मगही उपन्यास

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मगही (मागधी) में पद्य साहित्य जितना प्राचीन और समृद्ध है, उतना गद्य साहित्य नहीं। अन्य भारतीय भाषाओं की तरह मगही में भी गद्य साहित्य का आरंभ 19वीं सदी के अंत में हुआ। लेकिन मगही साहित्येतिहासकारों के अनुसार मगही का पहला उपन्यास उपन्यासिका या लंबी कहानी ‘सुनीता’ (1928) बीसवीं सदी के तीसरे दशक में छपी। तब से लेकर वर्तमान समय तक तीन दर्जन से ज्यादा मगही उपन्यास लिखे जा चुके हैं और मगही उपन्यासों[1] का प्रकाशन निरंतर हो रहा है।

मगही का पहला उपन्यास[संपादित करें]

‘सुनीता’ की रचना 1927 में हुई थी। मगही साहित्य के अधिकांश अन्वेषी अध्येता और इतिहासकार इसी को मगही का पहला उपन्यास मानते हैं। वहीं, कुछ लोग 1893 में प्रकाशित अंबिकादत्त के उपन्यास ‘आश्चर्य वृत्तांत’ की भी चर्चा करते हैं जिसमें लेखक ने मगही भाषा का प्रचुर उपयोग किया है।[2] पुस्तक रूप में छपने से पहले अंबिकादत्त व्यास का यह उपन्यास मासिक पत्रिका ‘पीयूष प्रवाह’ 1884 के अंकों में धाराविहक प्रकाशित हुआ था। चूंकि यह एपन्यास पूर्णरूपेण मगही में लिखा हुआ नहीं है, इसलिए 'सुनीता' को मगही का प्रथम उपन्यास मानना तथ्यपरक है। जहां तक इसके प्रकाशन वर्ष की बात है, तो इसके लेखक जयनाथ पति ने 1928 में ही प्रकाशित अपने दूसरे उपन्यास ‘फूल बहादुर’ की भूमिका में लिखा है कि उन्होंने सुनीता की रचना बहुत जल्दबाजी में की और ठीक से बगैर प्रूफ देखे छपने के लिए प्रेस में भेज दिया।[3] इससे पता चलता है कि वास्तव में सुनीता की रचना और उसका प्रकाशन 1928 की जनवरी-फरवरी में हुआ होगा। क्योंकि इसकी समीक्षा अप्रैल 1928 के ‘मॉर्डर्न रिव्यू’ में छपी थी।[4] जिसे लिखा है सुनीति कुमार चटर्जी ने। अफसोस अब इस उपन्यास की प्रति उपलब्ध नहीं है।

समकालीन मगही उपन्यास[संपादित करें]

‘सुनीता’ से शुरू हुई मगही उपन्यास लेखन की परंपरा समकालीन मगही साहित्य में निरंतर विद्यमान है। मगही का दूसरा उपन्यास ‘फूल बहादुर’ 1928 की पहली अप्रील को प्रकाशित हुआ। इसके लेखक भी बाबू जयनाथ पति ही हैं। जयनाथ पति का एक और उपन्यास ‘गहनीत’ संभवतः 1937 में छपा। इस उपन्यास के करीब दो दशक बाद 1958 में डा. राम प्रसाद सिंह ‘समस्या’ नामक उपन्यास लेकर सामने आए परंतु मगही उपन्यास लेखन की परंपरा को गति मिली सत्तर के दशक में। जब 1962 में राजेंद्र कुमार ‘यौधेय’ की ‘बिसेसरा’, डा. रामनंदन का ‘आदमी आ देओता’ 1965 में, बाबूलाल मधुकर का ‘रमरतिया’ 1968 में प्रकाशित हुआ।[5] मगही पत्रिका ‘बिहान’ के नवंबर 1967 से मार्च 1969 के अंकों में डा. द्वारका प्रसाद का उपन्यास ‘मोनामिम्मा’ धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुई। डा. श्रीकांत शास्त्री ने ‘गोदना’ उपन्यास 1967 में लिखी किंतु यह छपी 1978 में। [6]

मगही में प्रकाशित प्रमुख उपन्यास हैं: सँवली (शशिभूषण उपाध्याय ‘मधुकर, 1977), चुटकी भर सेनुर (सत्येन्द्र जमालपुरी, 1978), अछरंग (प्रो. रामनरेश प्रसाद वर्मा, 1980), बस एक्के राह (केदार ‘अजेय’, 1983), नरक सरग धरती (डा. राम प्रसाद सिंह, 1987), धुमैल धोती (रामविलास ‘रजकण’, 1995), प्राणी महासंघ (मुनिलाल सिन्हा ‘सीसम’, 1995), अलगंठवा (बाबुलाल मधुकर, 2001), तारा (रामनारायण सिंह, 2011) और खाँटी किकटिया (अश्विनी कुमार पंकज, 2018)।

इसके अतिरिक्त अन्य उपन्यास हैं - चन्द्रशेखर शर्मा की ‘हाय रे उ दिन’, ‘सिद्धार्थ’ और ‘साकल्य’, उपमा दत्त की ‘पियक्कड़’, डा. राम प्रसाद सिंह की ‘बराबर के तरहटी में’, ‘सरद राजकुमार’ और ‘मेधा’, आचार्य सच्चिदानन्द की ‘बबुआनी अइँठन छोड़ऽ’ (2004), परमेश्वरी सिंह ‘अनपढ़’ की ‘बाबा मटोखर दास’, मुनिलाल सिन्हा ‘सीसम’ की ‘गोचर के रंगे गोरू-गोरखियन के संग’, रामबाबू सिह ‘लमगोड़ा’ की ‘उनतीसवाँ व्यास’ और ‘टुन-टुनमें-टुन’, परमेश्वरी सिंह ‘अनपढ़’ की ‘शालिस’ (2006) आदि।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. मगही का भाषिक स्वरुप और उसका साहित्यिक विकास http://www.ignca.nic.in/coilnet/mg005.htm
  2. डा. भरत सिंह, मगही उपन्यास: रचना आउ विकास (मगही भाषा का इतिहास एवं इसकी दिशा और दशा, 2012, पृ. 40)
  3. मुखबंध: जयनाथ पति, फुल बहादुर, पृष्ठ 18 https://books.google.co.in/books?id=Q1dYDwAAQBAJ&
  4. ‘द मॉडर्न रिव्यू’, अंक 43, अप्रैल 1928, कलकत्ता विश्वविद्यालय, कलकत्ता, पृष्ठ 430
  5. मगही साहित्य का इतिहास, मगही अकादमी, 1998
  6. मगही उपन्यास http://magahi-sahitya.blogspot.in/2006/09/blog-post_115818807205973637.html