भूमिहार

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भूमिहर या बाभन एक भारतीय जाति है, जो उत्तर प्रदेश, बिहार एवं बहुत थोड़ी संख्या में अन्य प्रदेशों में निवास करती है। भूमिहर का अर्थ होता है भूमिपति या भूमि का व्यवसाय करने वाला।[1] भूमिहर अपने आप को भगवान परशुराम का शिष्य मानते हैं,[कृपया उद्धरण जोड़ें] भूमिहर उत्तरप्रदेश के गाजीपुर व आजमगढ़़ जिले में सबसे ज्यादा हैं |[कृपया उद्धरण जोड़ें] कई भूमिहरों का मूल स्थान गाजीपुर और आजमगढ़ जिले में है व भूमिहर (बाभन) बिहार के सारण व बेगूंसराय जिले में सबसे जादा है तथा अलग अलग गोत्रों के बाभनों का मूल यही क्षेत्र है |[कृपया उद्धरण जोड़ें]

तिवारी, त्रिपाठी, मिश्र, शुक्ल, उपाध्यय, शर्मा, पाठक दूबे, द्विवेदी आदि भूमिहर समाज की उपाधियाँ है। इसके अलावा राजपाठ और जमींदारी के कारण एक बड़ा भाग का राय, साही, सिंह और ठाकुर कुलनाम हैं। भूमिहर के अलावा अन्य समुदाय भी ये उपनाम प्रयोग करते हैं।

हालांकि ब्राह्मणों का एक बड़ा समुदाय भूमिहरों को ब्राह्मण वर्ण का सदस्य मानने से इनकार करता है। कई विद्वानों का मानना है कि भूमिहर अंग्रेजों और मुग़लों के हितैषी रहे। इसके बदले में भूमिहरों को बड़ी सम्पत्ति मिली।[2]

चूँकि दिल्ली के आसपास रहने वाली त्यागी जाति भी अपने आप को परशुराम का शिष्य मानती है इसी से भूमिहर भी त्यागियों को अपनी ही जाति का मानते हैं।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

सन १८८५ में अयाचक ब्राह्मणों की महासभा की स्थापना भुइंहार ब्राह्मण द्विजराज काशी-नरेश के प्रयास से वाराणसी में हुई. इस सभा में पूर्वांचल के भूमिहार ब्राह्मण , मगध के बाभनों, मिथिलांचल के पश्चिमा, प्रयाग के जमींदार-ब्राह्मण और पंडा, मेरठ के तगा-ब्राह्मण और भुइंहार ब्राह्मणों से सम्बन्धित अन्य ब्राह्मणों को 'अयाचक ब्राह्मण संगठन' में सम्मिलित किया गया | तभी काशी-नरेश द्वारा एक समिति भी गठित की गयी| समिति के सात वर्षो के प्रयास के बाद भूमिहार ब्राह्मण शब्द पर सर्वसहमति बनी व भूमिहार ब्राह्मण-सभा अस्तित्व मे आयी थी | भूमिहार समाज का साहित्य के क्षेत्र में भी अहम योगदान रहा है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर', राम बेनीपुरी, गोपालसिंह 'नेपाली', राहुल सांकृत्यायन मगही कोकिल जयराम सिंह जैसे प्रभावशाली लेखकों और चिंतकों ने हिंदी और मैथिली के साहित्यिक उपवन को अपनी रचनाओं से सिंचित किया है। [3][मृत कड़ियाँ]

सन्दर्भ

ये भी देखें

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