मल (आयुर्वेद)

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आयुर्वेद के सन्दर्भ में, जो शरीर के धातुओं एंवम् उपधातुओं को मलिन करते हैं वे मल कहलाते हैं ( "मलिनीकरणान्मलाः") । स्वेद (पसीना), मूत्र और पुरीष को मल की संज्ञा दी गई है।[1] दोष और धातुओं के समान मलों की उपयोगिता भी मानव शरीर के लिए महत्त्वपूर्ण है।

सुश्रुत के अनुसार, "दोषधातुमलमूलं हि शरीरम् " अर्थात दोष, धातु और मल शरीर के मूल (जड़) हैं। इनके बिना स्थिर नहीं रह सकता है। ये तीनों जब शरीर को धारण करते हैं तब स्वास्थावस्था होती है और विषम होने पर शरीर में विकृति पैदा होती है।

शरीर में मल की एक निश्चित मात्रा का होना अनिवार्य है जो शरीर को धारण करती है। शरीर में मल का क्षय होने पर शरीर निर्बल हो जाता है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]