियों का इस पर आधिपत्य होता है। इस तरह मार्क्स उदारतावादी राज्य के बुनियादी विचार को ख़ारिज करते हैं कि राज्य समाज के सभी लोगों के हितों के बारे तटस्थ और निष्पक्ष रूप से फ़ैसला करता है।

लेकिन मार्क्स ने एट्टींथ ब्रूमेर ऑफ़ लुई बोनापार्ट (1852) में राज्य के बारे में दूसरा दृष्टिकोण भी पेश किया है। इसमें मार्क्स ने 1848 से 1851 के बीच फ़्रांस की क्रांतिकारी घटनाओं का परीक्षण करते हुए तर्क दिया है कि ‘राज्य सापेक्षिक रूप से स्वायत्त’ होता है। इसका अर्थ यह है कि राज्य समाज पर अपनी इच्छा थोपने में समर्थ है। मार्क्स के अनुसार इसका कारण यह था कि फ़्रांस में बोनापार्टवाद बूर्ज़्वा के एक हिस्से और सर्वहारा के एक हिस्से के बीच अवसरवादी और लोकलुभावनवादी गठजोड़ था। इसका मुख्य लक्ष्य अपने शासन के लिए वैधता हासिल करना था। इसने यह दिखाया कि यदि समाज में वर्ग-शक्तियों के बीच स्पष्ट संतुलन हो तो राज्य की स्वायत्तता हासिल की जा सकती है। राज्य ऐसी स्थिति में अपनी इच्छा थोपने में समर्थ होता है। मार्क्स का यह दृष्टिकोण उनके पहले दृष्टिकोण से अलग है। यहाँ राज्य प्रभुत्वशाली वर्ग का यंत्र नहीं है, बल्कि उसे कुछ स्वायत्तता भी मिली हुई है। लेकिन राज्य की स्वायत्तता असीम नहीं होती। उसे सिर्फ़ आंशिक स्वायत्तता ही मिली होती है। राज्य आपस में होड़ करने वाले वर्गों के बीच मध्यस्थता करता है। इस तरह, यह वर्गों के अस्तित्व को भी कायम रखता है।

मार्क्स और एंगेल्स ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि पूँजीवाद की समाप्ति के साथ पूँजीवादी राज्य भी ख़त्म हो जाएगा और सर्वहारा की तानाशाही स्थापित होगी। स्पष्टतः मार्क्स ने यह माना कि राज्य एक ऐसा यंत्र (या साधन) है जिसके द्वारा आर्थिक रूप से प्रभुत्वशाली वर्ग दूसरे वर्गों का दमन कर सकता है। इसलिए हर राज्य वर्ग-तानाशाही का उदाहरण है। यहाँ सर्वहारा के फ़ायदों का मतलब यह है कि क्रांति के फ़ायदों का सुरक्षित रखा जाए और बूर्ज़्वा वर्ग की प्रति-क्रांति को रोका जाए। लेनिन ने बोल्शेविक क्रांति के बाद सोवियत यूनियन की आवश्यकताओं और अनुभवों के आधार पर सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के विचार को ज़्यादा स्पष्टता प्रदान की। उन्होंने स्टेट ऐंड रेवोल्यूशन (1917) में इस ‘संशोधनवादी’ विचार का विरोध किया बूर्ज़्वा राज्य को सुधारा जा सकता है। उन्होंने मार्क्सवाद के भीतर इस विचार को पूरी तरह स्थापित करने की कोशिश की कि बूर्ज़्वा राज्य को उखाड़ फेंकना ही एकमात्र विकल्प है। उन्होंने मार्क्सवाद में लोकतांत्रिक केंद्रवाद के आधार पर पार्टी के गठन का विचार जोड़ा और पार्टी की भूमिका को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया। उनके अनुसार क्रांति के बाद सर्वहारा वर्ग की तानाशाही स्थापित होगी जिसमें पूँजीवादी शासन के दौरान मौजूद कुछ ख़ास संस्थाओं को हटाया जाएगा और इनकी जगह ऐसी संस्थाएँ स्थापित होंगी जो लोगों को राज्य-सत्ता के प्रयोग में समर्थ बनाएँगी। जैसे-जैसे लोग खुद राज्य-सत्ता उपयोग करने लगेंगे, वैसे-वैसे राज्य-सत्ता की आवश्यकता और भूमिका कम होती जाएगी।

लेनिन के बाद स्तालिन ने यह सिद्घांत स्थापित करने की कोशिश की कि राज्य सिर्फ़ अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करता है, बल्कि इसमें हर किसी का हित शामिल है। इस तरह स्तालिन ने राज्य और इसके फ़ैसलों को सर्वोच्च बना दिया। लेनिन की निगाह में यह ख़तरा मौजूद था कि सर्वहारा की तानाशाही पार्टी की तानाशाही में तब्दील हो सकती है। स्तालिन ने अपने शासन द्वारा इस आशंका को सही साबित किया। दूसरे देशों में भी जहाँ पार्टी को केंद्र में रख कर मार्क्सवादी क्रांति की गयी, वहाँ क्रांति के बाद सर्वहारा वर्ग की तानाशाही व्यवहार में कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही बन गयी। इसने असहमति की अभिव्यक्ति को असम्भव बना दिया। कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा शासित देशों में इसके कारण व्यापक हिंसा और राजकीय दमन हुआ।

पारम्परिक रूप से मार्क्सवाद के भीतर राज्य को दमन या बल-प्रयोग से जोड़ा जाता रहा है। इटली के मार्क्सवादी चिंतन एंतोनियो ग्राम्शी ने मार्क्सवाद में एक नये विचार की शुरुआत की। उनके अनुसार शासक वर्ग सिर्फ़ दमन या बल- प्रयोग द्वारा अपना प्रभुत्व कायम नहीं रखता है। इसके लिए वह विचारधारात्मक औज़ारों का भी प्रयोग करता है। वह बल-प्रयोग से ही अपना काम नहीं चलाता, बल्कि वर्चस्व की रचना भी करता है। वर्चस्व द्वारा शासक वर्ग उन वर्गों की सहमति हासिल करता है जिस पर उसे प्रभुत्व कायम रखना है। शिक्षा और जनसंचार माध्यम इसमें मदद करते हैं। इन्हें विचारधारात्मक राज्य-तंत्र की भी संज्ञा दी जा सकती है। ग्राम्शी ने स्पष्ट किया कि राज्य और शासक वर्ग कई दफ़ा शासित वर्गों की बहुत सी माँगों को स्वीकार करते हैं। शासितों को यह अहसास दिलाया जाता है कि राज्य के काम पूरी तरह उनके हित में भी हैं। इस तरह ग्राम्शी ने राज्य के मार्क्सवादी विश्लेषण में एक नया आयाम जोड़ा।

फ़्रांसीसी विद्वान् लुई अलथुसे ने विचारधारात्मक राज्य-तंत्र और दमनकारी राज्य-तंत्र का विचार विकसित किया। अलथुसे संरचनावादी हैं। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि विचारधारात्मक राज्य-तंत्र और दमनकारी राज्य- तंत्र दोनों ही शासक वर्ग के हितों के अनुरूप व्यवस्था बनाये रखने का काम करते हैं। ये दोनों साधन या तरीके अलग- अलग होने के बावजूद आपस में जुड़े हुए हैं। पहला, दमनकारी राज्य-तंत्र है, जिसमें कानून, न्यायालय, पुलिस, सेना और राज्य की दूसरी संस्थाएँ शामिल हैं। यदि कोई व्यक्ति राज्य के निर्देशों का पालन नहीं करता है तो उस पर जुर्माना लगाकर या उसे जेल भेजकर सज़ा दी जाती है। दूसरा विचारधारात्मक राज्य-तंत्र है जो ताकत की बजाय विचारधारा के माध्यम से काम करता है। इसमें वे क्षेत्र शामिल हैं, जहाँ हम अपने व्यक्तिगत विचार और आज़ादी हासिल करते हैं और उनका प्रयोग करते हैं। अलथुसे स्पष्ट करते हैं कि दमनकारी राज्य-तंत्र सिर्फ़ बल-प्रयोग पर ही आधारित नहीं होता, बल्कि उसे भी विचारधारा की मदद लेनी पड़ती है। मसलन, सेना, न्यायालय आदि भी एक स्तर पर किसी ख़ास विचारधारा के अनुरूप ही काम करते हैं। इसी तरह विचारधारात्मक राज्य-तंत्र के अंतर्गत आने वाली संस्थाओं, मसलन चर्च, स्कूल आदि में सिर्फ़ विचारधारा का प्रयोग नहीं होता है बल्कि इसमें समय-समय पर बल प्रयोग भी किया जाता है (जैसे कि स्कूल में मिलने वाली सज़ा; चर्च द्वारा दी जाने धार्मिक सज़ा आदि)। अलथुसे वैचारिक राज्य-तंत्र में शिक्षा की भूमिका को काफ़ी महत्त्वपूर्ण मानते हैं। ग्राम्शी के विपरीत वे इसे सिर्फ़ मानक, मूल्यों, समाज की संकल्पना आदि के विकास से ही नहीं जोड़ते हैं, बल्कि उनका मानना है कि यह श्रम-विभाजन में संजीदा भूमिका अदा करता है। अर्थात् यह विशिष्ट लोगों को विशिष्ट श्रम के लायक बनाता है। बहरहाल, ग्राम्शी की तरह अलथुसे भी मानते हैं कि कोई भी शासक वर्ग तभी अपना वर्चस्व कायम रख सकता है जब वह दमनकारी राज्य-तंत्र और विचारधारात्मक राज्य- तंत्र, दोनों पर अपना नियंत्रण रखे। ग्राम्शी की तरह ही वे भी मानते हैं कि विचारधारात्मक स्तर पर शासक वर्गों को चुनौती देना आवश्यक है। अलथुसे और ग्राम्शी के विचारों में कुछ समानताएँ होने के बावजूद यह स्पष्ट है कि अलथुसे ने संरचनावादी के रूप में अपने विचार व्यक्त किये और व्यक्ति की बजाय संरचनाओं की भूमिका को ज़्यादा तरजीह दी। उन्होंने प्रस्तावित किया कि मार्क्स की उत्पादन प्रणाली की अवधारणा में तीन विशिष्ट संरचाएँ या स्तर होते हैं (आर्थिक, राजनीतिक और विचारधारात्मक)। ये तीनों नज़दीकी रूप से और आंतरिक तौर पर जुड़ कर उत्पादन प्रणाली की मैट्रिक्स का निर्माण करते हैं। किसी सामाजिक व्यवस्था में आर्थिक, राजनीतिक और विचारधारात्मक में से कोई भी प्रभुत्वशाली राजनीतिक संरचना हो सकती है, लेकिन आर्थिक संरचना हमेशा यह तय करती है कि इन तीनों में से कौन सबसे प्रभुत्वशाली होगा।

निकोस पोलांत्साज़ ने अलथुसे द्वारा मार्क्स की संरचनावादी व्याख्या का प्रयोग राज्य के अध्ययन के लिए किया। यह भी उल्लेखनीय है कि पोलांत्साज़ की पहली रचना और दूसरी रचना के बीच में उनके विचारों में बदलाव आया। उनकी पहली किताब पॉलिटिकल पॉवर ऐंड सोशल क्लासेज़ 1968 में प्रकाशित हुई थी और दूसरी स् टेट पॉवर ऐंड सोशलिज़म 1978 में। पहली किताब पूरी तरह से संरचनावादी थी। इसमें राज्य वर्ग-संरचना का पुनरुत्पादन करता दिखाया गया है, क्योंकि यह राजनीतिक क्षेत्र में आर्थिक वर्ग संबंधों की अभिव्यक्ति होता है। इसलिए राज्य का स्वरूप और कार्य वर्ग संबंधों की संरचना से तय होता है। अपने इस शुरुआती काम में पोलांत्साज़ यह भी तर्क देते हैं कि हीगेलवादी आदर्श की तरह कोई सर्वसमावेशी और समयातीत राज्य नहीं होता है। विशिष्ट उत्पादन प्रणाली के अनुसार ही राज्य भी होता है, जैसे कि पूँजीवादी राज्य, सामंती राज्य आदि। इसके अलावा अपनी इस किताब में वे अलथुसे के इस विचार का भी प्रयोग करते हैं कि राजनीति और अर्थशास्त्र को ‘सापेक्षिक स्वायत्तता’ (रिलेटिव ऑटोनॉमी) मिली होती है। इसकी मदद से वे तर्क देते हैं कि पूँजीवादी राज्य वर्गीय राज्य है और निश्चित तौर पर इसे प्रभावकारी तरीके से काम करने के लिए उत्पादन में होने वाले वर्ग-संघर्ष से सापेक्षिक रूप से स्वायत्त होना चाहिए। इस तर्क के अनुसार पूँजीपति वर्ग कई धड़ों में बँटा होता है और इनमें से जिस समूह का वर्चस्व है, उसके संगठन के रूप में सापेक्षिक रूप से स्वायत्त राज्य एक ऐसे स्थान के रूप में होता है, जो कई धड़ों में बँटे पूँजीपति वर्ग के वर्चस्व वाले समूह के संगठन के रूप में होता है। मजदूरों का संघर्ष केवल उसी सीमा तक राज्य को प्रभावित करता है, जिस सीमा तक वह उत्पादन में वर्ग-संबंधों का भाग होता है।

पोलांत्साज़ के इस लेखन की बहुत सारे स्तरों पर आलोचना हुई। इस संदर्भ में न्यू लेक्रट रिव्यू में, 1969-70 में रॉल्फ़ मिलिबैंड और पोंलात्साज़ के बीच हुए वाद-विवाद का मार्क्सवाद के भीतर महत्त्वपूर्ण स्थान है। मिलिबैंड ने 1969 में प्रकाशित अपनी किताब द स्टेट इन कैपिटलिस्ट सोसायटी में पोलांत्साज़ द्वारा प्रस्तुत राज्य के बहुलवादी मॉडल की आलोचना की। इसमें उन्होंने पूँजीवादी वर्ग-समाज में राज्य की भूमिका के बारे में मार्क्सवादी विचार का अपना संस्करण पेश किया। अमूमन मिलिबैंड के नज़रिये को यांत्रिकवाद (इंस्ट्रूमेंटलिज़म) और पोलांत्साज़ के नज़रिये को संरचनावाद (स्ट्रक्चरलिज़म) की संज्ञा दी जाती है। मिलिबैंड पोलांत्साज़ द्वारा प्रस्तुत बहुलवादी मॉडल की आलोचना करते हुए कहते हैं कि पूँजीवादी वर्ग के सदस्यों की राज्य-तंत्र और सरकार में सीधी भागीदारी होती है। इस कारण राज्य बूर्ज़्वा हितों से सीधे बँधा होता है और उन्हीं हितों को अभिव्यक्त करता है। पोलांत्साज़ ने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि बूर्ज़्वा वर्ग और राज्य के बीच वस्तुनिष्ठ संबंध होता है। इसका अर्थ यह है कि यदि राज्य के कार्य सामाजिक व्यवस्था को तय करते हैं और इस सामाजिक व्यवस्था में प्रभुत्वशाली वर्ग का हित राज्य के हितों से मिलता है, तो यह इस व्यवस्था का एक बन जाता है। ऐसे में शासक वर्ग के सदस्यों की राज्य-संयंत्र में सीधी भागीदारी इस वस्तुनिष्ठ संबंध का कारण नहीं होती है, बल्कि इसका प्रभाव होती है। इसके जवाब में मिलिबैंड ने यह तर्क दिया कि शासक वर्ग की अवधारणा की जगह वस्तुनिष्ठ संरचना और वस्तुनिष्ठ संबंधों की अवधारणा लाने का मतलब यह है एक ख़ास तरह का ‘संरचनात्मक निर्धारणवाद’ या ‘सरंचनात्मक अति निर्धारणवाद’ लाना। इन दोनों के बीच चली इस बहस के संदर्भ में मार्टिन कॉरनॉय ने यह तर्क दिया है कि असल में दोनों के ही लेखन में यांत्रिक या निर्धारणवादी प्रवृत्तियाँ मौजूद हैं। इसलिए किसी एक को यांत्रिकवादी और दूसरे को संरचनावादी कहना ठीक नहीं है।

बहरहाल, इस वाद-विवाद और दूसरे कई तरह के विचारों के सामने आने के बाद पोलांत्साज़ ने अपने विचारों में थोड़ा संशोधन किया। अपने बाद के काम में पोलांत्साज़ ने संरचनावादी राज्य के विचार को छोड़ दिया। इसकी जगह, उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि राज्य का स्वरूप खुद वर्ग- संघर्ष द्वारा तय होता है। 1973 में पोलांत्साज़ ने यह तर्क दिया कि सामाजिक वर्गों और राज्य के बीच अलग तरह का संबंध होता है, जो कि पूँजीवादी विकास के चरण पर निर्भर करता है। इसलिए पूँजीवादी उत्पादन संबंधों में बदलाव राजनीतिक संस्थाओं के स्वरूप को तय करता है। पूँजीवादी राज्य की ‘संरचना’ कोई ‘संरचना’ नहीं होती है। इसके बजाय, यह संरचनाएँ वर्ग-संघर्ष और इसके कारण पूँजीवादी उत्पादन में होने वाले बदलावों से तय होती हैं। स्टेट, पॉवर ऐंड सोशलिज़म में वे राज्य की ‘सापेक्षिक स्वायत्तता को द्वंद्वात्मक बना देते हैं। इस दलील के मुताबिक राज्य-तंत्रों के भीतर वर्ग-संघर्ष की सम्भावना होती है क्योंकि ‘स्वायत्तता’ के भीतर ही विरोधाभास निहित होता है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ये विरोधाभास और सामाजिक आंदोलन राज्य का स्वरूप तय कर रहे हैं।

मिलिबैंड-पोलांत्साज़ वाद-विवाद ने उत्तर-औपनिवेशिक पूँजीवादी-लोकतांत्रिक राज्यों में राज्य के विश्लेषण का नया आयाम खोला। मसलन, भारत में कई विद्वानों ने राज्य की सापेक्षिक स्वायत्तता को आधार बनाकर भारतीय राज्य की प्रकृति का विश्लेषण करने की कोशिश की। उल्लेखनीय है कि सोवियत संघ के पतन के बाद कई मार्क्सवादी पार्टियाँ राज्य के प्रति दोहरा रवैया अपना रही हैं। एक ओर वे राज्य के नव-उदारवादी एजेंडे और उसके बढ़ते दमनकारी स्वरूप का विरोध कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर उनका इस बात पर ज़ोर है कि राज्य ग़रीबों और हाशिये के समूहों की भलाई के लिए सक्रियता से काम करे। यह कहा जा सकता है कि सैद्घांतिक स्तर पर मार्क्स-एंगेल्स और लेनिन ने एक समय के बाद राज्य के धीरे-धीरे ख़त्म हो जाने की कल्पना की थी, लेकिन क्रांति के बाद सोवियत यूनियन और चीन जैसे राज्यों में क्रांति को सुरक्षित रखने में राज्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार किया गया। बाद के दौर में मार्क्सवाद के भीतर राज्य में विभिन्न समूहों की भूमिका, राज्य द्वारा शोषित या सर्वहारा समूहों को नियंत्रित करने की तकनीक और राज्य के स्वायत्त होने की सम्भावनाओं पर भी गम्भीरता से विचार-विमर्श होता रहा है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  • 1. मार्टिन कारनॉय (1984), द स्टेट ऐंड पॉलिटिकल थियरी, प्रिंसटन युनिवर्सिटी प्रेस, प्रिंसटन, न्यू जर्सी.
  • 2. वी.आई, लेनिन (1917), स्टेट ऐंड रिवोल्यूशन, कलेक्टेड वर्क्स, फ़ॉरेन लैंगवेज़ पब्लिशिंग हाउस, मॉस्को.
  • 3. बॉब जेशॉप (1982), द कैपिटलिस्ट स्टेट : मार्क्सिस्ट थियरीज़ ऐंड मेथड्स, मार्टिन रॉबर्टसन, न्यूयॉर्क युनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]