भैषज्य कल्पना
आयुर्वेद में भैषज्य कल्पना (संस्कृत : भैषज्यकल्पना) का अर्थ है औषधि के निर्माण की डिजाइन (योजना)। [1]आयुर्वेद में रसशास्त्र का अर्थ 'औषध (भेषज) निर्माण' है और यह मुख्यतः खनिज मूल के औषधियों से सम्बन्धित है। रसशास्त्र और भैषज्यकल्पना मिलकर आयुर्वेद का महत्वपूर्ण अंग बनाते हैं।
आयुर्वेदीय संहिताओं में भेषज, भैषज्य तथा औषधि शब्द का प्रयोग प्रायः पर्याय रूप में एक दूसरे के लिए प्रयुक्त हुआ है। आचार्य चरक ने चिकित्सा स्थान प्रथम अध्याय में भेषज के निम्न पर्याय कहे हैं, यथा-
- चिकित्सितं व्याधिहरं पथ्यं साधनमौषधम् ।
- प्रायश्चितं प्रशमनं प्रकृति स्थापनं हितम् ॥
- विद्याद् भेषजनामानि - (चरकसंहिता, चिकित्सास्थान 1/1/3)
आर्थात् चिकित्सित, व्याधिहर, पथ्य, साधन, औषध, प्रायश्चित, प्रशमन, प्रकृतिस्थापन, हित -- ये भेषज के पर्याय हैं।
अमरकोश के अनुसार-
- भेषजौषध भैषज्यान्यगदो जायुरित्यपि । (अमरकोश 2/6/50)
अर्थात् भेषज, औषध, भैषज्य, अगद तथा जायु -- ये औषधि के पाँच नाम हैं।
आचार्यों ने चिकित्सा के चार पाद का वर्णन किया है जिसमें भिषक् , द्रव्य, उपस्थाता तथा रोगी इन चार का ग्रहण किया जाता है। द्रव्य या औषधि के गुण का वर्णन आचार्य चरक ने निम्न रूप में किया है।
- बहुता तत्र योग्यत्वमनेकविध कल्पना ।
- संपच्चेति चतुष्कोऽयं द्रव्याणां गुण उच्यते ॥ -- (चरकसंहिता सूत्रस्थान 9/7)
अर्थात् औषधि का अधिक मात्रा में प्राप्त होना या उपलब्ध होना, व्याधि नाश करने में समर्थ होना, उस औषधि की अनेक कल्पना जैसे स्वरस, कल्क, क्वाथ आदि का निर्माण होना (तथा प्रभावी होना) एवं औषधि का अपने गुण यथा रस, वीर्य, आदि से युक्त होना -- उत्तम औषधि के लक्षण कहे गये हैं।
इस प्रकार भेषज तथा उसकी अनेक कल्पना करना एक बहुत ही महत्वपूर्ण पक्ष है। हम भैषज्य कल्पना के अन्तर्गत भैषज्य या भेषज के विभिन्न कल्पनाओं जैसे स्वरस, क्वाथ, अवलेह आदि का अध्ययन करते हैं।
- भैषज्य कल्पना का अर्थ
भैषज्य कल्पना शब्द भैषज्य + कल्पना इन दो शब्दों से मिलकर बना है।
- भैषज्य की परिभाषा
- भिषक जिते हितत्वात च भैषज्यं परिचक्षते । (का.खि.)
- भिषजा संस्तुतं द्रव्यं भैषज्यम् । (आढमल्ल शार्ङ्गधर 1/1 पर)
इस प्रकार भैषज्य शब्द का अर्थ है "जो चिकित्सा के कार्य में हितकारी हो" अथवा वैद्य के द्वारा चिकित्सा हेतु संस्तुत द्रव्य की संज्ञा भैषज्य की होती है।
- कल्पना का अर्थ
वामन शिवराम आप्टे कृत हिन्दी संस्कृत शब्दकोष के अनुसार 'कल्पनम्' (क्लृप् + ल्युट) = रूप देना, बनाना।
चक्रपाणि के अनुसार-
- कल्पनं उपयोगार्थ प्रकल्पनं संस्करणमिति ।
अर्थात औषधि को उपयोगी रूप देना ही कल्पना कहलाती है।
इस प्रकार भिषक के द्वारा संस्तुत द्रव्य को उपयोगी रूप में परिवर्तित करने को भैषज्य कल्पना कहा जाता है। काश्यप संहिता के खिलस्थान में वर्णित भैषज्योपक्रमणीय अध्याय में औषधि का अधिष्ठान, औषधि का ज्ञान, भेषज, भैषज्य, अगद, कषाय, औषधि के गुण भेद, काल, औषधि सेवन विधि, निषिद्ध काल, औषधि जीर्ण लक्षण तथा अजीर्ण लक्षण, वयानुसार मात्रा का वर्णन किया है। अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भैषज्य कल्पना के अन्तर्गत भैषज्य के विभिन्न कल्पनाओं के निर्माण के साथ-साथ उसके सेवन विधि काल, मात्रा आदि का विस्तृत रूप से अध्ययन किया जाता है।
भैषज्य कल्पना में दो प्रकार की कल्पनाओं का समावेश किया जाता है-
- (१) औषाधीय कल्पना
- (२) आहार कल्पना
औषाधीय कल्पना को २ भागों में बाँटा जा सकता है,
- (क) मौलिक कल्पना-जैसे स्वरस कल्क क्वाथ हिम फाण्ट।
- (ख) व्युत्पन्न कल्पना-ऐसी कल्पनायें जिनके निर्माण हेतु मौलिक कल्पना की आवश्यकता होती है। जैसे, स्नेह, अवलेह, संधान आदि।
इसे निम्न रूप में प्रदर्शित किया जा सकता है-
मौलिक कल्पना -- स्वरस, कल्क, क्वाथ, हिम, फाण्ट,
व्युत्पन्न कल्पना -- अवलेह, गुटिका वटी, स्नेह, संधान, क्षीर पाक आदि
आहार कल्पना -- मण्ड, पेया, विलेयी, यूष, यवागू, तक्र, दधि आदि
भैषज्यकल्पना कितनी महत्वपूर्ण है, यह निम्नलिखित श्लोक से स्पष्ट है-
- यस्य कस्य तरोर्मूलं येन केनापि मिश्रितम् ।
- यस्मै कस्मै प्रदातव्यं यद्वा तद्वा भविष्यति ॥
- (जिस-तिस वृक्ष का मूल ले लिया, जिस-किस द्वारा उसका मिश्रण बना दिया गया , जिस-तिस को उसे दे दिया गया (सेवन करा दिया गया), (तो परिणाम भी) ऐसा-वैसा ही होगा।)
संस्कार
[संपादित करें]स्वाभाविक (प्रकृतिसिद्ध ) गुणों से युक्त द्रव्यों का जो संस्कार (Processing ) किया जाता है उसे 'करण' कहते है l द्रव्यों मे किन्ही विशेष गुणों का लाना संस्कार कहलाता है l हम जो द्रव्य आहार औषधि के लिए उपयोग मे लाते हैं वे अनेक संस्कारो से संस्कारित हुए रहते हैंl उसमे कुछ नैसर्गिक हैं और कुछ कृत्रिम l
- तोयसन्निकर्ष या जलसन्निकर्ष (स्वच्छ पानी से धोना)
- अग्निसन्निकर्ष (आग पर पकाना)
- शौच (शुद्ध करना (धोना ))
- मन्थन (मथना)
- देश
- काल
- वासन (सुवासित करना)
- भावन (भावना देना)
- कालप्रकर्ष (समय की प्रतीक्षा करना)
- भाजन (विशेष प्रकार के पात्रों मे रखकर उन गुणों का आधान करना)
- जलसंयोग - खाद्य पदार्थ स्वच्छ पानी से धोना l इस संस्कार से-
- (१) मिट्टी, बाल, कचरा, पत्थर, कंकड़, कीड़े, कृमि (सूक्ष्म ) आदि अलग हो जाते हैं l
- (२) आहारद्रव्य को पानी मे भिगोकर या पीसकर कोमल बनाया जाता हैl सूखापन का नाश होता है l जैसे पोहा बनाते समय पानी मे भिगोकर रखने के बाद छौंक लगाया जाता हैl दही की छाली जल में मिलाकर मट्ठा बनाकर उसे शीत और हलका किया जाता हैl तीक्ष्ण आसव, अरिष्ट या सिरका आदि मे जल मिलाकर उसे मृदु पेय बनाया जाता है l
- अग्नि संस्कार - अन्न को आग पर पकाकर उसके गुरुत्व को हटाकर हलका बना लिया जाता है l
- कुकूल कर्पर भ्राषटकन्दवाअंगारविपचितान l
- एकायोनिलघुंविद्यातपुपानुत्तरोत्तरम ॥
- कुकूल - अपाम बाष्पस्वेदः l (पानी के भाप से पकाना )
- कर्पर - ज्वालासंतप्ते कपालं l ( तवा या उसी तरह का मिट्टी का पात्र)
- भ्राष्ट्र- तदेव सछिद्रम (छिद्रयुक्त कबेलू )
- कंदु - लोहपात्र (तावा )
- अंगार - अंगारपूर्ण पात्रम l
ये संस्कार उत्तरोत्तर लघु हैंl प्रायः ये संस्कार अपूप याने आटा (जवार, गेहूं, चावल आदि ) को लाटकर या थापकर बनाये गये विविध पदार्थ, रोटी, भाकरी, घिरडे, बिट्टी, पानगा, बाटी आदि बनाने मे उपयोग मे लाया जाता हैl अंगारतप्त अपूप लघुत्तम हैl अग्निसंस्कार से चावल का भात या धान का लावा या अन्य भर्जित अन्न गुरुता छोड़ लघु हो जाते हैं।
- शौच - शोधन करके द्रव्यों के दोषों को दूर कर उन्हें निर्दोष और ग्राह्य बना लिया जाता है l
- मन्थन - दही शोथकारक है, किन्तु छाली के साथ मथ देने पर वह शोथनाशक हो जाती हैl
- देश - 'द्वितीय ब्राम्ह रसायन ' नामक औषधि को राख के ढेर के नीचे रखने का विधान बतलाया गया हैl इस प्रकार देश विशेष मे रखने से गुणाधान होता है l जैसे - अलग -अलग देशों मे रहने से गर्म, शीत और साधारण देशो के वासी जीवों के मांस के गुण मे अंतर होता हैl
- काल - जैसे एक वर्ष का पुराना चावल हलका हो जाता है और वही नया होने पर गुरु होता है। आसव-अरिष्ट जितने पुराने होते हैं उतने ही अधिक गुणकारी होते हैंl रस भस्म भी पुराने अधिक गुणशाली होते हैंl
- भावन - आंवला आदि चूर्णों का गुणोत्कर्ष करने के लिये उसी द्रव्य के काढ़े की भावना (mixing and grinding ) दी जाती हैl विष की मारकता दूर करने के लिये उसमे गोमूत्र की भावना दी जाती है और उसकी मारकता क्षीण हो जाती हैl
- कालप्रकर्ष - आसव अरिष्ट का संधान करने पर २ से ४ सप्ताह बाद ही वह तैयार हो पाता है और उसमे आसव के गुण उत्पन्न होते हैंl
- भाजन (पात्र ) - त्रिफला के कल्क को लोहपात्र पर लेप कर सूखने के पश्चात निकलकर प्रयोग करने से वह रसायन हो जाता हैl
इसी प्रकार औषधों की अनेक प्रकार की कल्पनायें करना, शोधन करना, भावना देना, अभिमंत्रित करना, धान्यराशि में, धूप में या शीत मे रखना आदि अन्य प्रक्रियाएँ भी गुणान्तरधान के लिये की जाती हैंl
भैषज्य कल्पना का क्रमिक विकास
[संपादित करें]आयुर्वेदिक औषध निर्माण विज्ञान का विकास क्रमिक रूप से हुआ है, जिसे समझने के लिए इसे विभिन्न कालों में विभाजित किया जा सकता है:[2][3]
- (१) वैदिक काल
- (२) संहिता काल
- (३) मध्यकाल / रसशास्त्र काल
- (४) आधुनिक काल
वैदिक काल
[संपादित करें]ऋग्वेद
[संपादित करें]ऋग्वेद के औषधि सूक्त तथा अन्य वेदों में अनेक औषधियों सोम, करञ्ज, पिप्पली, खदिरसार, शाल्मलि, विभीतक, दूर्वा, पलाश, कमल, बेर, अर्जुन, अश्वत्थ, पृश्निपणी, अपामार्ग, लाक्षा, अर्क, गुग्गुलु, बिल्ब, उर्दुम्बर आदि का वर्णन प्राप्त होता है जिनमें सोम को प्रमुख औषधि माना गया है। “सोम औषधिनामाधिराजा” अर्थात् सोम नामक औषधि को औषधियों का राजा कहा गया है। वेदों में अनेक कल्पनाओं का प्रारम्भिक स्वरूप देखने को मिलता है। वेदों के अध्ययन से ऐसा लगता है कि पञ्चविध कषाय कल्पना उस काल में अपना नवजातत्व व्यतीत कर रही थी।
अथर्ववेद
[संपादित करें]अथर्ववेद में डण्डे, तीर या चोट से बने घाव के लिए सिलाची (लाक्षा) अचूक औषधि कही गई है। “आबय” नामक विषाक्त औषधि के स्वरस को पकाने पर निर्विष होने का उल्लेख मिलता है, वस्तुतः यह शृत कल्पना (क्वाथ) ही है। त्वचा के विषजन्य वैवर्ण्य को दूर करने के लिए इसी आबय को जल के साथ पीसकर करम्भ (लेप) बनाया जाता था, जो स्पष्ट रूप से “कल्क कल्पना” ही है। इस प्रकार आयुर्वेद की दृष्टि से अथर्ववेद में महत्त्वपूर्ण उल्लेख मिलते हैं, इसलिए अथर्ववेद को “भिषग्वेद” या “भैषज्य वेद” भी कहा गया है।
संहिता काल
[संपादित करें]चरक संहिता
[संपादित करें]सूत्रस्थान के द्वितीय अध्याय में 32 यवागू और तृतीय अध्याय में : 32 सिद्धतम चूर्ण प्रदेह का वर्णन मिलता है। चतुर्थ अध्याय में मधुर कषाय, अम्ल कषाय, कटु कषाय, तिक्त कषाय एवं कषाय कषाय इन पाँच कषाय योनियों का वर्णन किया गया है।
- पञ्चकषाययोनय इति मधुरकषायोऽम्लकषायः कटुकषायस्तिक्तकषायः कषायकषायश्चेति तन्त्रे संज्ञा। (च.सू. 4/6)
उक्त पञ्चकषाय योनियों में पञ्चविध कषाय कल्पनाओं की उत्पत्ति मानी गयी है। यहाँ पर पाँच रसों से पञ्च कषाय कल्पनाओं की ही उत्पत्ति बतलायी है क्योंकि लवण रस के निष्प्रयोजन होने के कारण छठी कषाय योनि नहीं मानी गयी है।
- पञ्चविधं कषायकल्पनमिति तद्यथा-स्वरसः, कल्कः, शृतः, शीतः, फाण्टः कषाय इति। (च.सू. 4/7)
अर्थात् स्वरस, कल्क, शृत (क्वाथ), शीत (हिम) और फाण्ट पाँच प्रकार की कषाय कल्पनाएँ होती हैं।
- तेषां यथापूर्वम् बलाधिक्यम् अतः कषायकल्पना व्याध्यातुरबलापेक्षिणी न त्वेवं खलु सर्वाणि सर्वत्रोपयोगिनी भवन्ति ॥ (चरकसंहिता, सूत्रस्थान 4/7)
अर्थात ये कषाय कल्पनाएँ यथापूर्व गुरु होती है, अतः इन कषाय कल्पनाओं का प्रयोग व्याधि एवं रोगी के बल पर निर्भर करता है, क्योंकि (because) पञ्चविध कषाय कल्पनाएँ सम्पूर्ण रोगों में समान रूप से उपयोगी नहीं होती है। इन मौलिक कल्पनाओं के अतिरिक्त अञ्जन, अवलेह, अणुतैल, उष्णोदक, खण्ड, गण्डूष, गुटिका, गुड, घृतपाक, तैलपाक, धूपन, धूमवर्ति, धूमपान, नवनीत, नस्य, आसव, अरिष्ट, मधु, सिक्थ तैल, शतधौत घृत, षडङ्गपानीय, सक्तु, सर्पिगुड, सहस्रधौत घृत आदि 128 कल्पनाओं का चरक संहिता में उल्लेख मिलता है।
सुश्रुत संहिता
[संपादित करें]सुश्रुत संहिता में 6 प्रकार की मौलिक कल्पनाएँ मानी है :
- क्षीरं रसः कल्कमथो कषायः शृतश्च शीतश्च तथैव फाण्टम्।
- कल्पाः षडेते खलु भेषजानां यथोत्तरं ते लघवः प्रदिष्टाः ।। (सुश्रुतसंहिता सूत्रस्थान 44/91)
अर्थात् क्षीर, स्वरस, कल्क, शृत (क्वाथ), शीत (हिम) और फाण्ट-इन छ: कल्पनाओं को आचार्य सुश्रुत ने मौलिक कल्पनाएँ माना है। इन कल्पनाओं के अतिरिक्त सुश्रुत संहिता में अञ्जन, अकृतयूष, अणु तैल, अयस्कृति, अवलेह, आलेप, इक्षुरस, नस्य, पानक, मधु, मन्थ, मस्तु, मासरस, मोदक, यवागू, लेह, लौहरजः, वटक, वर्ति, विलेपी, वेशवार, शष्कुली, षडङ्गपानीय, सक्तु आदि विविध कल्पनाओं का उल्लेख मिलता है। सुश्रुत संहिता के चिकित्सा स्थान के चतुर्थ अध्याय में वातरोगों में शतपाकी एवं सहस्रपाकी तैल कल्पना एवं लवण कल्पों का प्रयोग बताया गया है। इसके अतिरिक्त गुग्गुल कल्प, अयस्कृति कल्पना, मसी कल्पना तथा क्षारसूत्र कल्पना का सर्वप्रथम वर्णन मिलता है।
काश्यप संहिता
[संपादित करें]- चूर्णं शीतकषायश्च स्वरसोऽभिषवस्तथा।
- फाण्टःकल्कस्तथा क्वाथो यथावतं निबोध मे॥ (काश्यपसंहिता खि० 3/35)
अर्थात् आचार्य काश्यप ने चूर्ण, शीत, स्वरस, अभिषव, फाण्ट, कल्क और क्वाथ-इन सात को मौलिक कल्पनाएँ माना है। जिनमें चूर्ण एवं अभिषव कल्पनाओं का पञ्चविध कषाय कल्पना में समावेश हो जाता है। अतः आचार्य चरकोक्त पञ्चविधकषाय कल्पनाएँ ही मौलिक कषाय कल्पनाएँ होती हैं। इनके अतिरिक्त धूपन, लेह, घृत, तैल, अरिष्ट, गुड़, रसक्रिया, बस्ति, अञ्जन, गुटिका, चूर्ण, पुष्प आदि कषाय कल्पनाओं का काश्यप संहिता में उल्लेख मिलता है। काश्यप संहिता के खिलस्थान में यूषों का विस्तार से वर्णन किया गया है।
अष्टाङ्गसंग्रहः व अष्टाङ्गहृदय
[संपादित करें]आचार्य वाग्भट द्वारा विरचित इन दोनों ग्रन्थों में पञ्चविध कषाय कल्पनाओं को ही मौलिक कल्पनाएँ मानी है।
- पञ्चविधस्तु भेषजानां कषायकल्पः ।
- निर्यासः कल्को नियूहः शीत: फाण्टश्च । ते यथापूर्वं बलिनः (अष्टाङ्गसंग्रह क० 8/9)
दोनों ही ग्रन्थों में स्वरस, कल्क, क्वाथ, हिम और फाण्ट-इन पञ्चविध कषाय कल्पनाओं का उल्लेख मिलता है। इनके अतिरिक्त अन्य अनेक कल्पनाएँ यथा:-अञ्जन, अणुतैल, अवलेह, आश्च्योतन, इक्षुरस, उष्णोदक, ओदन, कवल, प्रसेक, फाणित, शतधौत घृत, शष्कुली, शिरोबस्ति, सक्तु, सर्पिगुड आदि विविध कल्पनाओं का उल्लेख मिलता है।
मध्यकाल या रसशास्त्रीय काल
[संपादित करें]संहिता काल के पश्चात् रसाचार्य नागार्जुन द्वितीय ने अपने ग्रन्थों रसेन्द्र मंगल, रसरत्नाकर, कक्षपुट आदि में खनिजों पर अनेक धातुवादात्मक क्रियाओं का वर्णन किया है। इस काल में खनिज द्रव्यों की भैषज्य कल्पना का विकास हुआ।, जिसमें खनिज द्रव्यों का शोधन, मारण, सत्त्वपातन, द्रुति, पारद के विभिन्न संस्कार तथा अनेक औषधीय कल्पनाओं का विकास हुआ। इस काल में चिकित्सा की दृष्टि से खनिज द्रव्यों की भस्में, सत्त्वपातन, द्रुति, सत्त्व भस्म, रससिन्दूर आदि कूपीपक्व रसायनों का निर्माण प्रारम्भ हो गया था। रसौषधियों के शीघ्रप्रभावकारी, अल्पमात्रा में उपयोगी आदि गुणों के कारण रस चिकित्सा को श्रेष्ठ माना जाने लगा।
चक्रदत्त (11 वीं शताब्दी)
[संपादित करें]आचार्य चक्रपाणि द्वारा लिखित इस ग्रन्थ में पर्पटी कल्पना का सर्वप्रथम वर्णन प्राप्त होता है। चिकित्सा की दृष्टि से यह ग्रन्थ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इस ग्रन्थ में अवलेह, ओदन, कल्क, क्वाथ, क्षार, खण्ड, गुडपाक, चूर्ण, तैलपाक, अगद, अञ्जन, अर्कलवण, आश्च्योतन, कवल, काम्बलिक, क्षार सूत्र, क्षारगुड़, खड्यूष , गण्डूष, गुटिका, घृतपाक, तक्र, प्रमथ्या, फाणित, मन्थ, अरिष्ट, चुक्र, मांसरस, यूष, रसाला, रसक्रिया, वटिका, वर्ति, वेशवार, शिण्डाकी, स्वरस आदि कल्पनाओं का उल्लेख मिलता है।
गद निग्रह
[संपादित करें]आचार्य सोढ़ल द्वारा 12 वीं शताब्दी में विरचित इस ग्रन्थ में तैलाधिकार, घृताधिकर, चूर्णाधिकार, लेहाधिकार, आसवाधिकार कल्पना विषयक विस्तृत वर्णन मिलता है। 12वीं शताब्दी में मुस्लिमों के आक्रमण के पश्चात् यूनानी चिकित्सा प्रणाली का आगमन हमारे देश में हुआ, जिसके फलस्वरूप अर्क, खमीरा, गुलकन्द आदि का प्रचुरता से प्रयोग आयुर्वेद चिकित्सा में होने लगा। इसी काल में रचित ग्रन्थ अर्क प्रकाश में अर्क कल्पना का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है।
शार्ङ्गधर संहिता
[संपादित करें]आचार्य शार्ङ्गधर मिश्र द्वारा 14 वी शताब्दी में इस ग्रन्थ को लिखा गया है। यह ग्रन्थ भैषज्य कल्पना का आधार स्तम्भ माना जाता है। इस ग्रन्थ के मध्यम खण्ड में स्वरस, क्वाथ, फाण्ट, हिम, कल्क, चूर्ण, वटक, अवलेह, घृत, तैल, आसवारिष्ट आदि का वर्णन किया गया है। इनके अतिरिक्त अञ्जन, अवगाहन, अनुवासनबस्ति, अवपीडन, आश्च्योतन, उष्णोदक, उत्तरबस्ति, ओदन, कर्णपूरण, लेप, वर्ति, विलेपी, षडङ्गपानीय, सक्तु, सेक आदि कल्पनाओं का वर्णन मिलता है।
आधुनिक काल
[संपादित करें]16वीं शताब्दी के पश्चात् आधुनिक काल माना जाता है। इस काल में भावप्रकाश, बृहद्योगतरंगिणी, योगरत्नाकर, भैषज्यरत्नावली, सिद्धभेषजमणिमाला, रसतन्त्रसार एवं सिद्ध प्रयोग संग्रह, भारत भैषज्य रत्नाकर, सिद्धयोगसंग्रह, आयुर्वेदसार संग्रह आदि ग्रन्थ लिखे गए है। इन सभी ग्रन्थों में चूर्ण, क्वाथ, आसव, अरिष्ट, घृत, तैल, अवलेह आदि पूर्ववर्ती सभी कल्पनायें उल्लिखित है। भारतभैषज्यरत्नाकर भैषज्यकल्पना का बृहद् ग्रन्थ है, जो पाँच भागों में प्रकाशित है तथा इसमें अकारादि क्रम से औषधयोगों का वर्णन संग्रहित रूप में किया गया है। भारतीय आयुर्वेद योग संग्रह (Ayurvedic formulary of India-A.E.I) भारत सरकार द्वारा प्रकाशित ग्रन्थ है, जिसमें कल्पनाओं के अनुसार प्रधान योगों का वर्णन किया गया है। यह अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भाषाओं में प्रकाशित है। गुजरात सरकार द्वारा भी भेषज संहिता प्रकाशित की गई है। वर्तमान में औषधिनिर्माता कम्पनियाँ विभिन्न प्रकार के चूर्ण, वटी, कैप्सूल, अवलेह, ग्रेन्यूल्स, तैल, घृत, आसवारिष्ट, ड्राप्स, आदि कल्पनाओं को वर्तमान समय के अनुसार निर्माण कर विक्रय कर रही है। अतः यह कहा जा सकता है कि प्राचीनकाल में पञ्चविध मौलिक कषाय कल्पनाओं का प्रादुर्भाव हुआ था। लेकिन बाद में धीरे-धीरे अन्य कल्पनाओं का विकास होता गया। वर्तमान काल में भैषज्य कल्पना का विकसित स्वरूप दिखाई दे रहा है।
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ "संग्रहीत प्रति". मूल से से 22 दिसंबर 2015 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 13 दिसंबर 2015.
- ↑ आयुर्वेदिक भेषज कल्पना का विकास
- ↑ भैषज्यकल्पना का ऐतिहासिक विकास
इन्हें भी देखें
[संपादित करें]बाहरी कड़ियाँ
[संपादित करें]- भैषज्य कल्पना कोश (अमिधा आयुर्वेद)
- भैषज्य कल्पना के मूल सिद्धान्त
- A Text Book Of Bhaisjya Kalpana Vijnanam (By Dr. G. Prabhakara Rao)
- Basic Principles Of Bhaishyajya Kalpna
- भैषज्य संहिता (लेखक- अत्रिदेव विद्यालंकार)
- रसायनसार, भाग-१ (लेखक- पण्डित श्यामसुन्दराचार्य वैश्य)