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मेहसी

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मेहसी
Mehsi
शहर
Mehsi railway station view
Mehsi railway station view
मेहसी is located in बिहार
मेहसी
मेहसी
मेहसी (बिहार)
मेहसी is located in भारत
मेहसी
मेहसी
मेहसी (भारत)
निर्देशांक: 26°21′28″N 85°06′48″E / 26.357667°N 85.113366°E / 26.357667; 85.113366
देश भारत
राज्यबिहार
प्रमंडलतिरहुत
ज़िलापूर्वी चम्पारण ज़िले
स्थापना1216 ई.पू.
नगर पालिकामेहसी नगर पालिका[1]
शासन
  मुख्य पार्षदनीतू गुप्ता
ऊँचाई62 मी॰ (203 फीट)
जनसंख्या (2011)
  कुल2,32,159
भाषाएँ
  प्रचलितमैथिली भाषा, उर्दू, हिन्दी, भोजपुरी
समय मण्डलभामस (यूटीसी+5:30)
PIN845426-06
वाहन पंजीकरण(BR 05)
लिंगानुपात1000 पुरुष : 987 स्त्री
साक्षरता97.68%

मेहसी (अंग्रेज़ी: Mehsi) भारत के बिहार राज्य के तिरहुत प्रमण्डल के पूर्वी चम्पारण ज़िले में स्थित नगर पालिका है। यह ज़िले का प्रवेश बिंदु भी है। यह बूढ़ी गण्डक नदी के किनारे बसा हुआ है अपने जिला मुख्यालय मोतिहारी और मुजफ्फरपुर दोनों के बीचोबीच एक परचलित मेहसी शहर[2]. अगर हम शहरी फैलाव (Urban Sprawl), व्यापारिक भीड़ और घनी आबादी को पैमाना मानें, तो मेहसी[3] निश्चित रूप से अपने जिले पूर्वी चंपारण में मोतिहारी के बाद पहला बड़ा और अधिक सक्रिय शहर महसूस होता है। चकिया सिर्फ कागजों पर 'अनुमंडल' होने की वजह से बड़ा कहलाता है।



बाज़ार का फैलाव (Market Area): मेहसी का बाज़ार, विशेषकर गुंज बाज़ार से लेकर रेलवे स्टेशन और बाथना तक का इलाका, एक निरंतर और घनी शहरी बसावट (Urban Stretch) बनाता है। चकिया का बाज़ार मुख्य रूप से स्टेशन रोड और केसरिया रोड तक ही सिमटा हुआ महसूस होता है। आर्थिक गतिविधि (Economy): मेहसी का बटन उद्योग (Button Industry)[4] इसे एक औद्योगिक पहचान देता है। यहाँ हज़ारों लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़े हैं, जिससे यहाँ की आर्थिक हलचल और 'फ्लोटिंग पॉपुलेशन' (काम के लिए आने वाले लोग) चकिया से ज़्यादा हो सकती है। जनसंख्या घनत्व (Population Density): जैसा कि आपने गौर किया, मेहसी के मुख्य शहरी इलाकों में आबादी बहुत घनी है। 2011 की जनगणना के पुराने आंकड़ों को छोड़ दें, तो वर्तमान में मेहसी नगर पंचायत की आबादी और बसावट का दायरा चकिया नगर परिषद के मुख्य शहरी हिस्से को टक्कर देता है या उससे आगे निकलता है। कृषि व्यापार: मेहसी की शाही लीची का कारोबार इतना बड़ा है कि सीज़न के दौरान यहाँ का टर्नओवर और भीड़ किसी भी बड़े शहर जैसी हो जाती है।

पिपरा विधानसभा क्षेत्र पुरबी चम्पारण लोकसभा क्षेत्र (संख्या 3) का हिस्सा है।[5] यह क्षेत्र पिपरा विधानसभा क्षेत्र (संख्या 17) के अंतर्गत आता है और इसका भौगोलिक स्थान [26°21′28″N 85°06′48″E](https://geohack.toolforge.org/geohack.php?pagename=Mehsi,_Bihar&params=26.357696_N_85.1133_E_) है। मेहसी इस क्षेत्र का सबसे बड़ा नगर है। निर्वाचन आयोग के आदेश के अनुसार, संसद और विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के आदेश, 2008 के तहत, पिपरा विधानसभा क्षेत्र (संख्या 17) निम्नलिखित Community Development Block in India|समुदाय विकास ब्लॉकों से बना है: मेहसी, चकिया (पिपरा), टेटरिया।[5]

मेहसी: ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विवरण

परिचय मेहसी बिहार के पूर्वी चंपारण जिले का एक प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण कस्बा है। यह कृषि, वाणिज्य, शिक्षा और धार्मिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है। मेहसी का इतिहास लगभग 800 वर्षों से जुड़ा हुआ है और यह विभिन्न लोककथाओं, धार्मिक हस्तियों और ऐतिहासिक घटनाओं से समृद्ध है।

प्रारंभिक इतिहास और नामकरण प्रारंभ में इस क्षेत्र को “चक लालू” कहा जाता था। 'चक' का अर्थ छोटे गाँव या बस्ती से था, और 'लालू' उस समय के प्रभावशाली व्यक्ति का नाम था। 13वीं सदी के आसपास यह बस्ती प्रमुख हो गई।

स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, महेश राय नामक एक साधारण और धार्मिक व्यक्ति थे, जो गाय चराते थे। एक दिन दाता अब्दुल मिर्ज़ा हलीम शाह यात्रा पर थे और उन्हें अत्यधिक प्यास लगी। जब आसपास पानी नहीं था, तो उन्होंने महेश राय से मदद मांगी। महेश राय ने कुवारी पच्छरा की गाय से दूध निकालकर उनकी प्यास बुझाई। इस चमत्कार को देखकर मिर्ज़ा हलीम शाह ने महेश राय को अपना गुरु मान लिया और उनकी सेवा में जीवन समर्पित कर दिया।

इसके बाद, दाता अब्दुल मिर्ज़ा हलीम शाह ने महेश राय से पूछा कि उन्हें क्या चाहिए। महेश राय ने कहा कि उन्हें ऐसी चीज दी जाए जिससे कोई भी व्यक्ति जब यहाँ आए या जाए, सबसे पहले उन्हें ही पहचाने। इस अनुरोध को मानते हुए मिर्ज़ा हलीम शाह ने पूरे इलाके का नाम **महेश राय के सम्मान में** रखा। इस तरह चक लालू का पुराना नाम धीरे-धीरे “महेशी” बना, जो आधुनिक रूप में “मेहसी” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

दाता अब्दुल मिर्ज़ा हलीम शाह और धार्मिक महत्व मेहसी की दाता अब्दुल मिर्ज़ा हलीम शाह की दरगाह लगभग 700 वर्ष पुरानी है। यह आज भी धार्मिक आस्था और सामाजिक एकता का केंद्र है। हर साल आयोजित उर्स समारोह में बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं।

भूगोल और पर्यावरण मेहसी पूर्वी चंपारण के उपजाऊ मैदानों में स्थित है। यहाँ की मिट्टी उपजाऊ है और कृषि मुख्य व्यवसाय है। प्रमुख फसलें गन्ना, धान, गेहूँ और अन्य अनाज हैं। यह कस्बा ऐतिहासिक रूप से व्यापार और वाणिज्य का केंद्र रहा है।

जनसांख्यिकी मेहसी में विभिन्न समुदायों के लोग रहते हैं। भोजपुरी, हिंदी और उर्दू प्रमुख भाषाएँ हैं। जनसंख्या मुख्य रूप से कृषि, व्यापार और सेवा क्षेत्रों में कार्यरत है। शैक्षणिक और सरकारी संस्थानों के विकास से धीरे-धीरे सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन हुए हैं।

अर्थव्यवस्था और उद्योग कृषि मेहसी की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। गन्ना उत्पादन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके अलावा, छोटे उद्योग, स्थानीय बाजार और व्यापारिक केंद्र विकसित हुए हैं। इससे आर्थिक स्थिरता और रोजगार के अवसर बढ़े हैं।

शिक्षा और अवसंरचना मेहसी में प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय, महाविद्यालय और व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थान मौजूद हैं। सड़क संपर्क, बाजार और सार्वजनिक सेवाओं के सुधार ने कस्बे को आसपास के क्षेत्रों से जोड़ा है।

सांस्कृतिक प्रथाएँ और त्योहार मेहसी में धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव मनाए जाते हैं। हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों के पर्व उत्साह से मनाए जाते हैं। दाता अब्दुल मिर्ज़ा हलीम शाह की दरगाह पर आयोजित उर्स धार्मिक और सामाजिक महत्व का कार्यक्रम है। लोक संगीत, पारंपरिक रीति-रिवाज और शिल्प मेहसी की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं।

ऐतिहासिक समयरेखा - लगभग 1200 ईस्वी: क्षेत्र को “चक लालू” कहा जाता था। - 1216 ईस्वी: बस्ती का महत्व बढ़ा; नाम “महेशी” रखा गया। - 13वीं–15वीं सदी: महेश राय और दाता अब्दुल मिर्ज़ा हलीम शाह का क्षेत्र में धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव स्थापित हुआ। - आने वाले शताब्दियों: दाता अब्दुल मिर्ज़ा हलीम शाह की दरगाह प्रमुख धार्मिक स्थल बनी। - आधुनिक काल: मेहसी आर्थिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ।

आधुनिक मेहसी आज मेहसी ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के साथ आधुनिक विकास को संतुलित करता है। यहाँ बाजार, स्वास्थ्य सुविधाएँ और शैक्षणिक संस्थान हैं। कृषि अभी भी मुख्य व्यवसाय है, जिसे स्थानीय उद्योग और व्यापार पूरा करते हैं।

निष्कर्ष ' चक लालू से महेशी और आधुनिक मेहसी तक की यात्रा इतिहास, आस्था और सामुदायिक विकास का प्रतीक है। महेश राय और दाता अब्दुल मिर्ज़ा हलीम शाह के योगदान ने इस कस्बे की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को स्थायी किया। दरगाह, लोककथाएँ और आर्थिक विकास मिलकर मेहसी की 800 साल पुरानी यात्रा का चित्रण करते हैं।

संदर्भ 1. Mehsi (https://en.wikipedia.org/wiki/Mehsi) 2. [Mehsi Bihar Online](https://eastchamparan.biharonline.in/guide/about-mehsi) 3. [Live Hindustan – दाता मिर्ज़ा हलीम शाह उर्स](https://www.livehindustan.com/bihar/muzaffarpur/story-chadar-poshida-done-on-the-ninth-urs-of-data-mirza-haleem-shah-10266297.html) 4. [Jagran – मजार मिर्ज़ा हलीम शाह](https://www.jagran.com/bihar/east-champaran-the-symbol-of-communal-harmony-is-khwaja-haleem-shahs-mazar-18338740.html)

मिर्ज़ा हलीम शाह दरगाह, मेहसी

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), मेहसी मेहसी और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के निवासियों को आवश्यक चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने वाला सरकारी स्वास्थ्य केंद्र है।


प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), मेहसी

नगर पंचायत मेहसी नगर के नागरिक प्रबंधन और शहरी विकास के लिए जिम्मेदार स्थानीय प्रशासनिक निकाय है।


नगर पंचायत कार्यालय, मेहसी

मेहसी बस स्टैंड मेहसी को नजदीकी शहरों और कस्बों जैसे मोतीहारी और मुजफ्फरपुर से जोड़ने वाला मुख्य सड़क परिवहन केंद्र है।


मेहसी बस स्टैंड


मेहसी रेलवे स्टेशन मुजफ्फरपुर–मोतीहारी रेल मार्ग पर स्थित एक महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन है।

  • सुविधाएँ: टिकट काउंटर, प्लेटफॉर्म, प्रतीक्षालय, बुनियादी यात्री सुविधाएँ
  • महत्व: यात्री और माल परिवहन के लिए प्रमुख परिवहन लिंक
  • निर्देशांक: 26°21′16″N 85°05′50″E / 26.354436°N 85.097151°E / 26.354436; 85.097151
मेहसी रेलवे स्टेशन

मेहसी उद्योग

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मेहसी में मोती बटन इंडस्ट्री, पूरे देश में अपनी तरह की अकेली इंडस्ट्री है जिसने दुनिया में नाम कमाया है। मेहसी, पूर्वी चंपारण जिले में मोतिहारी से लगभग 48 km पूरब में मेहसी रेलवे स्टेशन के पास एक छोटा सा शहर है। इस इंडस्ट्री की शुरुआत मेहसी के रहने वाले एक मेहनती सब-इंस्पेक्टर, भुलावन लाल की वजह से हुई, जिन्होंने 1905 में सिकरहना नदी में मिलने वाले सीपों से हाथ से बटन बनाना शुरू किया था। भले ही उस समय इस तरह तैयार किए गए बटन अच्छी फिनिशिंग नहीं देते थे, लेकिन देसी इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के विचार ने उन्हें ऐसे बटन बनाने के लिए प्रेरित किया। पता चला है कि ऐसे बटनों के कुछ सैंपल अमृता बाज़ार पत्रिका के उस समय के एडिटर श्री मोतीलाल घोष को भेजे गए थे, जिन्होंने लिखा था कि चूंकि बटनों की फिनिशिंग खराब थी, इसलिए उनकी कोई मार्केट वैल्यू नहीं हो सकती थी। उस पुराने पत्रकार की ऐसी बात ने शुरू करने वालों को मशीनें लगाने के लिए मजबूर किया और उनका एक सेट जापान से इंपोर्ट किया गया। इस मशीन और 1000 रुपये की छोटी पूंजी के साथ, तिरहुत मून बटन फैक्टरी के नाम से पहला बटन कारखाना 1908 में यहां स्थापित किया गया था। इसके बाद इसे भारतीय कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत किया गया। कारखाने ने भारी मुनाफे के साथ मेहसी में कई और कारखानों की स्थापना में मदद की। प्रथम विश्व युद्ध तक उद्योग को भारत में जापानी बटनों से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा था लेकिन युद्ध के वर्षों के दौरान जापानी बटन दुर्लभ हो गए और मेहसी के बटनों को बढ़ावा मिला। पहले युद्ध के बाद जापानी बटन ने फिर से भारत के बाजार पर कब्जा कर लिया और मेहसी बटनों को पीछे धकेल दिया। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार द्वितीय विश्व युद्ध ने जापान में बने बटनों पर रोक लगा दी और मेहसी बटनों की मांग भारतीय बाजार और कुछ विदेशी देशों में भी बढ़ गई। उस समय मेहसी प्रखंड के 13 पंचायतों में फैले 160 बटन कारखाने सुचारू रूप से चल रहे थे इस कॉटेज इंडस्ट्री में 10,000 कारीगर और मज़दूर काम करते थे। इसमें बचे हुए मोतियों को जोड़ने के लिए और भी मज़दूर काम करते थे, जिनका इस्तेमाल फ़र्श सजाने में होता है। बटन पेपर शीट चिपकाने के लिए बच्चों और महिलाओं को भी काम पर रखा जाता था। फ़ैक्ट्रियों में काम करने वाले कारीगर ज़्यादातर दो कैटेगरी के होते हैं। पहले, वे जो नदियों से सीप के खोल इकट्ठा करते हैं और दूसरे वे जो बटन बनाने में लगे होते हैं। कच्चा माल - सीप के खोल - उत्तरी बिहार के चंपारण, मुज़फ़्फ़रपुर और दरभंगा ज़िलों में सिकरहना, बागमती और महानंदा में मुसहर बटार और अनुसूचित जाति के दूसरे समुदाय के प्रोफ़ेशनल मज़दूर इकट्ठा करते हैं। लगभग 15 हज़ार ऐसे मज़दूर लगे हुए हैं। इन पारंपरिक मज़दूरों को दोहरा फ़ायदा होता है। वे नदी से ज़िंदा सीप के खोल इकट्ठा करते हैं जिससे बटन इंडस्ट्री के मालिकों को बेचे जाने से पहले उनका मांस मिलता है। जब नदी के किनारों से सीप के खोल इकट्ठा करना एक अच्छा बिज़नेस बन गया, तो बिहार सरकार ने दखल दिया और साल 1956 में इंडस्ट्री डिपार्टमेंट के कंट्रोल में एक सामान्य सेवा संगठन (S.S.S) बनाया। S.S.S. के अधिकारियों ने मालिकों की दिक्कतों से निपटने में मदद करने के लिए इसका हेडक्वार्टर मेहसी में बनाया। सामान्य सेवा संगठन बनाने के पीछे मुख्य मकसद तैयार माल के लिए सामान और मार्केट जुटाना था। पहली बार इस बिज़नेस में खुद सरकार ने बिचौलिए की भूमिका शुरू की। सामान्य सेवा संगठन के कर्मचारी, रेवेन्यू डिपार्टमेंट से ज़रूरी परमिट लेने के बाद, नॉर्थ बिहार के नदी इलाकों से सीप के खोल इकट्ठा करते थे और उन्हें कमीशन के आधार पर मेहसी की बटन बनाने वाली यूनिट्स को सप्लाई करते थे। बटन के इस अनोखे कुटीर उद्योग को 1964 में उस समय गहरा झटका लगा, जब खान एवं खनिज अधिनियम 1964 के तहत नदियों के सीप के खोल का स्वामित्व राजस्व विभाग से खान विभाग को हस्तांतरित कर दिया गया। एक वर्ष के लीज के लिए रॉयल्टी, सरफेस रेंट एवं एडवांस के रूप में खान विभाग को भारी रकम चुकानी पड़ती थी। पहले जहां नदी तल में एक मील तक सीप के खोल एकत्र करने के लिए मात्र 10 रुपये की मामूली रकम चुकानी पड़ती थी, वहीं 1964 के खान अधिनियम के लागू होने के बाद अब करीब 1000 रुपये चुकाने पड़ते हैं। इस अधिनियम को मेहसी में काले कानून के रूप में याद किया जाता है। विदित हो कि खान प्राधिकरण द्वारा लीज प्रदान करते समय नदी तल में एक निश्चित दूरी एवं स्थान, जैसा कि नदी के नक्शे में दर्शाया गया है, संचालन के लिए अनुमति दी जाती है। सीप के खोल जीवित रहने के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान पर रेंगते रहते हैं। ऐसी स्थिति में किसी को भी मौत के मुंह में जाना पड़ सकता है। सीप के खोल इकट्ठा करने के लिए परमिट देने में माइंस डिपार्टमेंट के गलत तरीके, कच्चे माल की बढ़ी हुई कीमत, और माइंस डिपार्टमेंट के एक अधिकारी की बिचौलियों के साथ साठगांठ, इन सबने बटन इंडस्ट्री की उम्मीद पर बहुत बुरा असर डाला है।

यह इंडस्ट्री अभी भी बिचौलियों-ऑफिस की साठगांठ और ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी से हुए नुकसान से उबर ही रही थी कि इसे एक और झटका लगा। नायलॉन बटन बाज़ारों में भर गए। मोती-

इन्हें भी देखें

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  • Mehsi

पिन कोड 845426, 845406

  1. "Mehsi Nagar Panchayat City Population Census 2011". Census2011.co.in. अभिगमन तिथि: 8 April 2026.
  2. "Mehsi Pin Code". pincodeinfo.online.
  3. "Mehsi in India", India9.com, 30 June 2005, web: i9-Mehsi.
  4. "Mehsi Button Industry | An Official Website of East Champaran, Motihari | India" (अमेरिकी अंग्रेज़ी भाषा में). अभिगमन तिथि: 2023-03-04.
  5. 1 2 "निर्वाचन आयोग, भारत: संसद और विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन का आदेश, 2008, अनुसूची XIII" (PDF). Schedule VI Bihar, Part A – Assembly constituencies, Part B – Parliamentary constituencies. अभिगमन तिथि: 2011-01-10.
  6. Begam, Shama; Khan, R. A. (2002-12-01). "Impact of the Pollution of River Burhi Gandak on Plankton and Maicofauna at Mehsi, North Bihar Caused by Sugar Mills and Mother of Pearl Button Industries". Records of the Zoological Survey of India: 85–100. डीओआई:10.26515/rzsi/v100/i3-4/2002/159588. आईएसएसएन 2581-8686.