भारतीय संविधान के तीन भाग

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

संविधान के तीन. प्रमुख भाग हैं। भाग एक में संघ तथा उसका राज्यक्षेत्रों के विषय में टिप्पणीं की गई है तथा यह बताया गया है कि राज्य क्या हैं और उनके अधिकार क्या हैं। दूसरे भाग में नागरिकता के विषय में बताया गया है कि भारतीय नागरिक कहलाने का अधिकार किन लोगों के पास है और किन लोगों के पास नहीं है। विदेश में रहने वाले कौन लोग भारतीय नागरिक के अधिकार प्राप्त कर सकते हैं और कौन नहीं कर सकते। तीसरे भाग में भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के विषय में विस्तार से बताया गया है।

अनुक्रम

संविधान भाग 1 संघ तथा उसका राज्यक्षेत्र[संपादित करें]

इंडिया जो कि भारत है राज्यों का एक संघ है

[1] संघ राज्यों के समझौते से नहीं बना है अतः वे संघ से पृथक होने का अधिकार भी नहीं रखते, अतः संघ अविनाश्य है

[2] वे ही राज्य जो कि संघ केन्द्र से संबंध रखते है इसके भाग है न कि संघीय क्षेत्र
अनुच्छेद 3 में कहा गया है कि राज्य का नाम क्षेत्र, सीमा परिवर्तन का अधिकार संसद को है, परंतु संसद इसे संविधान में वर्णित नियमों से ही कार्यांवित करेगी। बिल तभी संसद में लाया जायेगा जब राट्रपति इस की अनुमति दें, अनुमति से पूर्व राष्ट्रपति इस को संबंधित राज्य की विधायिका के पास भेज सकता है किंतु उस के द्वारा प्रकट राय से वह बाध्य नहीं होगा न ही विधायिका अनंत काल तक इस बिल को रोक के रख सकती है। यदि इस बिल में संसद कोई संशोधन करती है तो भी इसे दुबारा विधायिका के पास नहीं भेजा जायेगा। इस बिल को संसद के दोनों सदन सामान्य बहुमत से ही पारित क देंगे आज तक पारित बिलों में सबसे महत्वपूर्ण 1956 का राज्य पुनः गठन अधिनियम था। इस प्रावधान के चलते भारत विभाज्य राज्यों का अविभाज्य संघ है।

संविधान भाग 2 नागरिकता[संपादित करें]

किसी भी देश मे रहने वाले व्यक्ति नागरिक तथा विदेशी दो भागों में विभाजित किये जाते हैं। नागरिक वह है जो राजनैतिक समाज का हिस्सा है तथा संविधान तथा अन्य कानूनों में दिये सभी लाभो का लाभ उठाता है
संविधान के अंर्तगत नागरिकता के मात्र सैद्धांतिक निर्देश ही दिये गये है यथा

1 सभी नागरिको हेतु एक ही नागरिकता
2 संविधान लागू होते समय भारत के नागरिक कौन थे
इन सिद्धांतो के आधार पर ही संसद ने भारतीय नागरिक अधिनियम 1955 पारित किय है यही अधिनियम भारतीय नागरिको की स्थिति को निर्धारित करता है। इस में 1986 में फिर संशोधन किया गया था इस में संशोधन कर के ही सरकार दोहरी नागरिकता का प्रावधान कर सकती है।

संविधान भाग 3 मौलिक अधिकार[संपादित करें]

मौलिक अधिकार नागरिकॉ के अधिकार है इनको अमेरिकी संविधान के बिल ऑफ राइट से लिया गया है। इन अधिकारॉ को मौलिका माननॅ का कारण ये हैं-<br 1 इनकी उपस्थिति एक व्यक्ति के लिये आवश्यक है ताकि वह अपनी शारीरिक, बौद्धिक तथा आध्यातमिक क्षमताऑ का पूर्ण विकास कर सके
इन अधिकारो के अभाव मॅ कोई भी देश जनतात्रिक नहीं हो सकता है इसी कारण ये अधिकार भारतीय सविन्धान का आधार मानॅ जाते है
नागरिक अधिकार तथा मानवाधिकार वे अधिकार जो किसी व्यक्ति के गरिमापूर्ण अस्तित्व हेतु आवश्यक है मानवाधिकार कहलाते है
परंतु वे मानवाधिकार जिन्हें संविधान प्रदान करता है नागरिक अधिकार कहलाते हैसभी नागरिक अधिकार मानवाधिकार तो है परंतु सभी मानवाधिकार नागरिक अधिकार नहीं है
नागरिक अधिकार कानून द्वारा प्रर्वत्य तथा लागू होते है

1 ये अधिकार व्यक्तियों द्वारा उपभोग्य है तथा राज्य के विरूद्ध दिये गये है न कि व्यक्ति या निजी संगठन के विरूद्ध [गतिविधि, अस्पृश्यता के अधिकार अपवाद है]
2 ये अधिकार राज्य शक्तियों पे नियंत्रण रखते है तथा राज्य को पूर्णाधिकारवादी बनने से रोकते है
3 यधपि व्यक्ति इनका प्रयोग करते है परंतु ये अबाध्य नहीं है इनके विरूद्ध युक्ति संगत निर्बधन आरोपित किए जा सकते है
4 कुछ स्थितियों राष्टृ की सुरक्षा तथा संप्रभुता, विदेशी देशों से मैत्री संबंध, पिछडे वर्गों के आर्थिक – शैक्षणिक उत्थान के
प्रयासों, अनुसूचित जनजाति के हितों की रक्षा हेतु, लोकव्यवस्था, नैतिकता, शांति निर्माण हेतु जनहित
मॅ इन अधिकारों पर नियंत्रण लगाया जा सकता है

मौलिक अधिकारों तथा अन्य वैधानिक अधिकारों में भेद[संपादित करें]

1 मौलिक अधिकारों के उल्लघंन की दशा में व्यक्ति सीधे अनु 32 के अंर्तगत सर्वोच्च न्यायालय जा कर इन्हें लागू करवा सकता है
जबकि अन्य अधिकारों की स्थिति में व्यक्ति अनु 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय मॅ ही जा सकता है, अथवा अधीनस्थ न्यायालयॉ में जा सकता है

न्यायिक पुनर्रविक्षण [समीक्षा]

न्यायिक समीक्षा के प्रावधान संविधान में स्पष्ट तथा पृथक रूप से वर्णित नहीं है परंतु इनका उदगम सर्वोच्च न्यायालय के शक्तियों में है [अनु 13,32] तथा उच्च न्यायालय का शक्तियों में है। यह अधीनस्थ न्यायालयों को प्राप्त नहीं है इस अधिकार के प्रयोग करते हुए ये न्यायालय किसी विधि को संविधान का उल्लघंन करने की सीमा तक अवैध घोषित कर सकते हैं। यह समीक्षण शक्ति विधायिका के साथ ही कार्य-पालिका के विरूद्ध भी प्रयोग की जा सकती है।

न्यायिक समीक्षा के सिद्धांत[संपादित करें]

1 यह सीमित शासन के सिद्धांत पे आधारित है यदि इसने दो व्याख्याएँ हो और एक ने वैध तथा दूसरे ने अवैध घोषित किया है तो प्रथम मान्य होगी
2 न्यायालय उस अधिनियम को रद्द नहीं कर सकता जो लागू ही नहीं हुआ हो 3 न्यायालय इस शक्ति का प्रयोग स्वतः प्रेरणा से नहीं करेगा
न्यायिक समीक्षा के तीन मुख्य कार्य है 1 शासन कार्यों को वैधानिक बनाना
2 मौलिक अधिकारों को सुरक्षित रखना
3 न्यायालयों की सरकारी हस्तक्षेप से रक्षा करना
न्यायिक समीक्षा के लाभ
1 इसके माध्यम से शक्ति का पृथ्क्करण राज्य के तीनों अंगों तथा केन्द्र-राज्य के मध्य बना रहता है
2 संविधान की सर्वोच्चता तथा विधि का शासन बना रहता है
3 स्वंय सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती वाद मॅ न्यायिक समीक्षा को संविधान के आधारभूत ढाँचे का अंग घोषित किया है
विलोपन सिद्धांत
अनु 13[1] के अनुसार भारत मॅ प्रत्यार्वित सभी विधियाँ संविधान के लागू होने से ठीक पहले तक यदि किसी भी सीमा तक यदि
मौलिक अधिकार का उल्लंघन करे तो वह उस सीमा तक अवैध होगी
सर्वोच्च न्यायालय ने भी भीकाजी नारायण बनाम मध्य प्रदेश वाद 1955 में इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया कि ऐसी विधि समाप्त नहीं होगी
परंतु इन पर मौलिक अधिकार प्रभावी हो जायेगें तथा ये पृष्ट्भूमि में चली जायेगी परंतु ये उस दशा में फिर से प्रभावी क्रियाशील हो जायेगी जब संविधान संशोधन के माध्यम से मौलिक अधिकारों में संशोधन हो जाये
इसी तरह जो व्यक्ति मौलिक अधिकारों का लाभ नहीं उठाते उन पर ये लागू रहेगी जैसे विदेशी नागरिक दीपचंद बनाम उत्तर प्रदेश वाद 1959 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस सिद्धांत को केवल संविधान पूर्व की विधियों पे लागू किया
सविधान लागू होने के बाद वाली विधियाँ उस सीमा तक मृत पैदा होगी जिस सीमा तक वे अनुच्छेद 13[2] का उल्लघंन करे वही गुजरात राज्य बनाम अम्बिका मिल वाद 1974 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्व निर्णय को रद्द करते हुए इस को सविधान पश्चात की विधियों पे भी लागू कर दिया क्योंकि विधायिका का संविधान उल्लघंन का कोई इरादा नहीं था इसी प्रकार ये उन लोगों पर लागू रहेगी जो मौलिक अधिकारों के पात्र नहीं है।

मौलिक अधिकारों मे संशोधना का प्रश्न ?[संपादित करें]

अनु 13[2] की सरसरी व्याख्या मौलिक अधिकारों संशोधन का पात्र नहीं बताती है परंतु संसद ने पहली ही संशोधन विधि द्वारा जब कि संसद के चुनाव भी नहीं हुए थे इस में संशोधन करना शुरू कर दिया था> शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ वाद 1951 में प्रथम संशोधन को चुनौती दी गयी, तब सर्वोच्च न्यायालय ने अनु 13[2] की व्याख्या करते हुए संसद की दो विधान शक्तियाँ बतायी थीं--

[1] सामान्य जिसका प्रयोग से बना एक्ट विधि कहलायेगा [2] सवैधानिक – जिस्का प्रयोग करने पर संशोधन उत्पन्न होगा
यह शक्ति निर्माण कारी शक्ति है तथा संविधान निर्मात्री सभा ने संसद को इस लिये दी थी ताकि वह समय आने पर सविधान मॅ परिवर्तन ला सके। प्रथम केवल सामान्य शक्ति का परिचायक है तथा इस्का प्रयोग कर के संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती परन्तु अनु 368 की शक्तियों का प्रयोग करने पर मौलिक अधिकार भी संशोधन का विषय होंगे। यह स्थिति गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य वाद 1967 तक रही परंतु इस वाद के निर्णय मॅ सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक अधिकारों को असंशोधनीय बता दिया कोई भी सत्ता यहाँ तक कि संसद भी उन में संशोधन नहीं कर सकती है यह अधिकार तो मात्र नवीन संविधान सभा को ही दिया जा सकता है। इस वाद के निर्णय में अनु 368 को मात्र संविधान संशोधन प्रक्रिया बताया गया न कि सविन्धान संशोधन शक्ति उस समय तक अनु 368 का शीर्षक था संविधान संशोधन की प्रक्रिया इस निर्णय की प्रतिक्रिया में संसद ने 24 वां सशोधन पारित किया तथा अनु 13 तथा अनु 368 मॅ संशोधन किया अनु 13[4] की रचना घोषित किया कि अनु 368 के तहत संसद द्वारा पारित संशोधन का अनु 13 से कोई सम्बन्ध नहीं होगा
इसी तरह अनु 368 का शीर्षक सविन्धान संशोधन की प्रक्रिया तथा सन्सद की शक्ति कर दिया।

अनु 368[3] का समावेश कर कहा गया कि 13वॅ अनुच्छेद में कहा गया कोई शब्द अनु 368 पे लागू नहीं होगा। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य विवाद में 24 वे सशोधन की वैधता का प्रश्न उठाया गया अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायाल्य ने इस सशोधन को वैध घोषित कर दिया साथ ही संसद को सविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने का अधिकारी माना तथा गोलकनाथ वाद के निर्णय को रद्द कर दिया परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने संशोधन करने की संसदीय शक्ति को असीम नहीं माना संशोधन द्वारा संविधान के आधारभूत ढाँचे को नष्ट या बदला नहीं जा सकता यधपि वह किसी भी अनुच्छेद में संशोधन को स्वतंत्र है यह आधारभूत ढाँचा एक न्यायिक आविष्कार है न कि कोई संवैधानिक शब्द है परंतु न्यायालय ने इस ढाँचे का संकेत भर दिया है न कि स्पष्ट वर्णन बाद के वादों के निर्णयॉ में इस का वर्णन मिलता है। ये है

1 देश की संप्रुभता
2 एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना
3 नीति निर्देशक तत्व तथा मौलिक अधिकारॉ के बीच संतुलन
4 पंथ निरपेक्षता
5 जनतांत्रिक तथा गणंतत्रीय स्वरूप
6 संसदीय लोकतंत्र
7 न्यायिक समीक्षा की शक्ति
8 निष्पक्ष चुनाव
9 शक्तिय़ों का पृथक्करण
10 विधि का शासन
11 संविधान की सर्वोच्चता
12 तीनों अंगों में शक्ति संतुलन

यह सूची यही समाप्त नहीं हो जाती अन्य लक्षण भी हो सकते है जिनका निर्धारण करने की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय के पास है। मौलिक ढाँचा संविधान के उन भागो से मिल कर बना है जिनके बिना संविधान अपना मौलिक स्वरूप ही खो देता है।

42 वां संशोधन 1976[संपादित करें]

नव स्थापित अनु 368[4] –अनु 368 के अंतर्गत किया गया कोई भी संशोधन किसी भी न्यायालय मॅ किसी भी आधार पे चुनौती नहीं दी जा सकती है। अनु 368[5] अस्पष्टता दूर करने के लिये यह घोषित किया जाता है कि संसद की संशोधन शक्ति पे कोई भी बंधन नहीं है। मिनर्वा मिल बनाम भारत संघ वाद 1980 इस वाद में दिये गये निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने 368[4],[5] को रद्द कर दिया क्योंकि वे संविधान के मौलिक ढाँचे का उल्लंघन करते है वे न्यायिक पुनरीक्षण शक्ति को मान्यता नहीं देते है। अब यह सुस्थापित तथ्य है कि संसद की शक्ति असीमित नहीं है।

मौलिक ढाँचे के लाभ
1 संविधान की सर्वोच्चता बनाये रखता है
2 मौलिक अधिकारों की गरिमा बनायें रखता है
3 राज्य के तीन अंगों के मध्य संतुलन बनाये रखता है
4 देश में भावी संवैधानिक विकास के लिये आधार प्रदान करता है
इन निर्णयॉ से उत्पन्न प्रभाव के चलते सर्वोच्च न्यायालय को संसद का तीसरा सदन कहा जाता है

मौलिक अधिकारों का निलम्बन[संपादित करें]

अनु 352 के अनुसार जब राष्ट्रीय आपातकाल लागू हो तो अनु 358,359 राष्ट्रपति को यह अधिकार देते है कि वह मौलिक अधिकारॉ को निलम्बन कर दे [राष्ट्रीय आपातकाल ----युद्ध, बाहरी आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह की द्शा में] अनु 358[1] युद्ध अथवा बाहरी आक्रमण की द्शा मॅ 19वॅ अनु मॅ दिये गये अधिकार स्वतः निलंबित हो जाते है इस कारण तब राष्ट्रपति को पृथक से आदेश देने की आवश्यक्ता नहीं है। अनु 359 जब राष्ट्रीय आपातकाल किसी भी कारण से लागू हो तो राष्ट्रपति एक पृथक घोषणा के माध्यम से एक या अधिक मौलिक अधिकारॉ को निंलबित कर सकता है। परंतु अनु 20,21 में दिये अधिकार किसी भी दशा में वापिस नहीं लिये जा सकते है अनुच्छेद 358 तथा 359 के प्रावधानॉ मॅ भेद का प्रकार अनु 358
1 युद्ध अथवा बाहरी आक्रमण के कारण ही प्रभावी
2 अनु 19 के अधिकार स्वतः निलंबित हो जायेंगे
3 नागरिकॉ हेतु अनु 19 के अधिकार कार्यपालिका तब तक लागू नहीं कर सकती जब तक राष्ट्रीय आपात काल लागू है
अनु 359
1 किसी भी कारण से आपात काल लागू होने पर प्रभावी
2 राष्ट्रप्ति का पृथक आदेश आवश्यक है
3 राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह किसी मौलिक अधिकार को पुनः प्रभावी कर दे
4 अनु 19 के अधिकारों का क्रियांवयन रोका जाता है अधिकार निलंबित नहीं किये जाते है

मौलिक अधिकारॉ का वर्गीकरण[संपादित करें]

1 समानता के अधिकार अनु 14 से अनु 18 कुल 5 अनुच्छेद है
2 स्वतंत्रता के अधिकार अनु 19 से 22
3 शोषण के विरूद्ध अधिकार अनु 23-24
4 धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार अनु 25 से 28
5 सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक अधिकार अनु 29-30
6 संपत्ति का अधिकार अनु 31 जो कि अब विलोपित किया जा चुका है
7 संवैधानिक उपचारॉ का अधिकार अनु 32

1

समानता के अधिकार[संपादित करें]

अनु 14 राज्य विधि के समक्ष समानता अथवा विधि का समान संरक्षण प्रदान करेगा विधि के समक्ष समानता ब्रिटिश संविधान से लिया गया है यह नकारात्मक अधिकार है जो किसी व्यक्ति के विशेषाधिकारों को नकारता
है, इसी अधिकार को विधि का शासन कहता है, विधि के शासन का तात्पर्य देश का प्रशासन विधि के अनुसार चलाना है
न कि व्यक्तियॉ की इच्छानुसार चलाना है यह शासन नियमित विधि की सर्वोच्चता ऐच्छिक शक्तियॉ पे स्थापित करता है
यह देश के शासन मॅ विधि की प्रभुता स्थापित करता है,। यह देश की सरकार को भी विधि से बांध देता है, विधि के शासन को डायसी ने लोकप्रिय बनाया था

उसके अनुसार

1 कोई भी व्यक्ति तब तक शारीरिक –आर्थिक रूप से दंडित नहीं होगा जब तक विधि का उल्लंघन न करे
2 यह उल्लघंन सामान्य न्यायालय मॅ सामान्य रूप से सिद्ध होना चाहिए
3 सभी व्यक्ति बिना किसी विभेद के देश के सामान्य कानूनॉ तथा न्यायालयॉ से शासित होंगे
४संविधान देश के सामान्य कानूनॉ का परिणाम है,
यह 4था नियम भारत में परिर्वितित रूप से लागू है’ संविधान देश का सर्वोच्च कानून है तथा विधायिका द्वारा निर्मित सभी कानून संविधान के अनुरूप होने पर ही वैध होंगे
विधि के शासन का महत्व
1 विधि के शासन लागू होने पर ही व्यक्ति ही कानून है से कानून ही शासक की स्थिति आती है
2 विधि का शासन जनतंत्र संचालने हेतु आवश्यक है, सर्वोच्च न्यायालय इसे समस्त संविधान मॅ उपस्थित बताता है
3 अनु 32, 226 विधि के शासन को स्थापित करते है
विधि के शासन के अपवाद
तीन अपवाद है[संविधान के अनुसार]
1 राष्ट्रपति तथा राज्यपाल किसी भी न्यायालय के समक्ष अपनी शक्तियॉ क़ॆ प्रयोग से संबंधित कृत्यों हेतु उत्तरदायी नही होंगे
2 कोई भी आपराधिक न्यायिक कार्यवाही राष्ट्रपति तथा राज्यपाल के विरूद्ध उनकी पदावधि के दौरान न तो शुरु होगी न जारी रहेगी
3 राष्ट्रप्ति तथा राज्यपाल के विरूद्ध कोई भी दीवानी कार्यवाही उन्हॅ दो मास का अग्रिम नोटिस दिये बिना प्रारंभ नही की जा सकती
संविधान से परे अपवाद
भ्रमणकारी राष्ट्राध्यक्ष, राजनयिक कर्मचारी भी विधि के शासन से परे होंगे
विधि का समान संरक्षण
अमेरिकी संविधान से लिया गया है तथा सकारात्मक शब्द है’ व्यक्ति जो समान परिस्थितियॉ में पाये जाते है
, को विधि का समान संरक्षण मिलेगा ‘ परंतु असमानॉ में समानता स्थापित करना अथवा समानॉ मॅ असमानता स्थापित
करना भी इसका अर्थ नहीं है इसका अर्थ समानॉ में समानता स्थापित करना है
अनु 15
15[1] राज्य अपने नागरिकॉ के मध्य मूलवंश, धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर किसी प्रकार का विभेद नहीं करेगा [किंतु अन्य आधारॉ पर विभेद किया जा सकता है]
15[2] नागरिकॉ को सार्वजनिक स्थानॉ तक पहुँचने का अधिकार होगा[ भोजनालय, सिनेमा, कुँए, मन्दिर] उन्हें मूलवंश, जाति, धर्म, लिंग, जन्म-स्थान के आधार पर नहीं रोका जायेगा.जहाँ पहला अनुच्छेद केवल राज्य के विरूद्ध लागू था यह सामान्य नागरिकों के विरूद्ध भी लागू होता है, यह अनुच्छेद छुआछूत के विरूद्ध प्रभावी उपाय है
15[3] इस अनुच्छेद मॅ विधमान कोई उपबंध राज्यॉ को स्त्रियों – बच्चॉ हेतु विशेष उपाय करने से नहीं रोक सकता है,
15[4] प्रथम संशोधन से प्रभावी है – अनु 15 मॅ विधमान कोई उपबन्ध राज्य को सामाजिक –शैक्षणिक दृष्टि से पिछडे
वर्गों हेतु विशेष उपाय करने से नहीं रोकेगा
अनुच्छेद 16
जनसमायोजन मॅ अवसर की समानता[केवल नागरिकों हेतु]
अनु 16[2] कोई भी नागरिक जनसमायोजन हेतु पूर्ववर्णित उपायों के साथ उत्पति, निवास स्थान के आधार पर
अयोग्य नहीं ठहराया जा सकेगा
16[3] विशेष परिस्थितियॉ मॅ निवास स्थान को नियुक्ति हेतु एक विशेष योग्यता माना जा सकेगा
निवास स्थान संबंधी कानून केवल संसद ही निर्मित कर सकेगी
16[4] इस अनुच्छेद मॅ मौजूद कोई भी उपबन्ध राज्य को पिछडे वर्गों हेतु पदॉ का आरक्षण करने से नहीं रोकेगा
परंतु आरक्षण कोई प्राप्त किया जा सक्ने वाला अधिकार नहीं है यह मात्र राज्य की इच्छा पर निर्भर करता है
यह आरक्षण दो स्थितिय़ो तब मिलता है जब
1 वह वर्ग जिसे दिया जाने वाला हो सामाजिक –शैक्षणिक रूप से पिछडा हो
2 सार्वजनिक सेवाऑ में उसका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं हो
इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ वाद 1992 के निर्णय के अनुसार
1 अनु 16[4] में दिये आरक्षण का लाभ केवल सेवा मॅ प्रवेश हेतु है न कि पदोन्नति हेतु
2 पिछडे वर्गों को दिया आरक्षण 50% से ज्यादा नहीं हो सकता है
3 आरक्षण के मामले में न्यायालय को अधिकार है कि वह राज्य़ो को अन्य पिछडा वर्ग
मे क्रीमीलेयर की पहचान करने तथा उन्हे आरक्षण लाभॉ से वंचित करने का निर्देश देता है
4 विशेषज्ञता तथा परम विशेषज्ञता क्षेत्र में कोई आरक्षण नहीं होगा
5 यदि केवल एक पद नियुक्ति हेतु है तो कोई आरक्षण लागू नहीं होगा
सरकार की इस निर्णय पे प्रतिक्रिया
1 संसद ने 77वा संशोधन 1995 पास कर अनु 16[4] [क] स्थापित किया
जिससे राज्य़ों को अजा/जजा को पदोन्नति मॅ आरक्षण का लाभ देने का अधिकार देता है
2 तमिलनाडु पिछडावर्ग अधिनियम 1994 जो कि सेवाऑ- शैक्षणिक संस्थानॉ मॅ 69% आरक्षण देता है
को सविन्धान की नौवी अनुसूची मॅ स्थान दे दिया गया
3 81 वां संशोधन 2000 में पारित कर 16[4-ब] स्थापित किया जो राज्य को अधिकार देता है
कि वह अ.जा./ज.जा की खाली रही सीटो को अगले वर्ष में जोड दे फिर चाहे यह 50% की आरक्षण सीमा को तोड दे

अनु 17 यह अस्पृश्यता का निवारण करता है इसका कोई अपवाद नहीं है, यध्पि सविन्धान अस्पृश्यता हेतु कोई दंड
निर्धारित नहीं करता है परंतु संसद को इस हेतु अधिकृत करता है संसद ने इस शक्ति का प्रयोग कर 1955 में अधिनियम बनाया
जिसे संशोधित कर 1976 मॅ नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम बनाया

अनु 18 उपाधियॉ का उन्मूलन करता है18[1] राज्य नागरिकॉ अथवा गैरनागरिकॉ को विधा अथवा सैन्य सेवा
से जुडी उपाधियॉ के अतिरिक्त कोई उपाधि नहीं देगा राष्ट्रीय पुरस्कार वे पुरस्कार है जो जनवरी 1954मे भारत सरकार ने एक
राष्ट्रपतिय विज्ञप्ति के माध्यम से स्थापित किये ये वैधानिक नहीं है, ये पुरस्कार गणतंत्र दिवस पर प्रदान करते है ये पुरस्कार है
भारत रत्न,पदम भूषण, पदम विभूषण, पदम श्री ये पुरस्कार मात्र व्यक्तियॉ को समाज अथवा देश
की सेवा पर बिना किसी भेद के प्रदान किए जाते है बालाजी राघवन बनाम भारत संघ 1996 मॅ इन पुरस्कारॉ की वैधानिकता
का प्रश्न उठाया गया परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने इन पुरस्कारॉ को शैक्षणिक क्षेत्र मॅ रखा न्यायालय के अनुसार समानता का यह
अर्थ नहीं कि गुणों की अवहेलना हो, परंतु पुरस्कार प्राप्तकर्ता इन पुरस्कारॉ को अपने नाम के साथ जोड कर इनके दुरूपयोग
के लिये स्वतंत्र नहीं है
18[2] कोई भी भारतीय नागरिक किसी विदेशी राज्य से उपाधि नहीं प्राप्त करेगा
18[3] यदि कोई विदेशी भी भारत सरकार की सेवा मॅ है तो बिना राष्ट्रपति की अनुमति के विदेशी राज्य से कोई उपाधि
ग्रहण नहीं करेगा यह अनुच्छेद मात्र घोषणात्मक है इसमे कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं है

स्वतंत्रता का अधिकार[संपादित करें]

अनुच्छेद 19
6 प्रकार की स्वतंत्रताए वर्णित है जिन्हे जनतांत्रिक स्वतंत्रताए कहते है ये स्वतंत्रताए हैं
19[1] (क) विचारॉ की अभिव्यक्ति------- सर्वाधिक महत्वपूर्ण अधिकार है तथा जीवन के अधिकार के साथ जुडा है
इसे जीवन के अधिकार से पृथक नहीं किया जा सकता है यह वह अधिकार है जिसका न्यायपालिका ने सर्वाधिक विस्तार् किया है
इस अधिकार की भिन्न व्याख्याएँ
1. एक नागरिक को मत, राय, निर्णय को खुले रूप से प्रकट करने का अधिकार है
2. वह अपने विचार किसी भी दृश्य माध्यम या अन्य माध्यम से प्रकट कर सकता है, यहाँ तक कि मौन अथवा
राष्ट्रीय ध्वज का गरिमा पूर्ण प्रदर्शन भी इसमॅ निहित है, विज्ञापन करना भी इसी स्वतंत्रता का एक अंग है
3. नागरिक न केवल अपना मत अभिव्यक्त करने को स्वतंत्र है बल्कि अन्य व्यक्तियों [नागरिक गैर नागरिक ]
के मत प्रकट करने का भी अधिकार है, प्रेस की स्वतंत्रता इसी व्याख्या के चलते संभव हुई है
4. सूचना तक पहुँच का अधिकार भी इसी में निहित है अर्थात नागरिकों को सूचना प्राप्त करने का अधिकार है
यह सूचना विदेश से भी प्राप्त की जा सकती है
5. अस्वीकृति प्रकट करना का अधिकार भी इस में शामिल है
यह अधिकार इन सीमाओं में बंधा है
अनु 19[2] के अनुसार – देश की संप्रभुता-सुरक्षा, विदेशी राष्ट्रॉ से मैत्री पूर्ण संबंध, जन व्यवस्था, नैतिकता, सदाचार, बनाये रखना, मानहानि, न्यायालय की अवमानना के आधार पर रोक लग सकती है

अनु 19[1] (ब) जन सम्मेलन करने, प्रस्ताव पारित करने का अधिकार देता है, यह सम्मेलन निशस्त्र तथा शांतिपूर्ण
ढंग से होना चाहिये
अनु 19[1] (स) किसी भी प्रकार का संगठन बनाने का अधिकार् देता है, इसी अधिकार पर ट्रेड यूनियन, राजनैतिक दल
स्थापित है परंतु संगठन बनाने के अधिकार में हडताल करने का अधिकार शामिल नहीं है,
इसी तरह सरकारी कर्मचारी का हडताल पर जाने का कोई वैधानिक नैतिक अधिकार नहीं है[रंगनाथन तथा अन्य बनाम तमिलनाडु 2003 निर्णय ]भरत कुमार बनाम केरल राज्य [केरल उच्च न्यायाल्य 1997]c.p.m बनाम भरत कुमार तथा अन्य उच्चतम न्यायाल्य 1998
प्रथम वाद निर्णय में बन्द तथा हडताल को प्रतिबन्धित किया गया है दूसरे वाद में सी.पी.एम. ने बन्द को कर्मचारियो के विचार, अभिव्यक्ति, संघठन बनाने के मौलिक अधिकार का प्रकार बताते हुए तर्क दिया परंतु उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को रद्द करते हुए बन्द को सामान्य जनता के लिये आर्थिक क्षतिकारी, भयकारी, आजीविका नष्ट् करने वाला अर्थात जनता के मौलिक अधिकारो

1 आजीविका/जीवन जीने
2 विचार अभिव्यक्ति
3 गतिविधि करने का उल्लंघनकर्ता बताया अतः बन्द अवैधानिक है वही हडताल वैध है
बन्द तथा हडताल के आयोजनकर्ता को क्षतिपूर्ति देनी पड सकती है
सगंठन बनाने का अधिकार सशस्त्र बलों को नहीं है इस पर राज्य नियंत्रण लगा सकता है

अनु 19[1] [द] गतिविधि आवागमन की स्वतंत्रता का अधिकार एक नागरिक को अधिकार है कि वह भारत के राज्य क्षेत्र में कही भी आने जाने की पूर्ण स्वतंत्रता हैइस के अंतर्गत आवागमन का सम्य, माध्यम, तथा स्थान भी निहित है इस पर ये रोक लगी हुई है[जन हित, राष्ट्रसुरक्षा, जनजातीय आबादी के हितो की सुरक्षा]
अनु 19 [1] [5] निवास करने तथा बस जाने की स्वतंत्रता पर्ंतु इस पर भी उन्ही आधारो पर रोक लग सकती है जिन के आधार पर इस से पहले अनु पे रोक लगा दी जा सकती थी
अनु 19 [1] [6] पेशे की आजादी-नागरिको को अपना पेशा, व्यापार चुनने की आजादी है यधपि यह चुनाव सरकार द्वारा युक्तिसंगत ढंग से नियंत्रित कर सकती है, कुछ व्यापार जनहित के चलते सरकार पूर्णत या अंशत निरोधित कर सकती है

अनु 20 अपराधों के सम्बन्ध में दोष सिद्धि से संरक्षण से सम्बन्धित अधिकार [राज्य के विरूद्ध]
1 भूतलक्षी प्रभाव से आपराधिक कानून नहीं बनेगें और ना लागू होंगे
2 दोहरे दंड से संरक्षण का अधिकार
3 किसी व्यक्ति को स्वंय के विरूद्ध ही साक्ष्य देने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकेगा

अनु 21 कोई भी व्यक्ति अपने जीवन अथवा दैहिक स्वंतत्रता से सिवाय विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के वंचित नहीं किया जा सकेगा
इस अनु का न्यायपालिका की व्याख्याओं द्वारा अत्यधिक विस्तार किया गया है इस अनु को वर्तमान में संविधान का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अनुच्छेद माना जाता है, इस अनु में अनेक अधिकार वर्णित है जो यधपि संविधान में वर्णित नहीं है किंतु न्यायपालिका ने अपनी उदार व्याख्यओं द्वारा स्थापित किये है
1 प्राथमिक शिक्षा
2 कर्मचारियॉ के लिये स्वास्थय सुविधा
3 क्रूर दंडाँ के विरूद्ध
4निजता स्थापित करने हेतु
5 गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार
6 तीव्रता से न्याय
7 मनमानी पदच्युति का निरोध
8 स्वस्थ स्वच्छ वातावरण में निवास का हक
9 निर्धनो के लिये शरण स्थल का अधिकार
10 कर्मचारियॉ को बकाया वेतन पाने का अधिकार
जीवन जीने का अधिकार अनिवार्य रूप से गरिमापूर्ण होना चाहिए इसी गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार अन्य अधिकारो से मिलता है यह अधिकार अन्य सभी अधिकारो का मूल है यदि केवल यही अधिकार संविधान में दिया जाता तो भी उदार न्यायपालिका इसमे सभी अधिकार निहित कर देती
अनु 21 को संविधान के भाग 3 तथा 4 का प्राण माना जाता हैइस अधिकार के बिना अन्य सभी अधिकार व्यर्थ सिद्ध हो जाते है यही अनुच्छेद एक पुलिस राज्य तथा संवैधानिक राज्य में अंतर करता है
अनु 21 का विकास ए.के गोपालन बनाम मद्रास राज्य 1950 के निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने इस अनु की व्याख्या करते हुए दैहिक स्वतंत्रता का शब्दश अर्थ निकाल कर इसे स्वतंत्रता से भिन्न बताया तथा इसका अर्थ मात्र उसके शरीर के अंगो की स्वतंत्रता बताया अतः अनु 21 को अनु 19 के साथ नहीं पढा जा सकता, दोनो भिन्न भिन्न है अतः जीवन का अधिकार विचाराभिव्यक्ति तथा आवागमन के अधिकार नहीं रखतावही मेनका गान्धी वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने अपना निर्णय बदल दिया तथा दैहिक स्वतंत्रता की वृहदतम संभव व्याख्या की जीवन का अधिकार तथा विचाराभिव्यक्ति के अधिकार को एक ही अधिकार का भाग बताया तथा इन्हें एक दूसरे से अपृथक्णीय बताया विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया तथा डयू प्रोसेस ओफ ला पहला वाक्याँश ब्रिटेन से लिया गया है, इसका अर्थ है कि न्यायालय एक विधि की परीक्षा केवल इस दृष्टिकोण से करेगा कि क्या विधि को पारित करने में विधायिका ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया है न्यायालय विधि पारित करने के उद्देश्यॉ का परीक्षण नहीं कर सकता है, तथा किसी विधि को इस आधार पर ही असंवैधानिक घोषित कर सकती है कि विधि निर्धारित प्रक्रिया से पारित नहीं हुई हैयह सिद्धांत केवल कार्यपालिका के स्वेच्छाचार से संरक्षण दे सकता है विधायिका से संरक्षण नहीं दे सकता है

वहीं डयू प्रोसेस ऑफ ला जो कि अमेरिकी शब्दावली है, न्यायालय को अधिकार देता है कि वह किसी व्यक्ति के जीवन तथा स्वतंत्रताओं की रक्षा न केवल विधायिका के कुप्रयासॉ से कर बल्कि यह भी देखे कि क्या विधि सदभावनापूर्ण है ? इस हेतु वह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का प्रयोग करेगा इस तरह यह प्रक्रिया न्यायालय को अधिक शक्तिमान बनाता है
डयू प्रोसेस का अर्थ है कि प्रक्रिया निष्पक्ष, तार्किक, न्यायपूर्ण हो न कि पूर्वाग्रह से ग्रस्त तथा स्वेच्छाचा र से पूर्ण भारतीय संविधान केवल विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया की बात कहता है परंतु मेनका गान्धी वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा था कि प्राकृतिक न्याय अनु 21 में निहित है और इस तरह इसे ड्यू प्रोसेस ओफ ला बना दिया
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत इन सिद्धांतों के अनुसार 1 कोई व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं होगा
2 किसी व्यक्ति को बिना सुनवाई के दंड नहीं मिलेगा
3 कार्यशील अधिष्ठान बिना किसी भेदभाव के काम करेंगे
बल देते हुए कहा जाता है जि कृत्य तर्क द्वारा समर्थित होना चाहिए ये सिद्धांत सार्वभौमिक है सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार न्यायपालिका भी उनके अधीन है ये व्यक्ति के मौलिक अधिकार है तथा निजी व्यक्तियों संगठनों के विरूद्ध लागू है ये सविन्धान द्वारा निर्मित नहीं बल्कि उसमे पूर्व निहित है केन्द्रीय अंर्तदेशीय जल परिवहन माम्ला 1986 में सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत को अनु 14 में समानता के साथ ही जोडा तथा ऐसा सिद्धांत बताया जिस पर सविन्धान आधारित है इस लिये यह सविन्धान के मौलिक ढाँचे का अंग है
मृत्यु का अधिकार- वैधानिक नहीं है

अनु 21 [ए] यह अनु 86 वे संशोधन 2002 द्वारा स्थापित किया गया है यह अनु प्राथमिक शिक्षा को 6 से 14 आयुवर्ग हेतु एक मौलिक अधिकार बनाता है ये शिक्षा निःशुल्क तथा अनिवार्य होगीइसी के द्वारा एक नया मौलिक कर्तव्य 51 ए[के] स्थापित किया गया है जो परिजनों हेतु अपने 6 से 14 आयु वर्ग के बच्चॉ हेतु शिक्षा प्राप्त करने दे

अनु 22 –कुछ विशेष स्थितियॉ मॅ गिरफ्तारियॉ द्वारा निरोध से संरक्षण देता है ये है 1 गिरफ्तार किया गया व्यक्ति हिरासत में बिना उसे गिरफ्तारी के कारण बताये नहीं लिया जायेगा जोगेंदर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य वाद 1994 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था कि गिरफ्तार व्यक्ति को अपने मित्र, रिश्तेदार अथवा किसी परिचित को अपनी गिरफ्तारी की सूचना देने का अधिकार होगा
गिरफ्तारी की सूचना पुलिस अधिकारी को अपने आधिकारिक रोजनामचे में दर्ज करनी होगीगिरफ्तारी मात्र सन्देह पर नहीं होगी 2 गिरफ्तार या निरोधित किये गये व्यक्ति को निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष गिरफ्तारी के 24 घंटे में प्रस्तुत करना होगा गिरफ्तारी के समय में यात्रा अथवा बीच के अवकाशॉ को नहीं गिना जायेगा
अनु 22 के अपवाद
1 यह लाभ शत्रु नागरिकों अथवा निवारक निरोध में रखे गये व्यक्तियॉ को नहीं मिलेगा
निरोधित व्यक्ति के अधिकार
1 यदि उसकी निरोध अवधि 2 मास से अधिक हो तो यह एक समिति जिसका गठन उच्च न्यायालय के सेवारत न्यायाधीशॉ से होगा की स्वीकृति से होगा
2 उसे अपनी गिरफ्तारी के कारण जानने का अधिकार होगा
3 उसे संबंधित अधिकरण के समक्ष शीघ्रतम समय में अपना प्रतिनिधित्व प्रस्तुत करने का अधिकार होगा

अनु 23,24 शोषण के विरूद्ध अधिकार[संपादित करें]

अनु 23---- मानव दुरव्यापार तथा बन्धुआ मजदूरी के विरूद्ध अधिकार देता है महिला बच्चॉ तथा निशतःजनॉ को अनैतिक गतिविधिय़ो में धकेलने से रोकने का अधिकार देता है
सीटा, पीटा- अनैतिक गतिविधि निवारण अधिनियम
बन्धुआ मजदूरी निवारण अधिनियम 1976 इस अनुच्छेद की भावना के अनुरूप पारित किये गये थे
परंतु राज्य जनहित हेतु नागरिकॉ को अनिवार्य सेवा आरोपित करने का अधिकार रखता है
अनु 24 बच्चॉ [14 वर्ष से कम ] का नियोजन खतरनाक कामॉ में नहीं किया जा सकेगा बाल श्रम निवारक तथा नियमन अधिनियम 1986 उन 13 क्षेत्रॉ को अधिसूचित करता है जो कि खतरनाक है

अनु 25-28 धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार[संपादित करें]

अनु 25.—व्यक्ति को धर्म का पालन करने का अधिकार देता है
1 स्वचेतना का अधिकार
2 पालन, समर्थन, तथा प्रचार का अधिकार भी धर्म स्वतंत्रता में निहित है
अंर्त चेतना का अर्थ आतंरिक चेतना के पालन का अधिकार है यह अधिकार निर्बाध है
जब अंर्त चेतना बाहरी रूप ले लेती है तब यह प्रचार का अधिकार भी रखती हैपरंतु इस अधिकार पर राज्य जनहित में रोक भी लगा सकता हैप्रचार का अर्थ अपने धार्मिक विश्वासॉ मान्यताऑ शिक्षाऑ का प्रचार दूसरे की शिक्षा हेतु करना हैसुप्रीम कोर्ट ने स्टेनीसल बनाम मध्य प्रदेश वाद में प्रचार का अर्थ मात्र विचारॉ का संप्रेषन अग्रेषण तथा उसकी मान्यताऑ प्रथाऑ का प्रचार है प्रंतु धर्मपरिवर्तन का अधिकार मौलिक नहीं है प्रत्येक परिवर्तन स्वैच्छिक होना चाहिए तथा किसी प्रकार का आपराधिक कृत्य न हो

राज्य धार्मिक प्रथाऑ मॆ जनहित हेतु रोक भी लगा सकता है अनु 26 धार्मिक संस्थानॉ का अधिकार[जन नैतिकता, स्वास्थय तथा व्यवस्था के आधार पर रोक लग सकती है ]1 धार्मिक संस्थान स्थापित करने, संचालित करने तथा चैरिटेबल ट्रस्ट गठित करने
2 धर्म संबंधित मामलॉ में अपने मामलॉ का प्रबन्धन
3 चल अचल संपत्ति को खरीदने का अधिकार
4 इस संपत्ति क विधि अनुसार प्रबन्ध करने का अधिकार
अनु 27 कर आरोपण और वसूली राज्य किसी धर्म विशेष को प्रोत्साहन देने हेतु कर का आरोपण और वसूली नहीं कर सकता हैयध्पि राज्य कर नहीं लगा सक्ता है किंतु शुल्क लगा सकता है
कर बिना किसी सेवा के बदले राज्य वैधानिक रूप से वसूल सकता है किंतु शुल्क विशेष सेवा के बदले लिया जाता है
अनु 27 राज्य के यथार्थ तथा वास्तविक धर्म निरपेक्ष चरित्र को प्रकट करता है
अनु 28 शैक्षणिक संस्थाऑ में धार्मिक शिक्षा से संबंधित है

शिक्षण संस्थाओं के चार प्रकार है[संपादित करें]

शिक्षण संस्थाओं के चार प्रकार है
1 राज्य द्वारा स्थापित प्रशासित – इन संस्थाऑ मॅ किसी प्रकार की धार्मिक शिक्षा उपलब्ध नहीं करवायी जा सकती है
2 राज्य द्वारा अनुदानित /3 राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थान इन में धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है किंतु यह अनिवार्य नहीं होनी चाहिए
4 शैक्षणिक संस्थान जो राज्य द्वारा प्रशासित है परंतु जो चैरिटेबल ट्रस्ट अथवा धार्मिक संगठन द्वारा स्थापित है इन संस्थानॉ में धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है तथा उन्हे अनिवार्य किया जा सकता है

सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक अधिकार[संपादित करें]

अनु 29 अल्पसंख्य्कॉ के हितों का संरक्षण
नागरिकॉ का कोई वर्ग जो भारत मॆ रहता है कोई पृथक भाषा, लिपि अथवा संस्कृति रखता है इनके संरक्षण करने का अधिकार भी रखता है।

29 [2] किसी नागरिक को किसी शैक्षणिक संस्था[जो कि राज्य द्वारा संचालित, प्रबन्धित अथवा अनुदानित है] में प्रवेश हेतु धर्म, नस्ल, जाति, भाषा, अथवा इनमे किसी एक आधार पे रोका नहीं जायेगा
अनु 30 अल्पसंख्यक समुदायॉ को धार्मिक भाषीय आधार पर बांटता है वे अपने अल्पसंख्यकीय चरित्र को बनाये रखने हेतु शैक्षणिक संस्थान स्थापित कर सकता है यह संस्थान अपने लिये संपत्ति की खरीद, प्रबंधन बेचान कर सकता है यदि राज्य इनकी संपत्ति अधिग्रहण करेगा तो उसे वांछित मात्रा में क्षतिपूर्ति देनी होगी

अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानॉ के अधिकार[संपादित करें]

अनुच्छेद 30. अल्पसंख्यक समुदाय के लोग अपनी रूचि की शिक्षण संस्थानों की स्थापना एवं प्रबंधन करने का अधिकार रखते है। इस अधिकार को अनुच्छेद 15(5) के द्वारा प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। अल्पसंख्यक का अर्थ है- समुचित सरकार अधिसूचना द्वारा जिसे अल्पसंख्यक घोषित करती है। अल्पसंख्यक शब्द के अंतर्गत केवल भाषाई एवं धार्मिक अल्पसंख्यक शामिल है।

संवैधानिक उपचारॉ की प्राप्ति की प्राप्ति का अधिकार[संपादित करें]

अनु 32 यह अधिकार सभी व्यक्तियॉ को सर्वोच्च न्यायालय में जाने तथा अपने मौलिक अधिकारॉ को लागू करवाने का अधिकार देता है
32 [2] सर्वोच्च न्यायालय को आदेश, रिट निर्देश [पांच प्रकार के] जारी करने का अधिकार देता है डा अंबेडकर के अनुसार यह अनु सविन्धान का सर्वाधिक मह्त्वपूर्ण अनुच्छेद है जिसके बिना सविन्धान व्यर्थ है इस अनु के बिना अन्य मौलिक अधिकारॉ को वास्तविक नहीं मान सकते है क्यॉकि यही अनु व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकार दिलवाता है बिना इस अधिकार के अन्य अधिकार मात्र कागजी रह जायॅगे
इसी अनु ने सर्वोच्च न्यायालय को व्यक्ति के मौलिक अधिकारॉ का सरंक्षक नियुक्त किया है यह अनु सर्वोच्च न्यायालय को रिट जारी करने का कर्तव्य भी निर्धारित करता है यदि सर्वोच्च न्यायालय में मौलिक अधिकारॉ का उल्लघंन सिद्ध हो जाये तो उन्हॆ अनिवार्य रूप से रिट जारी करनी होगी तथा अधिकार भी प्राप्त हो जायॆगे ये रिट न्ययपालिका के हाथ में प्रभावी विकल्प है जिनके माधयम से वह संविधान की सर्वोच्च न्यायिक पुनरीक्षा का अधिकार, विधि का शासन आदि बनाये रख सकती है यहां तक कि मौलिक अधिकारॉ का संरक्षण भी इस पर ही निरभर करता है

पाँच प्रकार के रिट[संपादित करें]

1 बन्दी प्रत्यक्षीकरण -------किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत आजादी को निर्धारित करने के लिये प्रयोग आती है इसका प्रयोग तब होता है जब किसी व्यक्ति को बिना प्राधिकार के निरोध में रखा गया हो यह व्यक्ति- राज्य दोनो के विरूद्ध प्रभावी है तथा सबंधित व्यक्ति के अलावा भी कोई अन्य व्यक्ति संगठन इस को ला सकता है मसलन प्रेम विवाह करने के बाद यदि लडकी के परिजन उसे पति घर नहीं जाने देते तो उसका पति यह याचिका लगा सकता है
न्यायालय के सामने यह याचिका लाये जाने पर वह यह आदेश दे सकता है कि व्यक्ति को सशरीर न्यायालय में प्रस्तुत किया जाये तकि न्यायालय उसके निरोधन के कारणों का परीक्षण कर सके यधपि यह अनिवार्य नहीं है
2 परमादेश यह एक न्यायिक आदेश है जो किसी लोक सेवक को उसके आधिकारिक कर्तव्य के संपादन् का आदेश दे सकता है यह केवल किसी लोकसेवक के विरूद्ध ही जारी की जा सकती है तथा मात्र उसके वैधानिक कर्तव्य अधिकार से संबन्धित है लोकसेवक को अपने कर्तव्य निर्वाहन में असफल होना चाहिए तभी यह लाई जा सकती है
यह उसी व्यक्ति/पक्ष द्वारा लाई जा सकती है जिसके अधिकारो का उल्लंघन हो रहा है यह राष्ट्रपति राज्यपाल के विरूद्ध नहीं लाई जा सकती है
3 प्रतिषेध --- किसी न्यायिक अर्द्ध न्यायिक अधिकारी के विरूद्ध लाई जा सकती है इसका ल्क्ष्य उस अधिकारी को उसकी सीमा के भीतर रखने के लिये किया जाता है ताकि वे अपनी न्यायिक सीमा का उल्लंघन ना करे यह मात्र पीडीत प्क्ष द्वारा लाई जा सकती है यह रिट संबंधित न्यायिक अधिकारी को उस वाद में निर्णय लेने से रोकती है जो वह अपनी शक्ति से बाहर जा कर प्रयोग कर रहा हो
4 उत्प्रेषण-------- प्रतिषेध रिट के समान ही है परंतु यह किसी आदेश /निर्देश या निर्णय जो किसी न्यायिक/अर्द्ध न्यायिक अधिकरण ने अपनी शक्तिय़ो से बाहर जा कर दे दिया हो कि विरूद्ध लाया जाता है न कि आदेश/निर्देश से पहले ही दे दिया जाता है
5 अधिकार पृच्छा-------- यह रिट उस स्थिति में जारी की जाती है जब कोई लोकसेवक किसी पद को ग्रहण करने योग्य है या नहीं का प्रश्न उठाया जाता है यह कोई भी व्यक्ति ला सकता है इस मामले में कोर्ट पदासीन व्यक्ति के पद ग्रहण की अधिकारिता का परीक्षण करता है यदि वह पद के योग्य ना हो तो उसे पद से हटाने का निर्देश दे सकता है
सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता में भेद

सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति मात्र अनु 32 तक सीमित है यानि केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के समय इस का प्रयोग किया जा सकता है किंतु उच्च न्यायालय अनु 32 के साथ अनु 226 के अंतर्गत अन्य वैधानिक अधिकार को लागू करवाने के लिये भी इनका प्रयोग कर सकता है इस तरह उच्च न्यायालय की अधिकारिता वृहद है
सर्वोच्च न्यायालय का यह संवैधानिक कर्तव्य है मौलिक अधिकार के उल्लंघन की दशा में उपचार दे पर्ंतु अनु 226 उच्च् न्यायालय को इस प्रकार का कोई संवैधानिक दायित्व नहीं देता यह उनके विवेकाधिकार क्षेत्र में आता है वे चाहे तो राहत दे या न दे सर्वोच्च न्ययलय की अधिकारिता पूरे देश पे है किंतु उच्च न्यायालय मात्र अपने प्रांत संघ क्षेत्र तक सीमित है