परमर्दिदेव

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Entrance gate of Kalinjar fort

परमर्दिदेव (शासनकाल ११६५--१२०३) सल्तनतकालीन भारत में कालिंजर तथा महोबा के शासक थे। इन्हें राजा परमाल भी कहा जाता है। जगनिक इन्हीं के दरबारी कवि थे जिन्होंने परमाल रासो की रचना की थी। परमाल रासो में राजा परमाल के यश और वीरता का वर्णन वीरगाथात्मक रासो काव्य शैली में किया गया है। वर्तमान समय में इसके उपलब्ध हिस्से 'आल्ह खंड' में राजा परमाल के ही दो दरवारी वीरों की वीरता का वर्णन मिलता है। इसमें परमाल की पुत्री चंद्रावती का भी उल्लेख मिलता है।

परिचय[संपादित करें]

महोबे के राजा परमर्दिदेव या परमाल का नाम समस्त उत्तर भारत में विख्यात है। सन् ११६५ के लगभग सिंहासन पर बैठने के समय इसकी उम्र अधिक न रही होगी किंतु इसने राज्य को अच्छी तरह संभाला। इसके दो प्रतिद्वंदी थे, एक तो काशी और कन्नौज का राजा जयचंद्र गहडवाल और दूसरा दिल्ली तथा अजमेर का शासक पृथ्वीराज चौहान। परमर्दिदेव ने जयचंद्र से मित्रता की और पृथ्वीराज से संघर्ष। पृथ्वीराजरासो तथा आल्हाखंड के वर्णनों से यह निश्चित है कि चौहानों और चंदेलों का यह संघर्ष कुछ वर्षों तक चलता रहा और इसमें दोनों पक्षों की पर्याप्त हानि हुई। परमर्दिदेव के मुख्य सामंतों में से बनाफर बंधु ऊदल और मलखान मारे गए और चंदेल राज्य के बहुत से भाग पर पृथ्वीराज का अधिकार हो गया। शिलालेखों से इन घटनाओं पर विशेष प्रकाश नहीं पड़ता, किंतु मदनपुर के शिलालेखों से इतना निश्चित है कि दिग्विजयी पृथ्वीराज ने महोबे के आसपास के प्रदेश को सन् ११८२ में बुरी तरह से लूटा। परमर्दिदेव की हार इतनी जबरदस्त हुई थी कि कुछ कवियों ने तो यहाँ तक कह डाला कि परमर्दि ने मुँह में घास लेकर पृथ्वीराज से अपने प्राण बचाए। ऐसी भी किंवदंती है कि पराजय की शर्म के मारे परमर्दिदेव ने आत्मघात कर लिया। किंतु वास्तव में परमर्दिदेव कम से कम बीस साल तक और जीवित रहा और उसके शिलालेखों से यह भी सिद्ध है कि प्राय: सभी राज्य पर उसका अधिकार बना रहा। चौहान सेना बुंदेलखंड को लूटकर फिर वापस चली गई।

किंतु एक आफत टली तो दूसरी आई। सन् ११८२ में चौहान राज्य और सन् ११९४ में गहडवाल राज्य का मुहम्मद गोरी ने अंत कर दिया और भारत में कुत्बुद्दीन को अपना प्रतिनिधि बनाया। सन् १२०२ में कुत्बुद्दीन ने कई अन्य अमीरों का साथ लेकर कालिंजर पर आक्रमण किया। परमर्दिदेव ने कुछ समय तक घेरे में रहते हुए युद्ध किया किंतु अंत में उसने अपनी पराजय स्वीकार की और कर रूप में बहुत से हाथी तथा घोड़े कुत्बुद्दीन को देने की बात तय हुई। भाग्यवशात् इसी समय परमर्दिदेव की मृत्यु हो गई। इसके प्रधानामात्य ने कुछ समय तक मुसलमानों का और सामना किया किंतु दुर्ग में पानी की कमी पड़ने पर उसने भी आत्मसमर्पण कर दिया।

परमर्दिदेव शिव का भक्त और अच्छा कवि था। संभवत: वह अच्छा राजनीतिज्ञ रहा होगा; किंतु यदि हम परंपरागत कथाओं पर विश्वास करें तो यह कहना पड़ेगा कि साहस की कमी उसका मुख्य दोष था।

सन्दर्भ ग्रन्थ[संपादित करें]

  • पृथ्वीराज रासो, महोबा खंड;
  • आल्हा खंड;
  • शिशिरकुमार मित्र, अर्ली रूलर्स ऑफ खजुराहो,
  • दशरथ शर्मा, प्राचीन चौहान राजवंश।