पालिया

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पालिया
सिंध और गुजरात में प्रचलित मध्यकालीन विशिष्ठ स्मारकीय शिलारचनाएं
ध्वज
कच्छ के राव लखपतजी और उनकी रानियों की पालिया। यह समाधी २००१ के भूकंप में क्षतिग्रस्त हो गयी थी
छत्रदी, भुज में, युद्ध में शहीद हुए एक योद्धा की पालिया ऊपरी खंड में सूर्य और चन्द्रमा का प्रतीकात्मक अंकन, मध्य खंड में एक अश्वारोही योद्धा का अंकन तथा, नीचे के शिलालेख में योद्धा का नाम, स्थान और तिथि अंकित है
छत्रदी, भुज में, युद्ध में शहीद हुए एक योद्धा की पालिया ऊपरी खंड में सूर्य और चन्द्रमा का प्रतीकात्मक अंकन, मध्य खंड में एक अश्वारोही योद्धा का अंकन तथा, नीचे के शिलालेख में योद्धा का नाम, स्थान और तिथि अंकित है

पालिया अथवा खंभी पश्चिमी भारत के कई क्षेत्रों में पाई जाने वाली विशिष्ठ स्मारकीय समाधी संरचना है, जिसे मुख्यतः महान व्यक्तोयों की मृत्यु पर उनके सम्मान व उनके समाधी के तौरपर खड़ा किये जाता था। ये संरचनाएँ अधिकांशतः शिल्पकृति स्तंभ या पत्थरों के रूप में होती हैं, हालाँकि, कई पालियाँ, अधिक सुसम्पन्न रूप में भी हो सकती हैं। पालीयों को पश्चिमी भारत के कई क्षेत्रों में पाया जा सकता है, विशेषतः गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ क्षेत्रों में, एवं सिंध में भी। इन प्रस्तरकृत संरचनाओं पर विभिन्न चिंन्ह, शैलचित्र एवं शिलालेख पाये जाते है। पालियाँ कई तरह की, और कई आकृतियों की हो सकती है, और ये युद्धवीरों, महान नाविकों, सतियाँ एवं पशुओं को भी समर्पित हो सकते हैं, और अधिकांश ऐसी पालियाँ, प्रचलित लोक कथाओं का विषय भी होती हैं।

नामकरण[संपादित करें]

शब्द पालिया संभवतः मूल संस्कृत शब्द "पाल" से लिया गया है जिसका अर्थ होता है, "रक्षक"। गुजराती में, पाल का मतलब है "सैनिकों का समूह" या "सेना"। इन समाधियों के लिए, और भी अन्य शब्द उपयोग किये जाते हैं, जो इस ही शब्द के अपभ्रंश हैं: शब्द के अन्य रूपों पालिआ, पावलिओ, परिओ, पला, पालिउ भी इस्तेमाल किया गया है। इन्हें प्रकरी भाषा में पारिया और दहाक्ति भाषा में लोहार्ती कहा जाता है। लोहार्ती शब्द की व्युत्पत्ति, संभवतः लोहार शब्द से आया है, जिन्हें उस समय, इन स्मारकों को बनाने हेतु नियुक्त किया जाता था। यके अलावा, खंभी शब्द, संस्कृत शब्द स्तम्भ का एक अपभ्रंश है, जिसे इन स्मारकों के लिए इस्तेनाल किया जाता है। गुजराती में पाळिया कहाँ जाता है और खंभी को खाँभी कहाँ जाता है।

व्युत्पत्ति[संपादित करें]

वैदिक काल के दौरान उत्पन्न होने वाली परंपरा के अनुसार, मृत शरीर का अंतिम संस्कार नहीं किया गया था लेकिन उन्हें दफन या नदी में दफन किया गया था। पुरातात्विक खुदाई के दौरान, इस तरह के एक दफन जगह की शुरुआत में एक चिन्ह के रूप में एक पत्थर हो जाता है और अंतिम संस्कार के बाद गोलाकार पत्थरों का एक समूह होता है। बाद में इस प्रथा को यिशनी या एक पत्थर के क्लस्टर में विकसित किया गया, जिसमें नाम, स्थान और व्यक्तियों की दिनांक शिलालेखों में विकसित हुई थी। भारत में, इस अभ्यास को स्तूप, स्मारक, मंदिर आदि जैसे विभिन्न स्मारकों में विकसित किया गया है। ऐसे स्मारक पूरे भारत में पाए जाते हैं दक्षिणी भारत में इसे वर्गुल्ला या नात्क्कल कहा जाता है। यह अक्सर विभिन्न शिलालेखों पर, पत्थर पर मौजूद आंकड़ों पर बना है। पश्चिमी भारत में, यह पंखुड़ी और खम्भी के रूप में पाया जाता है। ऐसे हजारों स्मारक पूरे गुजरात में पाए जाते हैं, खासकर कच्छ और सौराष्ट्र के गांवों में। सबसे पुराने स्मारक ख्वादा में औध गांव में पाए गए हैं, जो देर से शताब्दी के हैं। यह प्रथा 15 वीं शताब्दी में लोकप्रिय हो गई और बड़ी संख्या में झुंड बन गए। कुछ आदिवासी समुदायों अभी भी अपनी परंपरा के अनुसार ऐसी स्मारक स्मारकों बनाते हैं।

स्मारकों के प्रकार[संपादित करें]

(बाएँ) एक घुड़सवार योद्धा और दो अन्य बैठे हुए लोगों की पालिया, छत्रादि, भुज
कच्छ के मिस्तिरियों की पालिया, धनेत्री, कच्छ, 1178 ईस्वी में निर्मित

पारंपरिक तौरपर इन स्मारकों को, वह किस चीज़ को समर्पित है, इस आधार पर, कुछ विभिन्न वर्गों में विभाजित किया जाता है: पालिया(चपटे, प्रस्तारकृत स्मारक), खंभी(शिल्पकृति स्तंबरूपी स्मारक, जो मुख्यतः किसी मृत व्यक्ति को समार्पोट होते हैं), थेसा(पालिया के पास रखा एक छोटा सा पत्थर), चागिओ(पत्थरों का ढेर), सुरपुरा(उन योद्धाओं को समर्पित, जो दूसरों की जान बचाते हुए मरे हो) और सुराधान(हत्या, दुर्घटना अथवा आत्महत्या जैसी अकस्मात् मृत्यु जे लिए)।[1][2][3] कुछ स्मारकों को सतीमाता, वीर या झुझर(निराधार नायक) भी कहा जाता है।

महत्त्व[संपादित करें]

ये स्मारकों जीवन और अभिलेखों के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं। वे सामाजिक संरचनाएं हैं जो समाज के नायकों के लोगों को याद दिलाते हैं। वे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेजों वाले मूर्तियां हैं, जिन्हें सदियों से संरक्षित किया गया है। यह पूर्व समाज के रिवाजों, संस्कृति और विश्वासों के बारे में जानकारी प्रदान करता है यह सांटीपार जैसी सांस्कृतिक परंपराओं के बारे में भी जानकारी देता है यह उस अवधि के पहनने, हथियारों और वाहनों के बारे में जानकारी भी प्रदान करता है। चूंकि इन स्मारकों में जगह और वर्ष जैसी जानकारी होती है, इसलिए यह विकास और भाषा का समय तलाशने में सहायक होता है। कभी-कभी इसका एक धार्मिक महत्व के रूप में उपयोग किया जाता है, क्योंकि इसमें कोई नुकसान नहीं होता है, खजाना को छिपे हुए स्थान को चिह्नित करने के लिए भी उपयोग किया जाता है।[4]

दीर्घा[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Hasu Yājñika (2004). A Study in Tribal Literature of Gujarat. Nayan Suryanand Loka-Pratishthan. पपृ॰ 144–145.
  2. Settar, S.; Sontheimer, Günther-Dietz (1982). Memorial stones: a study of their origin, significance, and variety. Institute of Indian Art History, Karnataka University. पृ॰ 170.
  3. Gujarat (India) (1971). Gujarat State Gazetteers: Dangs. Directorate of Government Print., Stationery and Publications, Gujarat State. पृ॰ 187.
  4. Shastri, Parth (10 February 2014). "History etched in stones". The Times of India. अभिगमन तिथि 5 June 2016.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]