त्रिदोष

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सूरजपुर बहरेला भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के बाराबंकी जिले के बानी कोडर प्रखंड का एक रियासत है। यह फैजाबाद डिवीजन के अंतर्गत आता है। यह जिला मुख्यालय बाराबंकी से पूर्व की ओर 41 KM दूर स्थित है। बानी कोडर से 6 किमी. राज्य की राजधानी लखनऊ से 61 किमी दूर

सूरजपुर बहरेला पिन कोड 225409 है और डाक प्रधान कार्यालय राम सनेही घाट है।

दिगसारी (2 किमी), नाथूपुर (3 किमी), हाकामी (3 किमी), असंद्रा (3 किमी), रामपुर (4 किमी) सूरजपुर बहरेला के नजदीकी गांव हैं। सूरजपुर बहरेला पश्चिम की ओर सिधौर ब्लॉक, दक्षिण की ओर हैदरगढ़ ब्लॉक, पूर्व की ओर मवई ब्लॉक, उत्तर की ओर दरियाबाद ब्लॉक से घिरा हुआ है।

जैदपुर, रुदौली, जैस, लखनऊ सूरजपुर बहरेला के नजदीकी शहर हैं।

शरीरगत् दोष[संपादित करें]

वात, पित्त, कफ - ये तीन शारीरिक दोष माने गये हैं। ये दोष असामान्य आहार-विहार से विकृत या दूषित हो जाते है इसलिए इसे 'दोष' कहा जाता है। शरीरगत् अन्य धातु आदि तत्व इन्हे दोषों के द्वारा दूषित होता है। इन तीनो दोषों को शरीर का स्तम्भ कहा जाता है। इनके प्राकृत अवस्था एवं सम मात्रा ही शरीर को स्वस्थ रखता है, यदि इनका क्षय या वृद्धि होती है, तो शरीर में विकृति या रोग उत्पन्न हो जाती है।

पंचमहाभूतों से दोषों की उत्पत्ति[संपादित करें]

  • 1. सृष्टि में व्याप्त वायु महाभूत से शरीरगत वात दोष की उत्पति होती है,
  • 2. अग्नि से पित्त दोष की उत्पत्ति होती है,
  • 3. जल तथा पृथ्वी महाभूतों से कफ दोष की उत्पति होती है।

अर्थात शरीर रक्त आदि धातु से निर्मित होता है एवं मल शरीर को स्तंभ की तरह सम्हाले हुये हैं। दोष, धातु, मल प्राकृतिक रूप से रहकर उचित आहार-विहार करने वाल शरीर धारण करते है। शरीर की क्षय, वृद्धि, शरीरगत् अवयवो द्रव्यों की विकृति, आरोग्यता-अनारोग्यता, इन दोष धातु मलों पर ही आधारित है यद्यपि शरीर के लिए दोष धातु मल तीनों प्रधान द्रव्य है फिर भी शारीरिक क्रिया के लिए वातादि दोषों के अधिक क्रियाशील होने से शरीर में दोष वर्ग की प्रधानता रहती है।

रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता
(दोषों की विषमता ही रोग है और दोषों का साम्य आरोग्य है।)

तीनों दोषों में सर्वप्रथम वात दोष ही विरूद्ध आहार-विहार से प्रकुपित होता है और अन्य दोष एवं धातु को दूषित कर रोग उत्पन्न करता है। वात दोष प्राकृत रूप से प्राणियों का प्राण माना गया है। आयुर्वेद शास्त्र में शरीर रचना, क्रिया एवं विकृतियों का वर्णन एवं भेद और चिकित्सा व्यवस्था दोषों के अनुसार ही किया जाता है।

वात दोष के पांच भेद[संपादित करें]

पित्‍त दोष के पांच भेद[संपादित करें]

कफ दोष के पांच भेद[संपादित करें]

सन्‍दर्भ ग्रन्‍थ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]