महासमर- 1 (बंधन)

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महासमर- 1 (बंधन)  
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महासमर-1 बंधन
लेखक नरेन्द्र कोहली
देश भारत
भाषा हिंदी
विषय साहित्य
प्रकाशक वाणी प्रकाशन
प्रकाशन तिथि 1988
पृष्ठ 472
आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-7055-142-0

बंधन कालजयी कथाकार एवं मनीषी डॉ॰ नरेन्द्र कोहली का सर्वाधिक प्रसिद्ध महासमर महाकाव्यात्मक उपन्यास का प्रथम खंड हैं । हिन्दी साहित्य की सर्वप्रसिद्ध रचनाओं में अग्रगण्य है। यह महाभारत पर आधारित कथानक है; जो आधुनिक जीवनदृष्टि से परिपूर्ण आधुनिक हिन्दी साहित्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धी है।

'महाभारत' एक विराट कृति है, जो भारतीय जीवन, चिंतन, दर्शन तथा व्यवहार को मूर्तिमंत रूप में प्रस्तुत करती है। नरेन्द्र कोहली ने इस कृति को अपने युग में पूर्णत: जीवंत कर दिया है। उन्होंने अपने इस उपन्यास में जीवन को उसकी संपूर्ण विराटता के साथ अत्यंत मौलिक ढंग से प्रस्तुत किया है। जीवन के वास्तविक रूप से संबंधित प्रश्नों का समाधान वे अनुभूति और तर्क के आधार पर देते हैं। इस कृति में आप महाभारत पढ़ने बैठेंगे और अपना जीवन पढ़ कर उठेंगे। राजा शान्तनु, रानी सत्यवती, भीष्म,धृतराष्ट्र,पांडु ,माद्री,कुन्ती आदि चरित्रों को अत्यंत नवीन रूप में देखेंगे।

जिस प्रकार बाल्मीकि जी की ''रामायण'' को कवि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के रुप मे एक ऐसी आभावान मोतियो की माला का निर्माण किया जो उस दौर के साथ-साथ आधुनिक दौर की समाज हेतु एक ऐसा पुरस्कार है जिसको हर समाज अपने नैतिकता से परिपूर्ण विकास की पराकाष्ठा के रुप मे प्राप्त करने हेतु लालायित है। उसी प्रकार ''वेदव्यास'' की ''महाभारत'' को साहित्यकार  ''नरेंद्र कोहली'' जी  ने  ''महासमर'' के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है।

महासमर का प्रथम भाग ''बंधन'' नाम से प्रकाशित किया गया है जिसकी कहानी राजा शांतनु से प्रारंभ होकर  कौरवो व  पांडवों की बाल अवस्था तक जाती है। यह उपन्यास अपने नाम के अनुरूप ही कुरु वंश के समस्त सदस्यों की मनोदशा को दर्शाता है मुख्यता तो  इसमें गांगेय पुत्र देवव्रत [भीष्म] एवं  राजा शांतनु की पत्नी सत्यवती अपने बंधनों की ऊहापोह के कारण इस प्रकार नजर आते हैं जैसे ''जल बिन मीन''

'बंधन' शांतनु, सत्यवती तथा भीष्म के मनोविज्ञान तथा जीवन-मूल्यों की कथा है  । घटनाओं की दृष्टि से यह सत्यवती के हस्तिनापुर में आने तथा हस्तिनापुर से चले जाने के मध्य की अवधि की कथा है,जिसमें जीवन के उच्च आध्यात्मिक मूल्य जीवन की निम्नता और भौतिकता के सम्मुख असमर्थ होते प्रतीत होते हैं और हस्तिनापुर का जीवन महाभारत के युद्ध की दिशा ग्रहण करने लगता है  ।महासमर-बंधन (खंड एक) स्पष्ट तौर पर दिखाता है कि  किस प्रकार शांतनु, सत्यवती तथा भीष्म के कर्म-बन्धनों से हस्तिनापुर बँध चुका है और भीष्म भी उससे मुक्त होने की स्थिति में नहीं थे ।[1]

पुस्तक के कुछ अंश[संपादित करें]

  • देवव्रत का मन क्षुब्ध होकर जैसे उन पर धिक्कार बरसाने लगा था। वे किसी से कोई अपेक्षा करते ही क्यों हैं ? वे अपने भीतर ही सम्पूर्णता क्यों नहीं खोज लेते ? क्या आवश्यकता है उन्हें, किसी के प्यार की ? पिता ने प्यार से सिर पर हाथ फेरा तो क्या और नहीं फेरा तो क्या ? ये अपेक्षाएँ ही तो अन्ततः निराशा को जन्म देती हैं और निराशा दुख का कारण बनती है। दुख से बचना है तो अपेक्षाओं से बचना होगा''
  • स्थितियाँ बदलते ही सारे निष्कर्ष बदल जाते हैं।
  • रोगी के लिए सामाजिक व्यवहार आवश्यक नहीं होता ;
  • अनुमान से सब कुछ नहीं जाना जा सकता;
  • ‘‘अभाव की चिन्ता भी चिन्ता होती है पिताजी !’’ देवव्रत सहज भाव से बोले, ‘‘वरन् वह असुविधा भी होती है।’’ यदि साम्राज्यों के साथ चिन्ताएँ ही जुड़ी हैं तो इतनी ललक से व्यक्ति साम्राज्य स्थापित करने के लिए लपकता ही क्यों है ? क्या मनुष्य इतनी-सी बात नहीं समझता कि उसका स्वार्थ किसमें है ? उसे किसका ग्रहण करना है, किसका त्याग ? यदि साम्राज्य चिन्ताओं का घर है तो मनुष्य को चाहिए कि उसे त्याज्य माने....
  • कुशल से कुशल योद्धा भी किसी-न-किसी दिन युद्ध में वीरगति पाता ही है।

सन्दर्भ सुची[संपादित करें]

  1. https://web.archive.org/web/20180823100525/http://vaniprakashanblog.blogspot.com/2012/05/blog-post_30.html. मूल से 23 अगस्त 2018 को पुरालेखित. गायब अथवा खाली |title= (मदद)