महीप सिंह

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डॉ महीप सिंह (15 अगस्त, 1930 - 24 नवम्बर, 2015) हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक, स्तम्भकार और पत्रकार थे। उन्हें २००९ का भारत भारती सम्मान प्रदान किया गया था। वह विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में राष्ट्रीय मसलों पर लेख भी लिखते थे। उन्होंने करीब 125 कहानियां और कई उपन्यास भी लिखे थे। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक रहे। उन्हें ६० के दशक में हिन्दी साहित्य जगत में संचेतन कहानी के आन्दोलन की शुरुआत करने के लिए जाना जाता है।[1]

जीवन परिचय[संपादित करें]

महीपसिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले एक गांव में 15 अगस्त, 1930 को हुआ था।[2] उनके पिता कुछ वर्ष पहले ही सराय आलमगीर (जिला गुजरान, पश्चिमी पाकिस्तान) से आकर उन्नाव में बस गए थे। उन्होने डी.ए.वी. कॉलेज, कानपुर से एम.ए। हिन्दी और आगरा विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की। खालसा कॉलेज, मुम्बई एवं खालसा कॉलेज, दिल्ली में अध्यापन सहित कन्साई विश्वविद्यालय, हीराकाता (जापान) में विजिटिंग प्रोफेसर रहे। शिक्षा मंत्रालय, हिन्दी संस्थान, हिन्दी व पंजाबी अकादमी, भाषा विभाग (पंजाब) सहित कई संस्थाओं से सम्मानित। 'पत्रिका' (दूरदर्शन) का अनेक वर्ष संयोजन। धारावाहिक 'लोक-लोक की बात' और 'रिश्ते' प्रसारित। कई देशों की साहित्यिक यात्राएं। पत्रिका 'संचेतना' का संपादन।

कृतियाँ[संपादित करें]

कहानी-संग्रह[संपादित करें]

'सुबह के फूल', 'उजाले के उल्लू', 'एक लड़की शोभा', 'घिराव', 'कुछ और कितना', 'कितने संबंध' 'धूप की उंगलियों के निशान', 'चर्चित कहानियां', 'मेरी प्रिय कहानियां', 'इक्यावन कहानियां' आदि।

उपन्यास[संपादित करें]

'यह भी नहीं', 'अभी शेष है' , 'बीच की धूप', 'धूप ढ़लने के बाद' ।

निबन्ध[संपादित करें]

‘कुछ सोचा : कुछ समझा’ (निबंध संग्रह), ‘गुरु गोबिंद सिंह और उनकी हिंदी कविता’, ‘आदिग्रंथ में संगृहीत संत कवि’, ‘सिख विचारधारा : गुरु नानक से गुरु ग्रंथ साहिब तक’ (शोधग्रंथ), ‘गुरु गोबिंद सिंह : जीवनी और आदर्श’, ‘गुरु तेगबहादुर : जीवन और आदर्श’, ‘स्वामी विवेकानन्द’ (जीवनी), ‘न इस तरफ’, ‘गुरु नानक जीवन प्रसंग’, ‘एक थी संदूकची’ (बाल सहित्य), ‘सचेतन कहानी : रचना और विचार’, ‘गुरु नानक और उनका काव्य', 'कविता की भूमिका', ‘लेखक और अभिव्यक्‍ति की स्वाधीनता’, ‘हिंदी उपन्यास : समकालीन परिदृश्य’, ‘साहित्य और दलित चेतना’, ‘जापान : साहित्य की झलक’, ‘आधुनिक उर्दू साहित्य।

सम्पादन[संपादित करें]

चार दशकों से ‘संचेतना’ का संपादन, विष्णु प्रभाकर : व्यक्‍तित्व और साहित्य’ (संपादित)

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]