मजाज़

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मजाज़ लखनऊ से उर्दु के प्रख्यात शायर रहे हैं। कुछ तो होते हैं मोहब्बत में जुनूं के आसार और कुछ लोग दीवाना बना देते हैं 🐍🐍🐍 मजाज़ की एक ग़ज़ल:

ख़ुद दिल में रह के आंख से पर्दा करे कोई हां लुत्फ़ जब है पाके भी ढूंढा करे कोई

तुम ने तो हुक्म-ए-तर्क-ए-तमन्ना सुना दिया, किस दिल से आह तर्क-ए-तमन्ना करे कोई

दुनिया लरज़ गई दिल-ए-हिरमांनसीब की, इस तरह साज़-ए-ऐश न छेड़ा करे कोई

मुझ को ये आरज़ू वो उठायें नक़ाब ख़ुद, उन को ये इन्तज़ार तक़ाज़ा करे कोई

रंगीनी-ए-नक़ाब में ग़ुम हो गई नज़र, क्या बे-हिजाबियों का तक़ाज़ा करे कोई

या तो किसी को जुर्रत-ए-दीदारही न हो, या फिर मेरी निगाह से देखा करे कोई

होती है इस में हुस्न की तौहीन ऐ ‘मज़ाज़’, इतना न अहल-ए-इश्क़ को रुसवा करे कोई