युग संधि

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दो युगों के बीच का समय संधि काल या युग संधि नाम से जाना जाता है| प्रस्तुत लेख यहाँ पर कलियुग और सतियुग के बीच के समय को इंगित करता है |

काल गणना के संदर्भ में युग शब्द का उपयोग अनेक प्रकार से होता है। जिन दिनों जिस प्रचलन या प्रभाव की बहुलता होती है उसे उसी नाम से पुकारा जाने लगता है। रामराज्य के दिनों की सर्वतोन्मुखी प्रगति, शांति और सुव्यवस्था को सतयुग के नाम से जाना जाता है। कृष्ण की विशाल भारत निर्माण सम्बंधी योजना के एक संघर्ष पक्ष को महाभारत का नाम दिया जाता हे। परीक्षित के काल में कलयुग के आगमन और उससे राजा के संभाषण अनुबंधों का पुराण गाथा में वर्णन है। अब भी रोबोट युग, कम्प्यूटर युग, विज्ञान युग आदि की चर्चा होती रहती हैं। अनेक लेखक अपनी रचनाओं के नाम युग शब्द जोड़कर करते है। यहाँ युग शब्द का अर्थ जमाने से है। जमाना अर्थात उल्लेखनीय विशेषता वाला जमाना, एक एरा, एक पीरियड इसी संदर्भ में आमतौर से 'युग' शब्द का प्रयोग होता है।

युगों की गणना अनेक प्रकार से होती है। उनमें एक गणना हजार वर्ष की है। प्रायः हर सहस्राब्दी में वातावरण बदल जाता है, परम्पराओं में उल्लेखनीय हेर-फेर होता है। बीसवीं सदी के अन्त और इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भ को एक युग का समापन और दूसरे का शुभारंभ माना गया है।

इसी भाँति पंचांगों में कितने ही संवत्सरों के आरंभ संबंधी मान्यताओं की चर्चा है। एक मत के अनुसार युग करोड़ों वर्ष का होता है। इस आधार पर मानवीय सभ्यता की शुरुआत के खरबों वर्ष बीत चुके हैं और वर्तमान कलयुग की समाप्ति में अभी लाखों वर्ष की देरी है। पर उपलब्ध रिकार्डों के आधार पर नृतत्ववेत्ताओं और इतिहासकारों का कहना है कि मानवीय विकास अधिकतम उन्नीस लाख वर्ष पुराना है, इसकी पुष्टि भी आधुनिक तकनीकों द्वारा की जा चुकी है। इस प्रकार कृत युग के आदि और अन्त में प्रत्येक और चार सौ वर्ष त्रेता युग के आगे और पीछे प्रत्येक ओर तीन सौ वर्ष का, द्वापर के पहले और बाद में प्रत्येक ओर दो सौ वर्ष का तथा सन्धिकाल होता है, सब मिलाकर चारों युगों का आदि अन्त सहित सन्धि काल दो हजार वर्ष का आदि अन्त सहित सन्धि काल दो हजार वर्ष का होता है। ये दो हजार वर्ष और पहले बताये हुए सांख्य मतानुसार चारों युगों के दस हजार वर्ष मिलाकर कुल बारह हजार वर्ष युगों के दस हजार वर्ष मिलाकर कुल बारह हजार वर्ष होते है।

इन गणनाओं के अनुसार हिसाब फैलाने से पता चलता है कि वर्तमान समय संक्रमण काल है। प्राचीन ग्रन्थों में हमारे इतिहास को पाँच कल्पों में बाँटा गया है। (१) हमत् कल्प १ लाख ९ हजार ८ सौ वर्ष विक्रमीय पूर्व से आरम्भ होकर ८५८०० वर्ष पूर्व तक, (२) हिरण्य गभर् कल्प ८५८०० विक्रमीय पूर्व से ६१८०० वर्ष पूर्व तक, ब्राह्म कल्प ६०८०० विक्रमीय पूर्व से ३७८०० वर्ष पूर्व तक, (३) ब्राह्म कल्प ६०८०० विक्रमीय पूर्व से ३७८०० वर्ष पूर्व तक, (४) पाद्म कल्प ३७८०० विक्रम पूर्व से १३८०० वर्ष पूर्व तक और (५) बाराह कल्प १३८०० विक्रम पूवर् से आरम्भ होकर इस समय तक चल रहा है।

अब तक बारह कल्प के स्वायम्भु मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तमास मनु, रेवत-मनु चाक्षुष मनु तथा वैवस्वत मनु के मन्वन्तर बीत चुके हैं और अब वैवस्वत तथा सावर्णैमनु की अन्तर्दशा चल रही है। कल्कि पुराण में बारह कल्प के सावण मनु के दक्ष, ब्रह्म, रुद्रदेव और इन्द्र सावणयों के मन्वन्तर बीत जाने पर, अवतार होने और धरती में कलियुग की संध्या समाप्त होकर सतयुग प्रारम्भ होने का वर्णन आता है। सावणमनु का आविर्भाव विक्रमी सम्वत प्रारम्भ होने से ५७३० वर्ष पूर्व हुआ था। इन्द्र सावणयों के मन्वन्तर बाद ही कल्कि प्रकट होने और कल्कि सम्वत् प्रचलित होने की बात लिखी है जो कल्कि के जन्म से प्रारम्भ है और उसका काल वि० सं० ४९७० आस-पास पाया जाता है।

कलियुग सम्वत् की जानकारी के लिए राजा पुलकेशिन (द्वितीय) चालुक्य ने विद्वान् ज्योतिषियों से गणना कराई थी। दक्षिण भारत के इहोल नामक स्थान में प्राप्त शिलालेख में भी उसका उल्लेख १९६९-७० में पाया जाता है। इससे यही सिद्ध होता है कि भारत के बौद्ध प्रभाव को निरस्त करने वाले कल्कि का प्राकट्य सम्वत् १९६९-७० के आस-पास हो चुका है। इस सम्बन्ध में पुरातन इतिहास शोध-अधिष्ठान' मथुरा की ऐतिसासिक गवेषणायें बड़ी महत्त्वपूर्ण है। उसके शोधकर्ता ने भी उक्त तथ्य को माना है और अपनी विज्ञप्ति में ज्योतिष गणना का उल्लेख करते हुए स्वीकार किया है, इस समय ब्राह्म-रात्रि का तमोमय सन्धिकाल है। भागवत के दूसरे अध्याय में भी कलियुग की समाप्ति का स्पष्ट उल्लेख है-

यदा देवषर्यः सप्तमघासु विचरन्ति हि। तदा प्रवृत्तस्तु कलिद्वार्दशाब्द शतात्मकः॥३१॥ यदा मघाभ्यो यास्यन्ति पूवार्षाढ़ा महषर्यः। तदा नन्दात् प्रभृत्येष कलिवृर्द्धिगमिष्यति॥३२॥ यस्मिन् कृष्णो दिवं यातस्तस्मिन्न्व तदाहनि। प्रतिपन्नं कलियुगमित प्राहुः पुराविदः॥३३॥

अर्थात जब सप्तऋषि (तारगण) मघा नक्षत्र पर आये थे तब कलियुग का आरम्भ हुआ और जब सप्तऋषि पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में आ चुकेंगे तो बारह सौ वर्षो में कलियुग राजा नन्द के समय में वृद्धि को प्राप्त हो जायगा जब भगवान कृष्णा अपने धाम को पधारे, उसी समय से कलयुग चल पड़ा।

सप्तऋषि तारागण वर्तमान समय ये कृतिका नक्षत्र पर है। पर नक्षत्र पर इनके १०० वर्ष रहने का आरम्भ हुआ। अब तक यह थे तो कलियुग का आरम्भ हुआ। अब तक यह एक बार सत्ताइसों नक्षत्रों पर घूम चुके है। इस प्रकार मघा से रेवती तक १८ एक बार का पूरा चक्र २७ और कृतिका तक ३ अर्थात कुल ४८ चक्षत्र घूम चुके। इस प्रकार कलियुग सम्वत् २००० में श्रवण कृष्णा अमावस्या को पूरा हो जाता है। कलियुग समाप्त होने का ठीक-ठीक समय निम्न श्लोक से प्रकट हो जाता है-

यदा यद्रश्च सूयर्श्च तथा तिष्य बृहस्पति। एक राशौ समेष्यन्ति तदा भवति तत् कृतम्॥

अर्थात जिस समय चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति एक ही समय पुष्य नक्षत्र में प्रवेश करते है, एक राशि में आते हैं तो कलियुग समाप्त होकर सतयुग आरम्भ होता है, यह योग संवत दो हजार की श्रावण कृष्णा अमावस्या तदनुसार १ अगस्त सन् ४३ में आ चुका है।


काल गणना करते समय व्यतिरेक वस्तुतः प्रस्तुतीकरण की गलती के कारण है। ग्रंथों में जो युग गणना बतायी गई है, उसमें सूर्य परिभ्रमण काल को चार बड़े खण्डों में विभक्त कर चार देव युगों का कल्पना की गई है। एक देव युग को 4,32,000 वर्ष का माना गया है। इस आधार पर धमर्ग्रन्थों में वर्णैत कलिकाल की समाप्ति की संगति प्रस्तुत समय से ठीक-ठीक बैठ जाती है।

यह संभव है कि विरोधाभास की स्थिति में लोग इस काल गणना पर सहज ही विश्वास न कर सकें, अस्तु यहाँ 'युग' का तात्पर्य विशिष्टता युक्त समय से माना गया है। युग निर्माण योजना आन्दोलन अपने अन्दर यही भाव छिपाये हुए है। समय बदलने जा रहा है, इसमें इसकी स्पष्ट झाँकी है। प्रत्येक संधि का अपना विशेष महत्व होता है। सूर्योदय और सूर्यास्त का समय संधिकाल कहलाता है। यह दोनों समय 'पर्व काल' कहलाता हैं। साधना पर विश्वास करने वाले इन दोनों समयों में उपासना साधना का विशेष महत्व मानते हैं। मंदिरों से आरती और मस्जिदों से अजान की ध्वनि इन्हीं संधि वेलाओं में सुनाई देती है।

सर्दी और गर्मी, इन दो प्रधान ऋतुओं के मिलन काल पर आश्विन और चैत्र की नव रात्रियाँ होती है। इन दोनों बेलाओं को पुण्य पर्व माना जाता है। इस अवधि में साधक गण विशेष साधनायें करते हैं। रात्रि का अंत और दिन का उदय 'प्रभात पर्व' है। उस वेला में सभी में उत्साह उमड़ता है। फूल खिलते हैं, पक्षी चहचहाते हैं और सभी प्राणी अपने-अपने कार्यों में विशेष उत्साह के साथ लग पड़ते हैं। नयी सहस्राब्दी के बारे में भी ऐसा ही मानना चाहिए। इक्कसीवीं सदी भी ऐसे ही शुभ संदेश साथ लेकर आ रही है। उसके सम्बंध में उज्जवल भविष्य की ही कल्पना और मान्यता बनानी चाहिए।

कलियुग की समाप्ति और सतयुग की शुरुआत के सम्बंध में आम धारणा है कि सन् 1989 में 2001 तक के बारह वर्षों का समय संधिकाल के रूप में होना चाहिए। इसमें मानवी पुरुषार्थ्युक्त विकास और प्रकृति प्रेरणा से सम्पन्न होने वाली विनाश की, दोनों प्रक्रियाएँ अपने-अपने ढंग से हर क्षेत्र में सम्पन्न होनी चाहिए। बारह वर्ष का समय व्यावहारिक युग भी कहलाता है। युग संधिकाल को यदि इतना मानकर चला जाय, तो इसमें कोई अत्ययुक्ति जैसी बात नहीं होगी।

हर बारह वर्ष के अन्तराल में एक नया परिवर्तन आता है, चाहे वह मनुष्य हो, वृक्ष, वनस्पति अथवा विश्व ब्रह्माण्ड सभी में यह परिवर्तन परिलक्षित होता है। मनुष्य शरीर की प्रायः सभी कोशिकाएँ हर बारह वर्ष में स्वयं को बदल देती है, अतः स्थूल दृष्टि को इसकी प्रतीत नहीं हो पाती किन्तु है यह विज्ञान-सम्मत। काल गणना में बारह के अंक का विशेष महत्व है। समस्त आकाश सहित सौरमण्ड को बारह राशियों बारह खण्डों में विभक्त किया गया है। पंचांग और ज्योतिष का ग्रह गणित इसी पर आधारित है। इसी का अध्ययन कर ज्योतिर्विद यह पता लगाते हैं, कि आगामी समय के स्वभाव और क्रिया-कलाप कैसे होने वाले है? पाण्डवों के बारह वर्ष के बनवास की बात सर्वविदित है। तपश्चया और प्रायश्चित परिमार्जन के बहुमूल्य प्रयोग भी बारह वर्ष की अवधि की महत्ता और विशिष्टता को ही दर्शाते हैं। इस आधार पर यदि वर्तमान बारह वर्षो को उथल-पुथल भरा संधिकाल माना गया है, तो इसमें विसंगति जैसी बात नहीं है। कुछ रुढ़िवादी पण्डितों का कथन है कि युग 4 लाख 32 हजार वर्ष का होता है। इस हिसाब से तो नया युग आने में 3 लाख 24 हजार वर्ष की देरी है। वर्तमान समय में एसा बिलकुल भी उपयुक्त नहीं लगता |वास्तव में शास्त्रीय प्रतिपादन हर जगह विशिष्ट अर्थ रखते हैं, उन्हें उल्टा-पुल्टा जोड़ा गया, उसी के कारण अंध मान्यतायें फैली। प्रतिपादन गलत नहीं, पर प्रस्तुतीकरण भ्रामक है, उसे समझा जाना चाहिए और उसका निराकरण किया जाना चाहिए। ग्रह-नक्षत्रों की भिन्न-भिन्न गति तथा उसके पृथ्वी पर पड़ने वाले भिन्न-भिन्न परिणामों को देखकर युग शब्द की समय अवधि भिन्न-भिन्न है। वाजस संहिता में मनुष्ययुग-देवयुग अलग-अलग स्पष्ट बताये गये हैं।

'श्रुतकणर्ॐसं प्रथस्तमत्वागिरा देव्यमानुषा' 11। 111 तैतिरीय संहिता में युग की कल्पना- 'या जाता ओषधयो देवेन्यस्त्रियुगं पुरा।' ऋग्वेद ज्योति पाठ में प्रजापति ब्रह्मा का युग 5 सम्वत्सर का बताया हैः-

पंचम संवत्सरमय युगाध्यक्षं प्रजापतिम्। युगस्रू द्वदशाब्दानि तत्र तानि बृहस्पतेः॥ तिष्यादिच युग प्राहुवर्वसिष्ठात्रि पाराशराः। बृहस्पतिस्तु सौम्यान्त सदा द्वादश वाशिर्कम्॥ अर्थात- बृहस्पति 12 राशि भोग लेते हैं तब एक युग आता है। एक राशि एक वर्ष की होती है अतएव 12 राशियों का युग 12 वर्ष का हुआ। इसी प्रकार सूर्य की, चन्द्रमा की गणनाओं के हिसाब से युग की अवधि में काफी अन्तर है। वैज्ञानिकों ने खोज की हे कि 11 वर्ष में सूर्य की अन्तर्दशा बदलती है, इस 12 वर्ष की ही उसका एक युग कहा जा सकता है। जहाँ 4 लाख 32 हजार वर्ष के एक-एक युग की कल्पना की गई है, वहाँ उसकी संगति आष्रग्रंथों की युग-गणना से किसी भी प्रकार नहीं बैठती। मनुस्मृति में इस सम्बंध में स्पष्ट कहा गया है-

ब्राह्मस्यतु क्षपाहस्य यत्प्रमाणं समारुतः। एकैकशे युगानान्तु क्रमशस्त्रार्न्नबार्धत। चत्वायार्हु सहस्राणि वषार्णांतु कृतं युग। तस्यतावत् शती संध्या संध्याशश्च तथाविधः। इतेयेरेषु स संध्येषु स संध्याशेषु च त्रिपु। एकोयायेन वतर्न्ते सहस्राणि शतानि च। (मनु.1। 67-69)

अर्थात ब्रह्माजी के अहोरात्र में सृष्टि के पैदा होने और नाश हाने में जो युग माने गए हैं, वे इस प्रकार हैं- चार हजार वर्ष और उतने ही शत अर्थात चार सौ वर्ष की पूर्व संध्या और चार सौ वर्ष की उत्तर संध्या इस प्रकार कुल 4800 व का सतयुग, इसी प्रकार तीन हजार छह सौ वर्ष का त्रेता, दो हजार चार सौ वर्ष का द्वापर और बारह सौ वर्ष का कलियुग। ज्योतिषी मेधातिथि ने सोचा होगा कि कलियुग तो मुझ तक ही कई हजार वर्षो का व्यतीत हो चुका है, फिर यह 1200 वर्षो का नहीं हो सकता। तब उन्होंने श्रीमद्भगवत के स्कन्ध 12, अध्याय 2 के इस 34वें श्लोक को देखा होगा।

दिव्याब्दानां सहस्रान्ते चतुथेर्तु पुनः कृतम्। भविष्यति यदा नृणां मन आत्म प्रकाशकम्॥ ‍

इसका शब्दार्थ यह है कि- 'चार हजार दिव्य वषों के अन्त में अर्थात चार हजार दिव्य वर्षो में (कलियुग बीता)' फिर सतयुग आयेगा जो मनुष्यों के मन और आत्मा में प्रकाश करेगा। इस श्लोक में दिव्य शब्द आया है। मेधातिथि ने इसका अर्थ देवता कर डाला और अभी तक प्रायः सभी पण्डित लोग ऐसा ही अर्थ करते रहे हैं। चूँकि एक मानुषी वर्ष के बराबर देवताओं का एक दिन होता है, यह विचार करके मेधातिथि ने भ्रम से 1200 वर्षो का कलियुग समझा और उन्हें देव वर्ष मानकर उनके 360 से गुणा करके 432000 बना दिया और कलियुग की इतनी अवधि लिख दी जो सर्वथा मिथ्या है। 'दिव्य' शब्द का अर्थ देवता नहीं हो सकता। इसका प्रमाण ऋग्वेद 2। 164। 46 में दृष्टव्य है।

'इन्दं मित्रं वरुणमग्नि माहुःरथो दिव्यः ससुपणोर् गरुत्मान्।' अर्थात अग्नि रूपी सूर्य को इन्द्र मित्र वरुण कहते हैं। वही दिव्य सुपर्, गुरुत्मान है। यह मित्रं निरुक्त दैवत काण्ड 7। 18 में भी आता है। वहाँ दिव्य शक्ति की व्युत्पत्ति यह की गई है-'दिव्यो दिविजो' अर्थात जो दिवि में प्रकट होता है, उसे दिव्य कहते हैं। दिवि 'द्य' को कहते हैं। नैघण्टुक काण्ड में दिन के 12 नाम लिखे हैं, उनमें द्यु शब्द भी दिन का वाचक है, अब दिव्य का अर्थ हुआ कि 'जो दिन में प्रकट होता है।' और यह प्रत्यक्ष है कि दिन में सूर्य ही प्रकट होता है। अतः दिव्य सूर्य का नाम है।1.

ऋग्वेद 1। 16। 3। 10 के मन्त्र-ईमार्न्तांसः सिलिक......... दिव्य मज्मश्वाः।' का अश्वो अग्निदेवता अर्थात आग का घोड़ा (सूर्य) है। इसमें भी सूर्य का ही वर्णन है। इस मंत्र पर निरुक्त ने दिव्य शब्द की व्युत्पत्ति दिव्या दिवि की है। बात वही है। जो दिन में प्रकट होता है, वह दिव्य सूर्य है और यह भी स्पष्ट लिखा है कि -

अस्त्यादित्यस्तुति अर्थात इस नाम से सूर्य की स्तुति है। वेद में दिव्य नाम सूर्य का है, देवता को दिव्य कदापि नहीं कहते। यह दो बड़े प्रमाण वेद के है। व्याकरण से भी दिव्य शब्द का अर्थ देवता नहीं बनता। दिव् धातु में 'स्वार्थेयत' प्रत्यय लगाने से दिव्य शब्द बनता है। इसकी व्युत्पत्ति यह हुई - 'दिव भवं दिव्यन्' अर्थात जो दिवि में प्रकट होता है। अतः दिव्य केवल सूर्य ही को कहते हैं। दिवि द्यु को कहते हैं और द्यु दिन का नाम है। देवता शब्द दूसरे 'देवातल' आदि सूत्रों से बनता है इस कारण भी दिव्य और देवता शब्दों का आपस में कोई संबंध नहीं है। दिव्य शब्द और देवता शब्द बनाने के रूप ही अलग-अलग है।

कुल्लूक भट्ट ने तो अपनी मनुस्मृति से 1। 71 की टीका करते हुए पूरा खण्डन किया है। 'एतस्य श्लोकस्यादो यदे तन्मानुषम् चतुयुर्गं परिगणितम् एतद्देवानं युग मुच्यते।' अर्थात-चारों युग मनुष्यों के हैं, इनके बराबर देवताओं का एक युग होता है। इसलिए सतयुग 4800 वर्षो का और कलियुग 1200 वर्षो का ही हुआ। मेधातिथि ने चारों युगों को देवताओं के युग और उनके वर्षो को देव वर्ष लिखा है, जिसका खण्डन कुल्लूक भट्ट 500 वर्ष पहले ही कर चुके हैं।

वास्तव में सूर्य की उत्तर दक्षिण गति को ही दिव्य वर्ष कहते हैं, जिसकी गति 360 संख्या की है, अर्थात उत्तरायण के 6 मास और दक्षिणायन के 6 मास के 360 दिन-रात मनुष्यों के हुए। इसी को दिव्य वर्ष कहते हैं। अतः दिव्य देवताओं का वर्ष नहीं है। इसलिए जो आगे 360 से 1200 को गुणा कर आये हैं वह गुणा न किया, तो कलियुग की ठीक आयु 1200 वर्षो की ही हुई। हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व में भी युगों का हिसाब इसी प्रकार बताया गया है यथा-

अहोरात्रं विभज्यनो मानव लौकिकं परम्। सामुपादाय गणना श्रृणं संख्य, मन्दिरम्। चत्वायैर्व सहस्राणि सषार्णानुकृत युगं। तावच्छसी भवेत्संध्या संध्याशश्च तथानृप॥ त्रीणि वषर् सहस्राणि त्रेतास्या स्परिमाणतः। तस्रूाश्च त्रिशती संध्या संध्याशश्च तथा विधः॥

तथा वषर् सहस्र द्वै द्वापरं परिकीतिर्तः। तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशश्चैवताद्वियः॥ कलिवषर् सहस्रं व संख्यातोऽत्र मनिषिभिः। तस्यापि शतिक संध्या संध्यांशश्च तथाविधिः॥

अर्थात -हे अरिदंम! मनुष्य लोक के दिन रात का जो विभाग बतलाया गया है। उसके अनुसार युगों की गणना सुनिए, चार हजार वर्षो का एक कृतयुग होता है और उसकी संध्याचार सौ वर्ष की तथा उतना ही संध्यांश होता है। त्रेता का परिणाम तीन हजार वर्ष का है और उसकी संध्या तथा संध्यांश भी तीन-तीन सौ वर्ष का होता है। द्वापर को दो हजार वर्ष का कहा गया है। उसकी संध्या तथा संध्यांश दो-दो सौ वर्ष के होते हैं। कलियुग को विद्वानों ने एक हजार वर्ष का बतलाया है और उसकी संध्या तथा संध्यांश भी सौ वर्ष के होते हैं। लिंग पुराण तथा श्रीमद् भागवत में भी इसी प्रकार की युग गणना मिलती है। भागवत के तृतीय स्कन्ध मं कहा गया है-

चत्वारि त्रीणि दू चैके कृतादिषु यथाक्रमन्॥ संख्यातानि सहस्राणि द्वि गुणानि शतानि च॥

अर्थात-चार, तीन, दो और एक ऐक कृतादि युगों में यथाक्रम द्विगुण सैकड़ों की संख्या बड़ती है। आशय यही है कि कृतयुग को चार हजार वर्ष में आठ सौ वर्ष और जोड़कर ४८०० वर्ष माने गये। इसी प्रकार शेष तीनों युगों की कालावधि समझी जाय। कुछ स्थानों पर मनुष्य के व्यवहार के लिए बारह वर्ष का एक युग भी माना गया है।

जिसको एक हजार से गुणा कर देने पर देवयुग होता है, जिसमें चारों महयुगों का समावेश हो जाता हैं। इस बारह वर्ष के देवयुग को फिर एक हजार से गुणा करने पर १ करोड़ २० लाख वर्ष का ब्रह्मा का एक दिन हो जाता है, जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति और लय हो जाय है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में इसी युग की बात कही है-

सहस्र युगपयर्न्त मध्यर्द् ब्रह्मणो विदुः। रत्रि युग सहस्रान्तां तेऽहोरात्र विदोजना॥

अहोरात्र को तत्वतः जानने वाले पुरुष समझते हैं कि हजार महायुगों का समय ब्रह्मदेव का एक दिन होता है और ऐसे ही एक हजार युगों की उसकी रात्रि होती है। और ऐसे ही एक हजार युगों की उसकी रात्रि होती है। लोकमान्य तिलक ने इसका अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है कि महाभारत, मनुस्मृति और यास्कनिरुक्त में इस युग गणना का स्पष्ट विवेचन आता है। लोकमान्य तिलक के अनुसार हमारा उत्तरायण देवताओं का दिन है और हमारा दक्षिणायन उनकी रात है। क्योंकि स्मृति ग्रन्थों और ज्योतिष शास्त्र की संहिताओं में भी उल्लेख मिलता है कि देवता मेरु पर्वत पर अर्थात उत्तर ध्रुव में रहते हैं।

अर्थात दो अयनों छःछ मास का हमारा एक वर्ष देवताओं के एक दिन-रात के बराबर और हमारे ३६० वर्ष देवताओं के ३६० दिन-रात अथवा एक वर्ष के बराबर होते है। कृत, त्रेता, द्वापर और कलि ये चार युग माने गये हैं। युगों की काल गणना इस प्रकार है कि कृत युग में चार हजार वर्ष, त्रेता युग में तीन हजार, द्वापर में दो हजार और कलियुग में एक हजार वर्ष। परन्तु एक युग समाप्त होते ही दूसरा युग एकदम आरम्भ नहीं हो जाता, बीच में दो युगों के संधि काल में कुछ वर्ष बीत जाते हैं।