मिलारेपा

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मिलारेपा (तिब्बती: རྗེ་བཙུན་མི་ལ་རས་པ, Wylie: rje btsun mi la ras pa) (1052 ई. – 1135 ई.) तिब्बत के सबसे प्रसिद्ध योगियों तथा कवियों में से एक थे।वहां से चला गया, लेकिन वह बच्चा वहीं खड़ा रहा। जब मिलारेपा ने जुताई का काम पूरा कर लिया, तो वह वहीं एक तरफ हैरानी से भरा खड़ा हो गया, क्योंकि उसे पता नहीं था कि अब करना क्या है। वह बच्चा उसके पास आया और बोला, ‘अब तुम अंदर आ सकते हो।’ वह बच्चा उसे मार्पा के घर में ले गया और तब उसे अहसास हुआ कि वह दरअसल, मार्पा का ही बेटा था।

फिर मार्पा ने मिलारेपा से कई तरह की शारीरिक गतिविधियां करवाईं। कुछ देर के बाद मिलारेपा ने झुककर मार्पा से कहा, ‘मैं आपसे धर्म की दीक्षा चाहता हूं। मैं एक ऐसी प्रणाली, ऐसी क्रिया की तलाश में हूं, जो मुझे इसी जन्म में ज्ञानुदय दिलाए और बंधन से छुटकारा दिला दे। मैं अगले जन्म के फेर में नहीं पड़ना चाहता। मैं आपको अपना शरीर, अपना दिमाग और अपनी बोली, सब कुछ अर्पण करता हूं। कपया मुझे खाना, कपड़े और ज्ञान दें।’

जब सभी लोग आयोजन के लिए जमा हो गए, तो मिलारेपा ने अपनी तांत्रिक शक्ति के बल पर घर में ओलावृश्टि करवा दी। जिसकी वजह से उसके चाचा-चाची समेत 80 से 85 लोगों की मृत्यु हो गई। वह पूरी जगह ओलों से भर गई थी। यह वाकई एक खूबसूरत बात मिलारेपा ने कही थी। लोग अक्सर मार्पा के पास जाकर यह कहकर गलती करते थे कि हम आपको अपनी आत्मा देते हैं। आखिर जो आपकी है ही नहीं, उसेे देना तो बहुत ही आसान है। लेकिन जो आपके पास है, उसे देना बहुत ही मुश्किल है। अगर आप अपने गुरु को कुछ समर्पित करना चाहते हैं, तो अपने शरीर, दिमाग और बोली से बढ़कर कुछ और हो ही नहीं सकता है। इसके बाद आप अपनी राह पर होंगे। मिलारेपा की बात सुनने के बाद मार्पा ने उसकी ओर देखा और फिर बोले, ‘तुम अपना शरीर, दिमाग और बोली मुझे दे रहे। इसके बदले मैं तुम्हें खाना और रहने की जगह दे सकता हूं। ज्ञान के लिए तुमको किसी और को देखना होगा। या फिर मैं तुमको ज्ञान दे सकता हूं और रहने व खाने का अपना इंतजाम तुमको कहीं और से करना होगा। इच्छा तुम्हारी है।’ वह वास्तव में सौदेबाजी कर रहा था! यह सुनकर मिलारेपा ने कहा, ‘ठीक है, मुझे आपसे ज्ञान चाहिए। मैं अपने खाने और रहने का बंदोबस्त कर लूंगा।’ इतना कह कर वह बाहर भिक्षा मांगने के लिए चला गया।

मिलारेपा एक जोशीला व्यक्ति था और जो भी करता था, उसमें कुछ ज्यादा ही कर बैठता था। वह बाहर भिक्षा मांगने चला गया और वह काफी दूर निकल गया और कई बोरे गेहूं के जमा कर लाया। दरअसल, वह एक ही बार में साल भर का गेहूं जमा कर लेना चाहता था, ताकि वह मार्पा के साथ बैठकर धर्म और ज्ञान की बातें सीख सके। उसने बहुत सारा गेहूं जमा कर लिया, जिसमें से थोड़ा गेहूं बेचकर उसने खाना बनाने के लिए पारंपरिक चार मूठ वाला तांबे का एक बर्तन खरीदा।

गेहूं के भारी बोझ के साथ वह मार्पा के घर वापस आ गया और धड़ाम की आवाज के साथ उसने गेहूं का बोरा नीचे रखा। जब मार्पा ने यह आवाज सुनी, तब वह दोपहर का खाना खा रहा था। वह खाना खाते हुए बीच में से उठकर बाहर आया और बोला, ‘लगता है कि तुम बेहद गुस्से में हो। इस गेहूं के बोरे और बर्तन की आवाज से तुमने पूरे घर को दहला दिया। लगता है कि अपने चाचा के घर की तरह तुम इस घर को भी बर्बाद कर दोगे। बस बहुत हो गया, अब निकल जाओ यहां से।’

सन्दरु : अतीत में एक समय ऐसा भी था, जब तिब्बत देश पूरी तरह अध्यात्म और मानवीय चेतना को समर्पित था। तिब्बत की जमीन पर रोजमर्रा की जिंदगी में आध्यात्मिक और सांसारिक बातें आपस में गुंथी हुई थीं। तिब्बत की संस्कृति में मिलारेपा का नाम अपनी एक अलग पहचान रखता है। कम उम्र में ही मिलारेपा के सिर से पिता का साया उठ गया था। उसके पिता के पास काफी जमीन-जायदाद और एक घर था। पिता की मुत्यु के बाद मिलारेपा के चाचा ने उसका सब कुछ हड़प लिया और फिर वह उसके, उसकी मां और छोटी बहन के साथ घर के नौकरों जैसा व्यवहार करने लगा। उसने मिलारेपा की पूरी जायदाद हड़प ली, और वह उन लोगों के साथ खराब तरीके से पेश आने लगा। चाचा मिलारेपा के परिवार को कई तरीकों से परेशान करता। मिलारेपा अपने अंदर प्रतिशोध और गुस्से की भावनाओं के साथ बड़ा हुआ और वयस्क होने के साथ ही वह अपना घर छोड़ कर कहीं दूर चला गया। दरअसल, वह अपने चाचा और चाची से उस सारे अपमान और अत्याचार का बदला लेना चाहता था, जो इतने सालों तक उन्होंने उसके और उसके परिवार पर ढाए थे। मिलारेपा ने तांत्रिक शक्ति का दुरूपयोग किया इसके लिए उसने तंत्र विद्या सीखी और कुछ तांत्रिक क्रियाओं में महारत भी हासिल की। कइ्र सालों बाद जब वह तंत्र विद्या में महारत हासिल वापस लौटा तो उसे चता चला कि उसकी मां और छोटी बहन चल बसे थे। यह जानकर उसका गुस्सा और भी बढ़ गया। उसने अपने चाचा से बदला लेने का विचार बनाया, लेकिन वह इसके लिए एक सही मौके का इंतजार करना चाहता था। जल्दी ही उसे अपने चाचा के बेटे की शादी के रूप में यह मौका मिल भी गया। मार्पा वहां आंखें बंद करके बैठा था, इसलिए मिलारेपा को उम्मीद थी कि दूसरे छात्रों के साथ उसको भी कुछ दीक्षा मिल जाएगी। लेकिन बंद आंखों के साथ ही मार्पा ने अपने लोगों को बुलाया और उनके साथ मिलकर मिलारेपा की पिटाई कर दी। उसने उसे उठवा कर वहां से बाहर फेंक दिया। इस आयोजन पर उसके चाचा ने अपने सभी मित्रों को न्योता दिया था। जब सभी लोग आयोजन के लिए जमा हो गए, तो मिलारेपा ने अपनी तांत्रिक शक्ति के बल पर घर में ओलावृश्टि करवा दी। जिसकी वजह से उसके चाचा-चाची समेत 80 से 85 लोगों की मृत्यु हो गई। वह पूरी जगह ओलों से भर गई थी। हालांकि शुरू में अपना बदला लेकर मिलारेपा को बहुत खुशी हुई, लेकिन जल्दी ही उसे अपनी करनी पर पछतावा होने लगा। अगर कोई संवेदनशील व्यक्ति किसी चीज का दुरुपयोग करता है तो कुछ समय बाद उसे अपने भीतर से ऐसे ही अपराधबोध महसूस होता है। ऐसा सामाजिक तौर पर जमीर के जागने या फिर नैतिक कारणों से नहीं होता, बल्कि कहीं गहराई में हमारे भीतर ही कुछ हिल जाता है। जिंदगी कुछ इसी तरह से ही बनी है। मिलारेपा को भी भीतर से किसी चीज ने बुरी तरह से झकझोर कर रख दिया। तब उसने वहीं निश्चय किया कि वह खुद को इस दोश से मुक्त करवा कर ही रहेगा। उसके तर्क भले ही कितने सही हों, लेकिन उसने जीवन के मूलभूत सिद्धांत का दुरुपयोग किया था। यही वजह है कि वह अध्यात्म की शरण में जाना चाहता था। वह कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे वह अपने पाप को इसी जन्म में धो सके। इसलिए वह गुरु की तलाश में निकल पड़ा। वह कई लोगों से मिला, लेकिन सभी ने उसे इसी जन्म में आत्मबोध कराने से साफ मना कर दिया। उनका कहना था कि वे उसे ऐसा कुछ तो सिखा सकते हैं, जो उसके आत्मज्ञान को बढ़ाए। उसे दया, कृपा और प्रेम की राह पर चलना होगा, जिससे वह धीरे-धीरे हर जन्म के साथ बेहतर होता चला जाएगा। लेकिन मिलारेपा को इन सबसे संतुष्टि नहीं मिल रही थी। दरअसल, उसके भीतर अभी तक पश्चाताप, विद्वेश और गुस्से की भावनाएं भरी पड़ी थीं। अंत में एक व्यक्ति ने उसे मार्पा के बारे में बताया कि वही उसकी मदद कर सकता है। मार्पा के बारे में खास बात यह थी कि वह तीन बार भारत की यात्रा कर चुका थे। वह मशहूर गुरु नरोपा के शिश्य थे और उनसे वह कई तरह की शिक्षा, प्रणालियां और लिखित ज्ञान लेकर उसे तिब्बत की भाशा में अनुवाद भी कर चुके थे। वह भारत के कई तांत्रिक मंत्रों का तिब्बती भाशा में अनुवाद कर चुके थे। यही वजह थी कि सभी लोग उनको जानते थे और उनको ‘अनुवादक’ कहते थे। आखिर इस ज्ञान को लाने वाले भी यही थे। मिलारेपा अपने गुरु मार्पा से मिले यह जानकर मिलारेपा मार्पा की खोज में निकल पड़ा। जब वह उस शहर के पास पहुंचा, जहां मार्पा रहता था, तो उसे कुछ बच्चे मिले। उसने उनसे पूछा, ‘वह अनुवादक, मार्पा कहां हैं?’ एक बच्चे ने कहा, ‘मेरे साथ आओ। मैं जानता हूं कि वह कहां हैं।’ बच्चा उसे एक खेत में लेकर गया, जहां मार्पा जमीन जोत रहे थे। मिलारेपा को देखकर मार्पा ने जमीन जोतना बंद कर दिया और उसे देसी बीयर देते हुए कहा, ‘इसे पी लो और फिर जमीन जोतने के काम में लग जाओ।’ मिलारेपा ने बीयर पी और जुताई के काम में लग गया। कुछ देर बाद मार्पा तो वहर्भ[संपादित करें]

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