रघुनन्दन भट्टाचार्य

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रघुनन्दन भट्टाचार्य (15वीं-16वीं शती) बंगाल के विधि-ग्रन्थों के रचनाकारों में प्रमुख थे। इनका जन्म नवद्बीप में हुआ था। पिता का नाम था हरिहर। बंगाल के प्रख्यात निबन्धकार। इन्होने 'स्मृतितत्व' नाम से २८ निबन्ध, तीर्थयात्राविधि आदि प्रयोगग्रन्थ आदि लिखे। बंगीय निबन्धाकार जीमूतवाहन (१२वीं शताब्दी) रचित विख्यात 'दायभाग' नामक ग्रन्थ की टीका रचना की। स्मृतिशास्त्र में पाण्डित्य के कारण समग्र भारतबर्ष में 'स्मार्त भट्टाचार्य' नाम से प्रसिद्ध हुए। बहुत से निबन्ध और आलोचना करके तात्कालिक बंगीय हिन्दुसमाज के सामाजिक और धर्मसंक्रान्त विषय में निर्देश दिया। उनकी स्मृतितत्व के टीकाकारों में अष्टादश शताब्दी के बंगाल के काशीराम बाचस्पति प्रसिद्ध हैं।

कृतियाँ[संपादित करें]

अष्टविंशति तत्त्व[संपादित करें]

उनके २८ निबन्ध निम्नलिखित हैं:[1][2]

  1. अह्निका तत्त्व
  2. Chandoga-vrsotsarga-tattva
  3. दायतत्त्व
  4. देवप्रतिष्ठातत्त्व
  5. दिक्षातत्त्व
  6. दिव्यतत्त्व
  7. दुर्गोत्सवतत्त्व
  8. एकादशीतत्त्व
  9. जन्माष्टमीतत्त्व
  10. ज्योतिषतत्त्व
  11. कृत्यतत्त्व
  12. मलमासतत्त्व
  13. मठप्रतिष्ठातत्त्व
  14. प्रत्याश्चिततत्त्व
  15. पुरुषोत्तमक्षेत्रतत्त्व
  16. Rg-vrsotsarga-tattva
  17. सामश्रद्धातत्त्व
  18. संस्कारतत्त्व
  19. शुद्धितत्त्व
  20. शूद्रकृत्यतत्त्व
  21. Taddga-bhavanotsarga-tattva
  22. तिथितत्त्व
  23. Vastuydga-tattva
  24. विवाहतत्त्व (या, उद्वाहतत्त्व)
  25. व्रततत्त्व
  26. व्यवहारतत्त्व
  27. यजुर्श्रद्धातत्त्व
  28. Yajur-vrsotsarga-tattva

दायभाग पर टीका[संपादित करें]

रघुननदन भट्टाचार्य की दयाभागटीका या दयाभागव्याख्या, जिमूतवाहन द्वारा रचित दायभाग की टीका है। ब्रितानी राज में, जब न्यायालयों में हिन्दू विधि का उपयोग किया जाता था, कोलकाता उच्च न्यायालय ने रघुनन्दन भट्टाचार्य की दायभाग टीका को दायभाग पर सबसे अच्छी टीका कहा था।[1] विलियम जोन्स, ने कहा था कि यद्यपि हिन्दू विद्वान प्रायः जीमूतवाहन के दायभाग को उद्धृत करते थे, किन्तु बंगाल में रघुननदन भट्टाचार्य की दायभागटीका अधिक प्रचलित थी।[3]

दायभागटीका में अन्य विद्वानों और उनकी कृतियों के नाम का उल्लेख है, जिनमें मेधातिथि, कुल्लूक भट्ट, मिताक्षरा, विवाद-रत्नाकर (चन्द्रेश्वर ठाकुर), शूलपाणि, और विवाद-चिन्तामणि (वाचस्पति मिश्र) प्रमुख हैं।[3]

अन्य रचनाएँ[संपादित करें]

  • गया-शाद्ध-पद्धति
  • ग्रह-याग-तत्त्व (या ग्रह-प्रमाण-तत्त्व)
  • त्तिर्थयात्रा-तत्त्व
  • त्रिपुष्कर-शान्ति-तत्त्व
  • द्वादश-यात्रा-तत्त्व'
  • रस-यात्रा-तत्त्व (या, रस-यात्रा-पद्धति)

सन्दर्भ[संपादित करें]

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  3. Ludo Rocher (2002). Jimutavahana's Dayabhaga : The Hindu Law of Inheritance in Bengal: The Hindu Law of Inheritance in Bengal. Oxford University Press. पृ॰ 16. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-19-803160-4.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]