भूमिहार

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त्यागी अर्थात भूमिहार आदि ब्रह्मऋषि वंशज यानि अयाचक ब्राह्मणों को सम्पूर्ण भारतवर्ष में विभिन्न उपनामों जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, दिल्ली, हरियाणा व राजस्थान के कुछ भागों में त्यागी, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार व बंगाल में भूमिहार, जम्मू कश्मीर, पंजाब व हरियाणा के कुछ भागों में महियाल, मध्य प्रदेश व राजस्थान में गालव, गुजरात में अनाविल, महाराष्ट्र में चितपावन एवं कार्वे, कर्नाटक में अयंगर एवं हेगडे, केरल में नम्बूदरीपाद, तमिलनाडु में अयंगर एवं अय्यर, आंध्र प्रदेश में नियोगी एवं राव तथा उड़ीसा में मिश्र आदि उपनामों से जाना जाता है।

उत्तरप्रदेश के  आजमगढ़ , गाजीपुर , गोरखपुर जिले के भुइंहार ब्राह्मण , तथा उत्तरप्रदेश के मेरठ , मुजफ्फरनगर , अमरोहा के तगा ब्राह्मण तथा मगध बिहार के बाभन अपने को भूमिहार ब्राह्मण मानते है यह भूमिहार शब्द 19 सदी मे अस्तित्व मे आया | ब्राह्मणो मे भुइंहार  वह ब्राह्मण माने जाते है जिन्हे क्षत्रियो के संहार के बाद परशुराम द्वारा दान की हुयी भूमि मिली |


1891 की भारतीय जनगणना रिपोर्ट के अनुसार भुइंहार ब्राह्मणो की आबादी जो संयुक्त प्रान्त ( उत्तरप्रदेश तथा उत्तराखण्ड ) के पुर्वी जिलो मे होते है आजमगढ़ मे 61425 , गाजीपुर मे 54606 , गोरखपुर मे 31202 , बलिया मे 25777 ,बनारस मे 21272 , बस्ती मे 12744 , मिर्जापुर मे 9385 , जौनपुर मे 4208 , फैजाबाद मे 124 , प्रतापगढ़ मे 112 , लखनऊ मे 8 5, गोंडा मे 1 , बुलंदशहर मे 1 कुल आबादी 221027 है व 1872 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार बाभनो की बंगाल प्रांत ( बिहार , झारखण्ड , बंगाल , बंग्लादेश ) के पटना मे 116711 , गया मे 16244 , शहादाबाद मे 12104 , तिरहुत मे 213272 , सारण मे 92641 , चम्पारण मे 100974 , भागलपुर 30704 , सांथलपरगना 102 , पुरनियाह 6635 , हजारिबाग मे 6545 , लोहरदगा मे 5700 थी | तगा ब्राह्मण की जनसंख्या संयुक्त प्रांत के पश्चिमी जिलो मे है | बाभन ब्राह्मणो मे भुइंहार शब्द प्रचलित ना था व भुइंहारो मे तगा शब्द प्रचलित न था ,उत्तरप्रदेश मे पुरवी जिलो के भुइंहार ब्राह्मण , प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण , पश्चिमी जिलों के तगा ब्राह्मण तथा बिहार मे मगध के बाभन , तिरहुत के पश्चिमा बाभनो मे भूमिहार ब्राह्मण शब्द प्रचलित हुआ क्योकि इन ब्राह्मण समुहो मे आपस मे विवाह खानपान आदि होते थे |इन क्षेत्रो के अयाचक ब्राह्मणो को अपनी जातीय सभा गठित करने की जरूरत महसूस होने पर भूमिहार ब्राह्मण शब्द अस्तित्व मे आया | भुइयान तथा भूमिज नामक जनजातीया जो आसाम मे होती है भुइंहारी जमीनी अधिकार के रूप मे भुइंहार उपाधि प्रयोग करती है झारखण्ड तथा छत्तिसगढ़ के कुछ इलाको मे पाये जाने वाली भुंइया नामक आदिवासी जाती भी भुइंहार उपाधि का प्रयोग करती है भुइंहार उपाधि प्रयोग करने वाले भुइंया कबीले की आबादी 1891 की जनगणना मे 1000 बताई गई है अंग्रेज विद्वान बायल्स के अनुसार भुइंया आदिवासी पृ्थ्वी पर ग्यात सबसे बदसूरत लोग है भुइंयार नामक जाती जो मिर्जापुर के दक्षिणी जंगली पहाड़ीयों मे व उत्तराखण्ड उतरप्रदेश हरियाणा मे कुछ जगहो पर है उत्तरप्रदेश के पुर्वी जिलों के शुद्ध सुंदर मजबूत कदकाठी के आर्य लक्षणों से युक्त भुइंहार ब्राह्मण और इन सब जातीयों जनजातीयों में भ्रम कि स्थिति न हो इसलिये अंग्रेजो ने अपनी जनगणना रिपोर्ट मे इसका अच्छा विवरण दिया है | अंग्रेजो ने जब सामाजिक स्तर का अध्य्यन किया तो पाया कि भुइंहार ब्राह्मणो कि अयाचक ब्राह्मणो के इन समुहो कि अपेक्षा ज्यादा प्रतिष्ठा है व जैसे जैसे पुर्व कि तरफ बढ़ने पर बाभनो कि प्रतिष्ठा ब्राह्मणो के रूप मे प्रतिष्ठा कम होती जाती है तगा ब्राह्मण ,भुइंहार ब्राह्मण , बाभन मे सामाजिक अस्तर पर भुइंहार ही सबसे प्रतिष्ठित ब्राह्मण होते है | स्वंय १९ सदी मे नवीन अपनाये गये भूमिहार ब्राह्मण शब्द से ही इस आशय को समझा जा सकता है |


अयाचक ब्राह्मण अपने विभिन्न नामों के साथ भिन्न भिन्न क्षेत्रों में अभी तक तो अधिकतर कृषि कार्य करते थे, लेकिन पिछले कुछ समय से विभिन्न क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। अयाचक ब्राह्मणों की उत्पत्ति:- हमारे देश आर्यावर्त में 7200 विक्रमसम्वत् पूर्व देश, धर्म व संस्कृति की रक्षा हेतु एक विराट युद्ध सहस्रबाहु सहित समस्त आर्यावर्त के 21 राज्यों के क्षत्रिय राजाओ के विरूद्ध हुआ, जिसका नेतृत्व ऋषि जमदग्नि के पुत्र ब्रह्मऋषि भगवान परशुराम ने किया, इस युद्ध में आर्यावर्त के अधिकतर ब्राह्मणों ने भाग लिया और इस युद्ध में भगवान परशुराम की विजय हुई तथा इस युद्ध के उपरान्त अधिकतर ब्राह्मण अपना धर्मशास्त्र एवं ज्योतिषादि का कार्य त्यागकर समय-समय पर कृषि क्षेत्र में संलग्न होते गये, जिन्हे अयाचक ब्राह्मण व खांडवायन कहा जाने लगा जोकि कालान्तर में त्यागी, भूमिहार, महियाल, गालव, चितपावन, नम्बूदरीपाद, नियोगी, अनाविल, कार्वे, राव, हेगडे, अयंगर एवं अय्यर आदि कई अन्य उपनामों से पहचाने जाने लगे।


भूमिहार या ब्राह्मण (अयाचक ब्राह्मण) एक ऐसी सवर्ण जाति है जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है। बिहार, पश्चिचमी उत्तर प्रदेश एवं झारखण्ड में निवास करने वाले भूमिहार जाति अर्थात अयाचक ब्रहामणों को त्यागी नाम की उप-जाति से जाना व पहचाना जाता हैं। मगध के महान पुष्य मित्र शुंग और कण्व वंश दोनों ही ब्राह्मण राजवंश भूमिहार ब्राह्मण (बाभन) के थे भूमिहार ब्राह्मण भगवन परशुराम को प्राचीन समय से अपना मूल पुरुष और कुल गुरु मानते है

भूमिहार ब्राह्मण समाज में उपाधिय है १-पाण्डेय 2-तिवारी/त्रिपाठी 3- मिश्र 4-शुक्ल 7-उपाध्यय 8-शर्मा 9-ओझा 10-दुबे\द्विवेदी इसके अलावा राजपाट और ज़मींदारी के कारन एक बड़ा भाग भूमिहार ब्राह्मण का राय ,शाही ,सिंह, उत्तर प्रदेश में और शाही , सिंह (सिन्हा) , चौधरी ,ठाकुर बिहार में लिखने लगा बहुत से भूमिहार या बाभन भी लिखते है

राज पाट ०१-बनारस का साम्राज्य ०२. बेतिया राज यह बिहार की दूसरी सबसे बड़ी जमींदारी थी इसका भूभाग eighteen hundred square मिल्स पर नियंत्रण ०३. टिकारी राज 2,०४६ और गाँव 7,500 km. के बड़े भूभाग पर नियंत्रण ०४. हथुआ राज 1,३६५ गाँव पर और एक बड़े भूभाग पर नियंत्रण ०५. तमकुही राज ०६. अनापुर राज ०७. अमावा राज ०८. बभनगावां राज ०९. भरतपुरा राज १०. धरहरा राज ११. शिवहर राज १२. मकसुदपुर राज १३. औसानगंज राज इसके अलावा ये भी स्व न्रियांत्रित जागीरे थी नरहन स्टेट जोगनी एस्टेट पर्सागढ़ एस्टेट (छपरा ) गोरिया कोठी एस्टेट (सिवान ) रूपवाली एस्टेट जैतपुर एस्टेट हरदी एस्टेट ऐनखाओं जमींदारी ऐशगंज जमींदारी भेलावर गढ़ आगापुर स्टेट पैनाल गढ़ लट्टा गढ़ कयाल गढ़ रामनगर जमींदारी रोहुआ एस्टेट राजगोला जमींदारी पंडुई राज केवटगामा जमींदारी घोसी एस्टेट परिहंस एस्टेट धरहरा एस्टेट रंधर एस्टेट अनापुर एस्टेट ( इलाहाबाद) चैनपुर मंझा मकसूदपुर रुसी खैरअ मधुबनी नवगढ़ – भूमिहार से सम्बंधित है असुराह एस्टेट कयाल औरंगाबाद में बाबु अमौना तिलकपुर ,शेखपुरा स्टेट जहानाबाद में तुरुक तेलपा स्टेट क्षेओतर गया बारों एस्टेट (इलाहाबाद) पिपरा कोय्ही एस्टेट (मोतिहारी) और भी बहुत सारे पूरी जानकारी उपस्थित नही है चौधरी निहाल सिंह त्यागी जी गाव कुतबपुर जिला मुज़फ्फर नगर (उ.प ) के निवासी थे उनका शिक्षा के क्षेत्र,स्वतंत्रता आंदोलन एवम् सामाजिक गतिविधयो बहुत बङा योगदान रहा उन्होने बरला इंटर कालेज बरला ,डी.ए.वी इंटर कालेज मुज़फ्फर नगर, जय हिंद इंटर कालेज छपार ,रासना,बरनावा,कैथवाडी,चुङियाला इंटर कालेज मै आपना ,तन ,मन धन से बहुत सहयोग किया आप ने त्यागी आश्रम हरिद्वार ,शुकताल,मेरठ मे त्यागी छात्रावास मे आपना तन ,मन.धन से बहुत सहयोग किया आपको ३६ बिरादरी ने सभा कर चौधरी पद से सम्मानित किया आप ने विनोबा भावे के भू-दान आन्दौलन मै भूमि दान मे दी आपने सर्व समाज की सेवा की आपको रहीस की पदवी से भी सम्मानित किया गया माहत्मा गांधी जी ,स्वामी विवेकानन्द जी स्वामी सहजानन्द सरस्वती ,सुभाष चन्द बोस जी के काफी निकट के सहयोगी रहे बाबा जी इन लोगो से काफी प्रभावित रहे स्वत्रन्ता आन्दोलन मे मात्र 12 वर्ष की आयु मे अपने सपुत्र चौधरी विष्णु दत त्यागी जी को जेल भेज दिया था ओर स्वंय आजादी की लडाई लडने के लिए जनता को जागरूक कर रहे थे इस ऩिर्नय से आन्दोलन को बहुत बडा बल मिला था अक्टूबर 1890 – 30 जनवरी, 1948) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत की राजनीतिक और वैचारिक प्रमुख सामािजक नेता थे भारत को अपने नागरिक अधिकारों और दुनिया भर में स्वतंत्रता के लिए स्वतंत्रता और प्रेरित आंदोलनों का नेतृत्व किया उन का कहना था .जंज़ीरें, जंज़ीरें ही हैं, चाहे वे लोहे की हों या सोने की, वे समान रूप से तुम्हें गुलाम बनाती हैं। चौधरी निहाल सिंह त्यागी जी हमेशा यही कहते थे,नेकी से विमुख हो जाना और बदी करना नि:संदेह बुरा है, मगर सामने हँस कर बोलना और पीछे चुगलखोरी करना उससे भी बुरा है। चौधरी निहाल सिंह त्यागी जी २१ दिस.१९८०मै भगवान जी के श्री चरणो लीन हो गये उन के बडे सपुत्र चौधरी विष्णु दत त्यागी जी स्वत्रन्ता सैनानी (सस्थापक वीतराग स्वामी कल्याण देव डिग्री कालेज बरला श्री शिव कुमार त्यागी जी एडवोकेट पूर्व प्रबन्धक बरला इण्टर कालेज बरला दोनो भगवान जी के श्री चरणो लीन हो गये है अब चौधरी यज्ञदत त्यागी जी उन के बताए रास्ते पर चलकर समाज की सेवा कर रहे है चौधरी यज्ञदत त्यागी जी सादा- जीवन उच्च विचार रखते हे और समाज सेवा मे आग़णी रहते है चौधरी निहाल सिंह त्यागी जी को चौधरी यज्ञदत त्यागी जी एवम् उन के परिवार की उन प्रति ये ही सच्ची श्रद्धांजलि है की उऩ के बताये मार्ग पर आज भी चल रहे ह

भूमिहार ब्राह्मण की उत्पति
भूमिहार ब्राह्मण भगवन परशुराम को प्राचीन समय से अपना मूल पुरुष और कुल गुरु मानते है
१. एम.ए. शेरिंग ने १८७२ में अपनी पुस्तक Hindu Tribes & Cast में कहा है कि, “भूमिहार जाति के लोग हथियार उठाने वाले ब्राहमण हैं (सैनिक ब्राह्मण)।”

२. अंग्रेज विद्वान मि. बीन्स ने लिखा है – “भूमिहार एक अच्छी किस्म की बहादुर प्रजाति है, जिसमे आर्य जाति की सभी विशिष्टताएं विद्यमान है। ये स्वाभाव से निर्भीक व हावी होने वालें होते हैं।” ३. पंडित अयोध्या प्रसाद ने अपनी पुस्तक “वप्रोत्तम परिचय” में भूमिहार को- भूमि की माला या शोभा बढ़ाने वाला, अपने महत्वपूर्ण गुणों तथा लोकहितकारी कार्यों से भूमंडल को शुशोभित करने वाला, समाज के हृदयस्थल पर सदा विराजमान- सर्वप्रिय ब्राह्मण कहा है।

४. विद्वान योगेन्द्र नाथ भट्टाचार्य ने अपनी पुस्तक हिन्दू कास्ट & सेक्ट्स में लिखा है की भूमिहार ब्राह्मण की सामाजिक स्थिति का पता उनके नाम से ही लग जाता है, जिसका अर्थ है भूमिग्राही ब्राह्मण। पंडित नागानंद वात्स्यायन द्वारा लिखी गई पुस्तक – ” भूमिहार ब्राह्मण इतिहास के दर्पण में ”
” भूमिहारो का संगठन जाति के रूप में ”

भूमिहार ब्राह्मण जाति ब्राह्मणों के विभिन्न भेदों और शाखाओं के अयाचक लोगो का एक संगठन ही है. प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगो को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया,उसके बाद सारस्वत,महियल,सरयूपारी,मैथिल,चितपावन,कन्नड़ आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगो से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए.मगध के ब्राह्मण और मिथिलांचल के पश्चिम तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहारगाँव में ही सम्मिलित होते गए. भूमिहार ब्राह्मण के कुछ मूलों ( कूरी ) के लोगो का भूमिहार ब्राह्मण में संगठित होने की एक सूची यहाँ दी जा रही है : १. कान्यकुब्ज शाखा से :- दोनवार ,सकरवार,किन्वार, ततिहा , ननहुलिया, वंशवार के तिवारी, कुढ़ानिया, दसिकर, आदि. २. सरयूपारी शाखा से : – गौतम, कोल्हा (कश्यप), नैनीजोर के तिवारी , पूसारोड (दरभंगा) खीरी से आये पराशर गोत्री पांडे, मुजफ्फरपुर में मथुरापुर के गर्ग गोत्री शुक्ल, गाजीपुर के भारद्वाजी, मचियाओं और खोर के पांडे, म्लाओं के सांकृत गोत्री पांडे, इलाहबाद के वत्स गोत्री गाना मिश्र ,आदि. ३. मैथिल शाखा से : – मैथिल शाखा से बिहार में बसने वाले कई मूल के भूमिहार ब्राह्मण आये हैं.इनमे सवर्ण गोत्री बेमुवार और शांडिल्य गोत्री दिघवय – दिघ्वैत और दिघ्वय संदलपुर प्रमुख है. ४. महियालो से : – महियालो की बाली शाखा के पराशर गोत्री ब्राह्मण पंडित जगनाथ दीक्षित छपरा (बिहार) में एकसार स्थान पर बस गए. एकसार में प्रथम वास करने से वैशाली, मुजफ्फरपुर, चैनपुर, समस्तीपुर, छपरा, परसगढ़, सुरसंड, गौरैया कोठी, गमिरार, बहलालपुर , आदि गाँव में बसे हुए पराशर गोत्री एक्सरिया मूल के भूमिहार ब्राह्मण हो गए. ५. चित्पावन से : – न्याय भट्ट नामक चितपावन ब्राह्मण सपरिवार श्राध हेतु गया कभी पूर्व काल में आये थे.अयाचक ब्रह्मण होने से इन्होने अपनी पोती का विवाह मगध के इक्किल परगने में वत्स गोत्री दोनवार के पुत्र उदय भान पांडे से कर दिया और भूमिहार ब्राह्मण हो गए.पटना डाल्टनगंज रोड पर धरहरा,भरतपुर आदि कई गाँव में तथा दुमका,भोजपुर,रोहतास के कई गाँव में ये चित्पवानिया मूल के कौन्डिल्य गोत्री अथर्व भूमिहार ब्राह्मण रहते हैं

१. सर्वप्रथम १८८५ में ऋषिकुल भूषण काशी नरेश महाराज श्री इश्वरी प्रसाद सिंह जी ने वाराणसी में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा की स्थापना की.

२. १८८५ में अखिल भारतीय त्यागी महासभा की स्थापना मेरठ में हुई. ३. १८९० में मोहियल सभा की स्थापना हुई. ४. १९१३ में स्वामी सहजानंद जी ने बलिया में आयोजित

५. १९२६ में पटना में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा का अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता चौधरी रघुवीर नारायण सिंह त्यागी ने की.

६. १९२७ में प्रथम याचक ब्राह्मण सम्मलेन की अध्यक्षता सर गणेश दत्त ने की. ७. १९२७ में मेरठ में ही अखिल भारतीय त्यागी महासभा की अध्यक्षता राय बहादुर जगदेव राय ने की. ८. १९२६-२७ में अपने अधिवेशन में कान्यकुब्ज ब्राह्मणों ने प्रस्ताव पारित कर भूमिहार ब्राह्मणों को अपना अंग घोषित करते हुए अपने समाज के गठन में सम्मलित होने का निमंत्रण दिया. ९. १९२९ में सारस्वत ब्राह्मण महासभा ने भूमिहार ब्राह्मणों को अपना अंग मानते हुए अनेक प्रतिनिधियों को अपने संगठन का सदस्य बनाया. १०. १९४५ में बेतिया (बिहार) में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासम्मेलन हुआ जिसकी अध्यक्षता डा.बी.एस.पूंजे (चित्पावन ब्राह्मण) ने की. ११. १९६८ में श्री सूर्य नारायण सिंह (बनारस ) के प्रयास से ब्रहामर्शी सेवा समिति का गठन हुआ.और इश वर्ष रोहनिया में एक अधिवेशन पंडित अनंत शास्त्री फडके (चित्पावन ) की अध्यक्षता में हुआ. १२. १९७५ में लक्नाऊ में भूमेश्वर समाज तथा कानपूर में भूमिहार ब्राह्मण समाज की स्थापना हुई. १३. १९७९ में अखिल भारतीय ब्रह्मर्षि परिषद् का गठन हुआ. १४. ८ मार्च १९८१ गोरखपुर में भूमिहार ब्राह्मण समाज का गठन

१५. २३ अक्टूबर १९८४ में गाजीपुर में प्रांतीय भुमेश्वर समाज का अधिवेशन जिसकी अध्यक्षता श्री मथुरा राय ने की.डा.रघुनाथ सिंह जी ने इस सम्मलेन का उदघाटन किया.

१६. १८८९ में अल्लाहाबाद में भूमेश्वर समाज की स्थापना हुई. ” भूमिहार ” शब्द कहा और कबसे अस्तित्व में आया ? भूमिपति ब्राह्मणों के लिए पहले जमींदार ब्राह्मण शब्द का प्रयोग होता था..याचक ब्राह्मणों के एक दल ने ने विचार किया की जमींदार तो सभी जातियों को कह सकते हैं,फिर हममे और जमीन वाली जातियों में क्या फर्क रह जाएगा.काफी विचार विमर्श के बाद ” भूमिहार ” शब्द अस्तित्व में आया.” भूमिहार ब्राह्मण ” शब्द के प्रचलित होने की कथा भी बहुत रोचक है. बनारस के महाराज ईश्वरी प्रसाद सिंह ने १८८५ में बिहार और उत्तर प्रदेश के जमींदार ब्राह्मणों की एक सभा बुलाकर प्रस्ताव रखा की हमारी एक जातीय सभा होनी चाहिए.सभा बनाने के प्रश्न पर सभी सहमत थे.परन्तु सभा का नाम क्या हो इस पर बहुत ही विवाद उत्पन्न हो गया.मगध के बाभनो ने जिनके नेता स्व.कालीचरण सिंह जी थे ,सभा का नाम ” बाभन सभा ” करने का प्रस्ताव रखा.स्वयं महराज “भूमिहार ब्राह्मण सभा ” के पक्ष में थे.बैठक मैं आम राय नहीं बन पाई,अतः नाम पर विचार करने हेतु एक उपसमिति गठित की गई.सात वर्षो के बाद समिति की सिफारिश पर ” भूमिहार ब्राह्मण ” शब्द को स्वीकृत किया गया और साथ ही साथ इस शब्द के प्रचार व् प्रसार का काम भी हाथ में लिया गया.इसी वर्ष महाराज बनारस तथा स्व.लंगट सिंह जी के सहयोग से मुजफ्फरपुर में एक कालेज खोला गया.बाद में तिरहुत कमिश्नरी के कमिश्नर का नाम जोड़कर इसे जी.बी.बी. कालेज के नाम से पुकारा गया.आज वही कालेज लंगट सिंह कालेज के नाम से प्रसिद्द है. भूमिहार ब्राह्मणों के इतिहास को पढने से पता चलता है की अधिकांश समाजशास्त्रियों ने भूमिहार ब्राह्मणों को कान्यकुब्ज की शाखा माना है.भूमिहार ब्राह्मन का मूलस्थान मदारपुर है जो कानपुर – फरूखाबाद की सीमा पर बिल्हौर स्टेशन के पास है..१५२८ में बाबर ने मदारपुर पर अचानक आक्रमण कर दिया.इस भीषण युद्ध में वहा के ब्राह्मणों सहित सबलोग मार डाले गए.इस हत्याकांड से किसी प्रकार अनंतराम ब्राह्मण की पत्नी बच निकली थी जो बाद में एक बालक को जन्म दे कर इस लोक से चली गई.इस बालक का नाम गर्भू तेवारी रखा गया.गर्भू तेवारी के खानदान के लोग कान्यकुब्ज प्रदेश के अनेक गाँव में बसते है.कालांतर में इनके वंशज उत्तर प्रदेश तथा बिहार के विभिन्न गाँव में बस गए.गर्भू तेवारी के वंशज भूमिहार ब्रह्मण कहलाये .इनसे वैवाहिक संपर्क रखने वाले समस्त ब्राह्मण कालांतर में भूमिहार ब्राह्मण कहलाये

अंग्रेजो ने यहाँ के सामाजिक स्तर का गहन adhyayan कर अपने गजेतिअरों एवं अन्य पुस्तकों में भूमिहारो के उपवर्गों का उल्लेख किया है.gahadwal काल के बाद मुसलमानों से त्रस्त भूमिहार ब्राह्मन ने जब कान्यकुब्ज क्षेत्र से पूर्व की ओर पलायन प्रारंभ किया और अपनी सुविधानुसार यत्र तत्र बस गए तो अनेक उपवर्गों के नाम से संबोधित होने लगे,यथा – ड्रोनवार ,गौतम,कान्यकुब्ज,जेथारिया आदि.अनेक कारणों,अनेक रीतियों से उपवर्गों का नामकरण किया गया.कुछ लोगो ने अपने आदि पुरुष से अपना नामकरण किया और कुछ लोगो ने गोत्र से.कुछ का नामकरण उनके स्थान से हुवा जैसे – सोनभद्र नदी के किनारे रहने वालो का नाम सोन भरिया, सरस्वती नदी के किनारे वाले सर्वारिया,,सरयू नदी के पार वाले सरयूपारी,आदि.मूलडीह के नाम पर भी कुछ लोगो का नामकरण हुआ जैसे,जेथारिया,हीरापुर पण्डे,वेलौचे,मचैया पाण्डे,कुसुमि तेवरी,ब्र्हम्पुरिये ,दीक्षित ,जुझौतिया ,आदि
भूमिहार ब्राह्मण और सरयुपारिन ब्राह्मण
पिपरा के मिसिर ,सोहगौरा के तिवारी ,हिरापुरी पांडे, घोर्नर के तिवारी ,माम्खोर के शुक्ल,भरसी मिश्र,हस्त्गामे के पांडे,नैनीजोर के तिवारी ,गाना के मिश्र ,मचैया के पांडे,दुमतिकार तिवारी ,आदि.भूमिहार ब्राह्मन और सर्वरिया (सरयुपारिन ) दोनों में हैं.वरन भूमिहार ब्राह्मण में कुछ लोग अपने को “सर्वरिया” ही कहते है.सर एच.एलिअत का कथन है – ” वे ही ब्राह्मण भूमि का मालिक होने से भूमिहार कहलाने लगे और भूमिहारों को अपने में लेते हुए सर्वारिया लोग पूर्व में कनौजिया से मिल जाते हैं
भूमिहार ब्राह्मण पुरोहित
भूमिहार ब्राह्मण कुछ जगह प्राचीन समय से पुरोहिती करते चले आ रहे है अनुसंधान करने पर पता लगा कि प्रयाग की त्रिवेणी के सभी पंडे भूमिहार ही तो हैं।हजारीबाग के इटखोरी और चतरा थाने के 8-10 कोस में बहुत से भूमिहार ब्राह्मण, राजपूत,बंदौत , कायस्थ और माहुरी आदि की पुरोहिती सैकड़ों वर्ष से करते चले आ रहे हैं और गजरौला, ताँसीपुर के त्यागी राजपूतों की यही इनका पेशा है। गया के देव के सूर्यमंदिर के पुजारी भूमिहार ब्राह्मण ही मिले। इसी प्रकार और जगह भी कुछ न कुछ यह बात किसी न किसी रूप में पाई गई। हलाकि गया के देव के सूर्यमंदिर का बड़ा हिसा सकद्विपियो को बेचा जा चूका है

ये भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]