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सामाजिक स्तरीकरण

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सामाजिक स्तरीकरण (Social Stratification) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा समाज में व्यक्तियों और समूहों को उनकी सामाजिक स्थिति, संपत्ति, शक्ति तथा प्रतिष्ठा के आधार पर विभिन्न स्तरों या श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।[1] यह विभाजन सामान्यतः उच्च से निम्न क्रम में होता है और प्रत्येक समाज में किसी न किसी रूप में पाया जाता है।[2]

समाजशास्त्र में सामाजिक स्तरीकरण एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। प्रत्येक समाज में व्यक्तियों के कार्य, पेशा, शिक्षा और आर्थिक स्थिति के आधार पर उनके सामाजिक स्थान में भिन्नता पाई जाती है। उदाहरण के लिए, चिकित्सक, शिक्षक, व्यापारी, मजदूर आदि विभिन्न पेशों से जुड़े लोग समाज में अलग-अलग प्रतिष्ठा रखते हैं।[3]

समाज के नियमों और मान्यताओं के अनुसार ही किसी व्यक्ति का सामाजिक स्थान निर्धारित होता है। यद्यपि विभिन्न समाजों में मानदंड अलग-अलग होते हैं, फिर भी स्तरीकरण की प्रक्रिया सार्वभौमिक है।

परिभाषाएँ

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गिसबर्ट के अनुसार, "सामाजिक स्तरीकरण समाज का स्थायी विभाजन है, जिसमें समूह उच्चता और अधीनता के संबंधों द्वारा जुड़े होते हैं।"[4]

किंग्सले डेविस के अनुसार, सामाजिक स्तरीकरण वह प्रणाली है जिसमें समाज के सदस्य विभिन्न समूहों में विभाजित होते हैं और उन्हें अलग-अलग सामाजिक स्थिति प्राप्त होती है।[5]

स्तरीकरण के मापदंड एवं आधार

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सामाजिक स्तरीकरण के प्रमुख मापदंड निम्नलिखित हैं:

(क) प्रतिष्ठात्मक उपागम

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इसमें यह देखा जाता है कि समाज के लोग स्वयं को और दूसरों को किस प्रकार वर्गीकृत करते हैं और किस आधार पर सामाजिक स्थिति का निर्धारण करते हैं।[6]

(ख) आत्मनिष्ठ उपागम

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इसमें व्यक्ति स्वयं अपने सामाजिक स्थान का आकलन करता है और बताता है कि वह किस वर्ग से संबंधित है।

(ग) वस्तुनिष्ठ उपागम

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इसमें शोधकर्ता बाहरी तथ्यों जैसे आय, शिक्षा और पेशा के आधार पर व्यक्ति की स्थिति निर्धारित करता है।[7]

सामाजिक स्तरीकरण के प्रमुख आधार

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(1) वर्ग पर आधारित स्तरीकरण

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वर्ग (Class) सामाजिक स्तरीकरण का प्रमुख आधार है।

कार्ल मार्क्स के अनुसार समाज मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित होता है:

  • पूंजीपति वर्ग (Bourgeoisie)
  • मजदूर वर्ग (Proletariat)

मार्क्स के अनुसार, उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण के आधार पर वर्गों का निर्माण होता है और इन वर्गों के बीच संघर्ष बना रहता है।[8]

मैक्स वेबर ने वर्ग के साथ-साथ सामाजिक स्थिति (Status) और शक्ति (Power) को भी स्तरीकरण के आधार के रूप में महत्वपूर्ण माना।[9]

(2) जाति पर आधारित स्तरीकरण

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जाति व्यवस्था एक बंद प्रणाली है, जिसमें व्यक्ति की सामाजिक स्थिति जन्म से निर्धारित होती है।

जाति आधारित स्तरीकरण की प्रमुख विशेषताएँ:

  • सदस्यता जन्म पर आधारित होती है
  • सामाजिक गतिशीलता का अभाव
  • अंतर्विवाह (Endogamy)
  • परंपरागत व्यवसाय

यह प्रणाली विशेष रूप से भारतीय समाज में पाई जाती है।[10]

(3) शक्ति पर आधारित स्तरीकरण

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शक्ति (Power) के आधार पर भी समाज में स्तरीकरण होता है। जिन व्यक्तियों या समूहों के पास राजनीतिक या प्रशासनिक शक्ति होती है, उनका सामाजिक स्थान उच्च होता है।[11]

विशेषताएँ

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सामाजिक स्तरीकरण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • यह सार्वभौमिक है (हर समाज में पाया जाता है)
  • यह स्थायी प्रकृति का होता है
  • इसमें विभिन्न स्तर होते हैं
  • यह असमानता पर आधारित होता है

निष्कर्ष

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सामाजिक स्तरीकरण समाज की एक अनिवार्य और सार्वभौमिक प्रक्रिया है, जो विभिन्न आधारों जैसे वर्ग, जाति और शक्ति के माध्यम से व्यक्तियों को अलग-अलग स्तरों में विभाजित करती है। यह न केवल सामाजिक संरचना को प्रभावित करता है, बल्कि समाज में अवसरों और संसाधनों के वितरण को भी निर्धारित करता है।

  1. NCERT, Sociology, Class 12, Chapter: Social Stratification
  2. Gisbert, P. (2010). Fundamentals of Sociology. Orient Longman.
  3. Haralambos, M. (2013). Sociology: Themes and Perspectives. Oxford University Press.
  4. Gisbert, P. (2010). Fundamentals of Sociology.
  5. Davis, Kingsley (1949). Human Society. Macmillan.
  6. Brum, L. & Selznick, P. (1958). Sociology.
  7. Bottomore, T. (1966). Classes in Modern Society.
  8. Marx, Karl & Engels, Friedrich (1848). The Communist Manifesto.
  9. Weber, Max (1922). Economy and Society.
  10. Srinivas, M. N. (1962). Caste in Modern India.
  11. Weber, Max (1922). Economy and Society.