भूमिहार

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भूमिहार या भूइंहार या बाभन भारतीय जाति ब्राह्मण[कृपया उद्धरण जोड़ें] की है, जो उत्तर प्रदेश, बिहार एवं बहुत थोड़ी संख्या में अन्य प्रदेशों में निवास करती है।[कृपया उद्धरण जोड़ें] भूमिहार भगवान परशुराम को प्राचीन समय से अपना गुरु मानते है। भूमिहार नया नाम है जो भिन्न भिन्न प्रांतो के अयाचक ब्राह्मणो को जातीय रूप से एक करने कि लिये है प्राचीन नाम उत्तरप्रदेश के पुरवी भाग मे भुइंहार ब्राह्मण है सामान्यत: अन्य जातीयां भुइंहार कह कर बुलाती है | और यहा निवास करने वाले सरयूपारी ब्राह्मण आदि भुइंहारो की उतपत्ती परशुराम द्वारा इस क्षेत्र के ब्राह्मणो को जाती भेद से उतपन्न मानते है व अधिकांश सरयूपारी लोग सम्मान भी करते है ब्राह्मण समाज का ही अंग भुइंहारो को मानते है बिहार के मगध मे प्राचीन नाम बाभन है स्थानीय अन्य जातीयां यहा बाभन कह कर बुलाती है | बाभन शब्द का अर्थ ब्राह्मण ही होता है मगध मे बाभन अयाचक ब्राह्मणो को ही केवल कहते है | बाभनो की संख्या भुइंहार ब्राह्मणो से काफी ज्यादा है | बिहार के अंग प्रदेश वैशाली मे अयाचक ब्राह्मणो को भुन्झार भी स्थानीय अन्य जातीयां कहती है | भुइंहार ब्राह्मण बिहार मे नही होते है कुछ भोजपुरी भाषी बिहार के जिले बेतिया व बकसर मे है | उत्तरप्रदेश मे भुइंहार ब्राह्मण बस्ती जिले लेकर बलिया तक और सिधार्थ नगर से लेकर वाराणसी तक है प्रयाग मे अयाचक ब्राह्मणो को सिर्फ जमींदार या जमींदार ब्राह्मण ही कहते है जहा भूमिहार सभा द्वारा भूमिहार नाम प्रचलित हुआ | पश्चिमी उत्तरप्रदेश मे तगा कहलाने वाले अयाचक ब्राह्मण है | इन सभी प्रांतो के अयाचक ब्राह्मणो मे भूमिहार ब्राह्मण महासभा के गठन के बाद भूमिहार शब्द का प्रयोग होने लगा | चूकि मगध मे अयाचक ब्राह्मणो बाभनो की संख्या काफी ज्यादा है अत वहा भूमिहार प्रबल है फिर बाभनो के बाद भुइंहार ब्राह्मणो की संख्या उत्तरप्रदेश के पुरवांचल मे अच्छी है तो यहा भी भूमिहार नाम प्रचलित है | फिर मेरठ आदी जगहो पर त्यागी ब्राह्मण की संख्या ठीक है वहां भूमिहार नाम प्रचलित हुआ भूमिहार ब्राह्मण सभा द्वारा बिहार के मिथिला क्षेत्र मे मैथिल ब्राह्मण जो अयाचक ब्राह्मणो को पछिमा ब्राह्मण कहते है पछिमा ब्राह्मणो मे भी भी भूमिहार सभा द्वारा भूमिहार नाम प्रचलित हुआ है| |[कृपया उद्धरण जोड़ें] भूमिहार (भुइंहार) उत्तरप्रदेश के गाजीपुर व आजमगढ़़ जिले मे सबसे ज्यादा है|[कृपया उद्धरण जोड़ें] कई भुइंहारो का मूल स्थान गाजीपुर और आजमगढ़ जिले मे है व भूमिहार (बाभन) बिहार के सारण , मुज्फफरपुर व बेगुसराय जिले मे सबसे जादा है तथा अलग अलग गोत्रो के बाभनो का मुल यही क्षेत्र है |[कृपया उद्धरण जोड़ें]

पाण्डेय, तिवारी, त्रिपाठी, मिश्र, शुक्ल, उपाध्यय, शर्मा, पाठक दूबे, द्विवेदी भूमिहार समाज की उपाधियाँ है, इसके अलावा राजपाठ और ज़मींदारी के कारण एक बड़ा भाग भूमिहार का राय, शाही, सिंह, उत्तर प्रदेश में और राय, शाही, सिंह (सिन्हा), चौधरी, ठाकुर बिहार में होते है।[कृपया उद्धरण जोड़ें] त्यागी दिल्ली व आसपास के भू-भाग में होते है। अयाचक ब्राह्मणो की ब्राह्मण से भिन्न उपाधीयो के कारण कभी कभी अन्य जातीयां उन्हे ब्राह्मण नही समझ पाती है |[कृपया उद्धरण जोड़ें] अयाचक ब्राह्मणो के अलावा अन्य समुदाय भी ये उपनाम प्रयोग करते हैं | परन्तु भूमि आदि से संबंधित कार्य या अन्य कारणो से यह उपाधीयां अयाचक ब्राह्मणो मे है जैसे तिवारी कर्म है जिसका का अर्थ है वह ब्राह्मण जो श्राद्ध अतेष्ठि के बाद मे दान लेते थे पांडे का अर्थ पंडित ज्ञानी विद्वान है राय का अर्थ , राज्य से संबंधित , राजपुरूष , नीती , बुद्धि विचार आदि से है सिंह का अर्थ सिंह की शक्ति वाला राजा आदि से है | ठाकुर का अर्थ रक्षा करने वाला , स्वामी आदि है | चौधरी का अर्थ अधिकार रखने वाला अधिकारी आदि है | त्यागी का अर्थ त्याग करने वाला से है | राय सिंह चौधरी ठाकुर आदी उपाधीयां ईन्ही कारणो से अयाचक ब्राह्मणो मे प्रचलित हो गयी जो कि क्षत्रियो या अन्य जातीयों मे भी कारण वश प्रचलित होगयी | परन्तु मुल उपाधीयां तिवारी पांडे आदि भी है अयाचक ब्राह्मणो मे है जो पहले उन कर्मो के कारण थी हालांकि तिवारी पांडे आदि कर्म ब्राह्मणो के अलावा और कोई नही कर सकता इस लिये ये उपाधींया ब्राह्मणों के अलावा अन्य किसी जाती मे भी नही है भुइंहार ब्राह्मणो मे सिंह का प्रयोग केवल वाराणसी के भुइंहार और शाही केवल देवरिया मे कुछ भुइंहार करते है | ब्राह्मण यज्ञोपवित के बाद शर्मा कहलाने का अधिकारी हो जाता है | सन १८८५ में अयाचक ब्राह्मणो की महासभा की स्थापना भुइंहार ब्राह्मण द्विजराज काशी नरेश के प्रयास से वाराणसी में हुई.इसी सभा में पुरवांचल के भुइंहार ब्राह्मण , मगध के बाभनो,मिथिलांचल के पश्चिमा , प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण और पंडा ,मेरठ के तगा ब्राह्मण और अन्य भुइंहार ब्राह्मणों से सम्बन्धित ब्राह्मणों को अयाचक ब्राह्मण संगठन में सम्मिलित किया गया व काशीनरेश द्वारा एक समिति गठित की गयी समिति के सात वर्षो के प्रयास के बाद भूमिहार ब्राह्मण शब्द पर सहमति बनी व भूमिहार ब्राह्मण सभा अस्तित्व मे आयी थी | [1][मृत कड़ियाँ]

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सन्दर्भ[संपादित करें]