महल (1949 फ़िल्म)

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महल

महल का पोस्टर
निर्माता अशोक कुमार
अभिनेता अशोक कुमार,
मधुबाला
प्रदर्शन तिथि(याँ) 1949
देश भारत
भाषा हिन्दी

महल 1949 में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है।

अनुक्रम

संक्षेप"1949 में रिलीज "महल" आज भी बेजोड़।[संपादित करें]

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एक गुमनाम शख्स  द्वारा यमुना के किनारे बनवाये महल "संगम महल" में पनपी एक प्रेम कहानी की प्रस्तुति फ़िल्म में हैं। एक रात उसको बनाने वाला डूब जाता है। वह वापस आने का वादा करता है और उसकी प्रेमिका कामिनी उसके  इंतजार में दम तोड़ देती हैं।[संपादित करें]

40 साल बाद उसे सरकारी नीलामी में खरीदा जाता है और हरिशंकर के रूप में एक नया मालिक पुराने महल को खरीदता हैं। हरिशंकर महल में एक तस्वीर को देख कर दंग रह जाता है क्योंकि पुराने मालिक की वह तस्वीर हूबहू उसके जैसी होती हैं।[संपादित करें]

महल में हरिशंकर एक साया देखता है । अपने दोस्त की सलाह पर वह उस महल को छोड़कर वापस शहर चला जाता है। हरि वापस उस साये की कशिश में महल में लौट आता है। हरि का वकील  दोस्त श्रीनाथ हरि को उस साये से दूर रखना चाहता है तब साया वकील को चेतावनी तक दे देता हैं।[संपादित करें]

वकील मित्र हरिशंकर का ध्यान महल से हटाने की पुरजोर कोशिश करता है लेकिन हरिशंकर साये का पीछा जारी रखता है। साया हरिशंकर को जान देने पर उकसाता है तो भी हरि तैयार हो जाता है। साया हरि को एक जान लेने के लिए तैयार करता है ताकि हरि से मिलन हो सके। हरि इसके लिए भी तैयार भी हो जाता हैं। [संपादित करें]

इससे पहले की हरी कुछ कर गुजरे हरि के पिता और श्रीनाथ  उसे शहर ले आते हैं।[संपादित करें]

महल में कामिनी का साया तड़पता है और हरिशंकर का इंतजार करता हैं। हरिशंकर की शादी रंजना से हो जाती हैं। हरिशंकर रंजना को लेकर वीरानों मैं चला जाता है। रंजना की हैरानी-परेशानी में 2 वर्ष गुजर जाते है लेकिन उनके बीच दूरियां बढ़ती जाती हैं। रंजना की दुश्वारियों में रोज़ इजाफा होता जाता हैं। रंजना आखिरकार उस दीवार को पहचानना चाहती है जो उसके ओर हरिशंकर के बीच खड़ी होती हैं।[संपादित करें]

हरिशंकर अंततः पुनः महल लौटता है अपनी मुहब्बत पाने। इस बार रंजना भी उसके पीछे संगम भवन पहुच जाती हैं।  रंजना पुलिस थाने पहुचकर हरिशंकर की बेवफाई की रिपोर्ट करती हैं और जहर खा लेती है। पुलिस हरिशंकर को गिरफ्तार कर लेती हैं।[संपादित करें]

इसके बाद बहुत से राज खुलते हैं।[संपादित करें]

फ़िल्म के अंत में मालिन ही कामिनी निकलती है जो कि दरअसल आशा है। आशा कोर्ट में अपनी कहानी सुनाती है जिसे सुन कर दर्शक दंग रह जाते है। [संपादित करें]

फ़िल्म में महल का सेट बहुत सुंदर बनाया गया था जिसे देखकर उसमे कुछ लम्हे गुज़ारने की इच्छा हर किसी के दिल में बलवती होती है। फ़िल्म में पुराने दौर की रेलगाड़ी को देखना एक अत्यंत सुखद अनुभव हैं। [संपादित करें]

फ़िल्म से कुछ सम्वाद-[संपादित करें]

1. मुझे होश में आने दो, मैं जरा खामोश रहना चाहता हूं।[संपादित करें]

2. तुम एक पढ़े-लिखे आदमी हो जरा अपनी अक्ल से मशवरा करो। [संपादित करें]

3. स्लो पोइज़न अक्सर मीठे होते है और धोखे अक्सर हसीन होते है। [संपादित करें]

4. मोहब्बत के इस मुकदमे में बहस की जरूरत नही। [संपादित करें]

5. हुजूर को शुबहा हुआ होगा।[संपादित करें]

6. मगर हम तो खुद जहर है आप हम से दवा बनने की उम्मीद करते है।[संपादित करें]

7. इस घर की कुछ देर कितनी देर की होती हैं।[संपादित करें]

8. पंछी एक बार जाल से निकल चुका अब वो और ऊँचा उड़ेगा।[संपादित करें]

9. तकलीफ उस नश्तर से भी होती है जो मरीज की बेहतरी के लिए उसके घाव में चुभाई जाती हैं।[संपादित करें]

10. मैं मेरी मजबूरी ओर बेबसी मैं कैद था।[संपादित करें]

11. मगर अफसोस की ना मैं कत्ल हो सकी और ना ही इनकी मोहब्बत पा सकी।[संपादित करें]

12. तुम्हारे लिए, तुम्हे पाने के लिए मैं हर कुर्बानी देने के लिए तैयार हुँ।[संपादित करें]

13. इतना जब्त मत करो, इंसान इतना जब्त नही कर सकता हैं।[संपादित करें]

फ़िल्म का संगीत अत्यंत कर्णप्रिय है। फ़िल्म के प्रमुख गाँनो मैं "आएगा आएगा आएगा आने वाला, दीपक बिन कैसे परवाने जल रहे हैं, कोई नही चलाता और तीर चल रहे हैं" आज भी ध्यान आकर्षित करता हैं। फ़िल्म में एक मुजरा " ये रात बीत जाएगी, जवानी फिर नही आएगी" तब के दौर को प्रस्तुत करता हैं। "मुश्किल है बहुत मुश्किल" कामिनी की मनोस्थिति को बेहतर अभिव्यक्ति देता हैं। आदिवासी कबीलाई नृत्य "हुम्बाला" का भी शानदार कोरियोग्राफी की गई हैं। "जो हम पर गुजरनी है, गुजर जाए तो अच्छा हो" रंजना के दर्द को बेहतर प्रस्तुत करता हैं। " दिल ने फिर याद किया" कामिनी के इन्तेजार को बयां करता हैं।[संपादित करें]

अशोक कुमार बेजोड़ थे व उनकी अभिनय क्षमता अतुलनीय थी। मधुबाला ने अपना किरदार बहुत खूबसूरती से निभाया था। फ़िल्म को देखना एक युग को जीना हैं । तीव्र गति की यह ब्लेक एन्ड व्हाइट फ़िल्म आपको बहुत पसंद आएगी।[संपादित करें]

सुरेन्द्र सिंह चौहान।[संपादित करें]

suru197@gmail.com[संपादित करें]

9351515139[संपादित करें]

चरित्र[संपादित करें]

मुख्य कलाकार[संपादित करें]

दल[संपादित करें]

संगीत[संपादित करें]

रोचक तथ्य[संपादित करें]

परिणाम[संपादित करें]

बौक्स ऑफिस[संपादित करें]

फ़िल्म ने सफलता के कीर्तिमान स्थापित किये थे।

समीक्षाएँ[संपादित करें]

नामांकन और पुरस्कार[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]