प्रतिष्ठा

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प्रतिष्ठा सामाजिक स्तरीकरण का उपकरण है जो सामाजिक समूह में किसी इकाई को खास स्थान और महत्व प्रदान किए जाने की स्थिति व्यक्त करता है। इसके दो मूल आधार माने गए हैं- कर्म और कुल। अनेक सामाजिक समूहों में प्रतिष्ठा के ये दोनों श्रोत एक साथ सक्रीय मिलते हैं।

संस्कृत साहित्य में[संपादित करें]

संस्कृत साहित्य में प्रतिष्ठा के संबंध में रामायण, महाभारत आदि महाख्यानों से लेकर नीतिग्रंथों औ्र शास्त्रों में विभिन्न तरह की धारणाएं मिलती हैं। यह एक ओर प्रगति का स्रोत माना गया है तो कई लोगों द्वारा इसे अवनती के स्रोत के रूप में भी चिन्हित किया है। "प्रतिष्ठा शूकरोविष्ठा" की धारणा के अनुसार मात्र सम्मान पाने के दृष्टिकोण से किया गया काम सुअर के मल के समान होता है। ऐसी प्रतिष्ठा की आकांक्षा अपने आप में व्यर्थ और अपवित्र परिणाम मूलक होती है।