नवागढ़ तीर्थ

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search
जैन अतिशय क्षेत्र नवागढ़
नवागढ
NavagarhArnath.jpg
चंदेल कालीन भगवान अरहनाथ नवागढ़ भौर्य में
धर्म संबंधी जानकारी
सम्बद्धताजैन
देवताअरहनाथ
त्यौहारमहावीर जयंती
अवस्थिति जानकारी
अवस्थितिललितपुर, उतर प्रदेश
भौगोलिक निर्देशांक24°33′22″N 78°56′06″E / 24.556°N 78.935°E / 24.556; 78.935निर्देशांक: 24°33′22″N 78°56′06″E / 24.556°N 78.935°E / 24.556; 78.935
वास्तु विवरण
स्थापितबारहवीं शताब्दी
मंदिर संख्याएक

नवागढ़ भारत में एक जैन तीर्थ ( जैन धर्म के लिए तीर्थस्थल) है। यह मध्य भारत के उत्तर प्रदेश में नवाई गांव में सौजना के पास मध्य प्रदेश सीमा पार स्थित है। यह ललितपुर से पूर्व में 65 और  सागर से उत्तर की ओर 110 किमी कि दूरी पर स्थित है । इस प्राचीन क्षेत्र की खुदाई 1959 में हुई थी। यह भारत का एकमात्र ऐसा तीर्थ है जहाँ मुख्य देवता भगवान अरनाथ की प्राचीन प्रतिमा है, जो प्राचीन भूमिगत कक्ष में संरक्षित है।

नवागढ़ क्षेत्र[संपादित करें]

उपाध्याय चित्रों के साथ सोजना स्तम्भ
संग्रहालय में प्राचीन कलाकृतियाँ

नवागढ़ सुन्दर प्राकृतिक आकर्षक और चट्टानी जंगल से घिरा हुआ क्षेत्र है। यह भगवान अरहनाथ की खड्गासन कायोत्सर्ग आकार छवि के लिए प्रसिद्ध है । [1] [2] यह चंदेला शैली में है और बारीक पॉलिश है। इसमें शिलालेख नहीं है, लेकिन एक ही कक्ष से एक शांतिनाथ aप्रतिमा के टुकड़े की तिथि सम्वत 1202 है। क्षेत्र के पास में प्रागैतिहासिक गुफा हैं जहां जैन साधु के साधना के चित्र है।

उत्तरप्रदेश ललितपुर जिलान्तर्गत महरौनी तहसील के सोजना थाना में 78.80 देशान्तर एवं 24.34 पर स्थित राजस्व ग्राम नवाई में प्रागैतिहासिक क्षेत्र नवागढ़ है, ज्वालामुखी लावे से निर्मिति चट्टानों के मध्य कई प्राकृतिक गुफायें है, यहाँ लघु पहाड़ियों की श्रृंखलाये है जिनमें रॉक आर्ट सोसायटी भारत के महासचिव डॉ.गीरिराजकुमार, दयाल बाग़ इंस्टिट्यूशन आगरा कई दिन तक सतत सर्वेक्षण करके पाषाणकालीन औजारों एवं कल्प मार्ग 10000 वर्ष प्राचीन का अन्वेषण किया है ।

इस अन्वेषण में प्रीमैचुलियन(२ लाख से ५ वर्ष प्राचीन) मिडिल मिडिल मैचुलियन (३५ हजार से २ लाख वर्ष) पोस्ट मैचुलियन (१५ हजार से ३५ हजार वर्ष) के औजारों की श्रृंखला प्राप्त हुई है, डॉ मारुतिनंदन प्रसाद तिवारी काशी हिन्दु विश्वविद्यालय वाराणसी के अनुसार प्राकृतिक गुफाओं में गुप्तकालीन(तीसरी सदीं) कायोत्सर्ग मुद्रा एवं चरण चिन्ह उत्कीर्ण हैं इससे सिद्ध होता है नवागढ़ प्राचीन नंदपुर की स्थापना गुप्तकाल में हो गई थी । जहाँ निरन्तरजैन संतो का आवागमन तथा साधना इन गुफाओं में करते थे, जैन पहाड़ियों पर स्थित कच्छप शिला के आधार में संतों का शयन स्थल इसका साक्ष्य है, कच्छय शिला के आधार एवं छत में चित्रित ब्र. जयनिशांत के द्वारा अन्वेषित ६-८ हजार वर्ष प्राचीन शैल चित्रों की श्रृंखला है जिनके अधिकांश चित्रऋतू क्षरित होकर नष्ट हो चुके हैं, शेष चित्र भी नष्ट होने की कगार पर है । इन शैल चित्रों में जैन दर्शन के कई रहस्य छुपे हैं, जिनका अन्वेषण डॉ स्नेहरानी जैन सर हरिसिंह गौर विश्व विद्यालयसागर एवं डॉ.भागचन्द्र भागेन्दु सचिव मध्यप्रदेश शासन के द्वारा हो रहा हैं, पहाडी के निकट प्राप्त मिट्टी एवं पाषाण के मनके तथा मृद भांड यहाँ मानव संस्कृति के साक्ष्य हैं, प्रतिहार कालीन(७२५ ई.) कालीन मूर्ति शिल्प से सिद्ध होता हैं यहाँ जिनालयों का निर्माण ५वी. ६ वी. सदी में हो चुका था, यहाँ की सांस्कृतिक धार्मिक धरोहरों को चंदेल शासक शासक धंगदेव (९५० ई.) मदन वर्मन (११२८ ई.) विकास के विशेष आयाम स्थापित हुए है ।

नवागढ़ में प्राप्त विशेष विभिन्न मुकुटो वाले राजाओं सामन्तों एवं महारानियो के शीर्षों के अन्वेषण डॉ काशीप्रसाद त्रिपाठी श्री हरि विष्णु अवस्थी इतिहास विद टीकमगढ, डॉ एस. के. दुबे संग्रहालय अधिकारी झाँसी, नरेश पाठक पुरातत्वविद ग्वालियर इसे विशेष व्यापारिक केन्द्र समुन्नत नगर विशिष्ट राज्य सत्ता वाला नगर घोषित करते है, कालिंजर प्रबोध कृति में डॉ हरिओम तत्सत लिखते है चंदेल शासक मदन वर्मन के काल में महोबा, मदनपुर, देवगढ, नवागढ़, पपौरा, सिरोन मदनेशपुर(अहार जी) का विशेष विकास हुआ, नवागढ़ प्राचीन नंदपुर की विशेष ख्याति रही है इसीलिए अहार जी के मूलनायक शांतिनाथ, पपौरा क्षेत्र के आदिनाथ की प्रशस्ति (अभिलेख) में उसका नाम उल्लेख हैं, डॉ काशिप्रसाद त्रिपाठी ने बुंदेलखंड का वृहद इतिहास में उल्लेख किया है, मदनपुर के अभिलेख अनुसार सन ११८२ ई. में (सम्बत १२३९) में चंदेल शासक परमहृदेव से युद्ध करते हुए पृथ्वीराज चौहान ने महोबा, लासपुर, मदनपुर के साथ नवागढ़ को भी ध्वस्त किया था,

प. गुलाबचंद्र पुष्प प्रतिष्ठाचार्य ककरवाहा टीकमगढ़ ने अप्रैल १९५९ में टीले पर स्थित इमली वृक्ष के नीचे भूगर्भ में स्थित जैन धर्म के धर्म अठारहवें तीर्थंकर अरहनाथ स्वामी के भरनामस्वामी के कायोत्सर्ग ममूर्ति का अन्वेषण किया खनन कार्य में यहाँ कई जिनालयों के साक्ष्य मिले परन्तु अर्थ भाव में इनका खनन कार्य नहीं हो सका, संग्रहालय में संगठित कायोत्सर्ग एवं पद्माशन मुद्रा की खंडित विशाल प्रतिमाएं इसका साक्ष्य है

  • लाखों वर्ष प्राचीन पाषाण औजारो की श्रृंखला एवं कपमार्क
  • हजारों वर्ष प्राचीन प्राकृतिक शैलाश्रय(गुफाये)
  • गुप्तकालीन (तीसरी सदी) कायोत्सर्ग मुद्रा एवं चरण चिन्ह
  • प्रतिहारकालीन(७२५ ई.) विशिष्ट मूर्ति शिल्प

क्षेत्र का इतिहास[संपादित करें]

सन् 1959 ई. में पं. गुलाबचन्द्र जी 'पुष्प' ककरवाहा से व्यापार हेतु कुछ साथियों के साथ नावई (नवागढ़) गाँव के पास से निकले। वहाँ टीले के ऊपर विशालकाय इमली के पेड के नीचे बहुत सी खण्डित जैन मुर्तियों, झाड़ियों के झुरमुट एवं पत्थरों का ढेर देखा। एक ग्रामीण यहाँ नारियल, फोड़ कर मनौती मांग रहा था। उससे चर्चा करने पर उसने बताया कि यह देव स्थान है। यहां हम अपनी समस्त विपदाओं का निराकरण करते हैं। यहां की धूल भी यदि हम रोगी को लगा दें, तो यह स्वस्थ हो जाता है। पं. पुष्पजी ने गंभीरता से निरीक्षण करके विचार किया कि यहाँ कोई अतिशयकारी प्रतिमा होनी चाहिए, जो ग्रामवासियों की श्रद्धा से उनकी इच्छा पूर्ति करती है। ग्रामवासियों की एकत्रित करके इमली का पेड़ हटाने को कहा, परंतु सभी ने मना कर दिया कि देव स्थान पर हम कुछ भी नहीं करेंगे। कुछ दिनों पश्चात् पुष्प जी ने अपने साथियों नब्बी पठया, स्वरूप पठया, हल्काई सेल, दयाचन्द्र सेठ, कड़ोरे सेठ मैनयार, मनकू सिंघई ककरवाहा, पल्टू मिठया, धर्मदास हैदरपुर, पन्ना सेट सौजना, अनंदी सिंघई अजनौर, हल्कू सिंघई डूंडा, कामता वैद्य गुढ़ा के साथ इमली के पेड़ को हटाने का संकल्प किया। जिसमें उन्हें कोई बाधा नहीं आई, कुछ दिन में ही परिश्रम के फलस्वरूप टीला हटाने पर कुछ खण्डित प्रतिमाएं प्राप्त हुई। जमीन खोदने पर कुछ सांगोपांग तथा कुछ खण्डित प्रतिमाएं पुनः प्राप्त हुई। जमीन में 10 फीट नीचे लगभग 900 वर्ष प्राचीन अतिशयकारी 4.75 फीट खड्गासन अरनाथ भगवान की प्रतिमा भौंयरे ( भूगर्भ ) में प्राप्त हुई। भगवत् दर्शन से अभिभूत पुष्प जी ने संकल्प किया कि भगवान की पुनः प्रतिष्ठा करके इस क्षेत्र का विकास करूंगा।

खोज और विकास[संपादित करें]

1940 के दशक में क्षेत्र को खंडित मूर्तियों के संग्रह के रूप में दर्ज किया गया था और पास के एक गांव में संवत 1203 के साथ उत्कीर्ण स्तंभों का एक संग्रह। [3] एक पेड़ के नीचे एक मंच था जिसमें बड़ी संख्या में प्राचीन जैन ऐतिहासिक अवशेष थे। इसकी खोज पं गुलाबचंद जी 'पुष्प' ने की थी। गुलाबचंद्र पुष्प, एक आयुर्वेदिक चिकित्सक (जो बाद में एक प्रतिष्ठाचार्य के रूप में प्रसिद्ध थे) पास के मेनवार गाँव में भ्रमण के दौरान पुरातात्विक अवशेष मिले अन्वेषण ने एक भूमिगत कक्ष में भगवान अर्नथ की छवि तैयार की, साथ ही कई मूर्तियों के साथ-साथ मूर्तियों को भी नुकसान पहुँचाया। 1959 में सतना के नोट जैन पुरातत्व विशेषज्ञ नीरज जैन की सलाह से व्यवस्थित विकास शुरू किया गया था। चूंकि स्पॉट एक जंगल में था, इसलिए यह प्रस्तावित किया गया था कि मुख्य छवि को पास के शहर में ले जाया जाना चाहिए, हालांकि स्थानीय ग्रामीणों द्वारा इसका विरोध किया गया था। 1990 में, एक प्रारंभिक संरचना एक चारदीवारी के साथ बनाई गई थी। 1985 और 2011 में गजरथ उत्सव आयोजित किए गए। इसके बाद यह तय किया गया था कि भगवान अरहनाथ की छवि को उसी भूमिगत कक्ष ( भोंइरा ) में रखा जाना चाहिए जो केवल संकीर्ण सीढ़ी के कारण सुलभ था। पूजाघर के सामने एक विशाल कक्ष की खुदाई की गई, जिससे पूजा करने वालों के लिए एक बड़ी जगह मिल सके। तीर्थ का दौरा आचार्य विद्यासागर, वर्धमानसागर, देवनंदी, पद्मनंदी, विरासागर, ज्ञानसागर, विशुद्धसागर, विभवसागर के साथ-साथ कई अन्य मुनि और आर्यिकाओं ने किया है।

ऐतिहासिक मूर्तियाँ और शिलालेख[संपादित करें]

भौंरे के अलावा, परिसर में आधुनिक और प्राचीन चित्रों के साथ दो अतिरिक्त मंदिर और एक संग्रहालय शामिल हैं, जहां बड़ी संख्या में ऐतिहासिक मूर्तियां और टुकड़े संरक्षित हैं। इनमें आदिकालीन आयु (500-1000 ईस्वी) से भगवान आदिनाथ और भगवान पार्श्वनाथ की मूर्तियाँ शामिल हैं। [4] ११ ९ ५ (११३ AD ई.प.) के एक पतले पॉलिश वाले काले विद्वान महावीर की छवि के निचले टुकड़े में गोलपुर्वा महिचंद्र, उनके पुत्र डेल्हान और उनके परिवार के सदस्यों का उल्लेख है। एक बार सोजना में एक जलाशय में पुन: उपयोग किए गए चार कॉलम दिनांकित 1202 भी संरक्षित हैं।

प्रागैतिहासिक क्षेत्र की प्राचीनता[संपादित करें]

नवागढ़ (नंदपुर) के पुरातात्विक, अभिलेखीय एवं ऐतिहासिक साक्ष्य जैन धर्म कि पुरातन परम्परा को सिद्ध करते हैं। डॉ. स्नेहरानी जैन सागर एवं इंजी. एस.एम.जैन सोनीपत के अनुसार यहाँ की ग्रेनाइट की चट्टानें एवं गुफाएँ ज्वालामुखी के लाये से निर्मित हैं जो लाखों वर्ष प्राचीन हैं। नवागढ़ में पाषाणकाल से वर्तमान काल तक निरंतर मानव सभ्यता जीवंत रहने के साक्ष्य प्राप्त हुये हैं। इसमें 28 जनवरी 2017 ई. से 27 मार्च 2018 ई. तक प्रोफेसर गिरिराज कुमार आगरा द्वारा अन्वेषित पाषाण कुदालें 2 लाख से 5 लाख वर्ष प्राचीन पाषाणकालीन मानव सभ्यता के साक्ष्य है। 6 नवम्बर 2016 ई. को डॉ.एस.के.दुबे झांसी तथा श्री नरेश पाठक ग्वालियर द्वारा अन्वेषित पाषाण उपकरण एवं लघु पाषाण औजार 12 से 15 हजार वर्ष प्राचीन मध्य पाषाणकालीन सभ्यता का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। सिद्धों की टौरिया का रॉक कप मार्क 10 हजार वर्ष प्राचीन मानव सभ्यता का साक्ष्य है। दिनांक 6 अक्टूबर 2014 ई. को ब्र. जयकुमार 'निशांत' द्वारा अन्वेषित कच्छप शिला की “चितेरों की चंगेर" शैलचित्र श्रृंखलाएं 6 से 8 हजार वर्ष पूर्व की विकसित मानव सभ्यता, मिट्टी एवं पाषाण के मनके 2 हजार वर्ष से लगातार मानवीय सभ्यता के प्रत्यक्ष साक्ष्य हैं। डॉ. भागचन्द्र ‘भागेन्दु' दमोह एवं श्री हरिविष्णु अवस्थी टीकमगढ़ के अनुसार मटकाटोर शिला, कच्छप शिला, बगाज टोरिया की गुफा, फाईटोन पहाड़ी, जैन पहाड़ी की गुफाएँ यहाँ जैन संतों की हजारों वर्ष प्राचीन साधना स्थली को प्रमाणित करती हैं। इसके साक्ष्य गुफा में उत्कीर्ण गुप्तकालीन (5 वीं सदी) कायोत्सर्ग मुद्रा (रॉक कट इमेज) एवं चरण चिन्ह तथा बगाज टोरिया की प्राकृतिक आचार्य गुफा है। नवागढ़ (नंदपुर) में संगृहीत प्रतिहारकालीन शिल्प (सातवीं सदी) शिखर कलश, खंडित तीर्थकर बिम्ब, नवागढ़ के 5 किमी. विस्तार एवं ऐतिहासिक साक्ष्यानुसार यह प्रमाणित होता है कि नवागढ़ वंशी (तीसरी सदी) राजाओं द्वारा स्थापित महानगर था, जिसका संग्रहालय में संगृहीत विशेष मुकुट वाले शीर्ष, राजसत्ता सम्पन्न गौरवमयी नगर होने का संकेत करते हैं। उपाध्याय परमेष्ठी के नवागढ़ में संवत् 1188 सन् 1131 ई. के सर्वांग बिम्ब, 4 विलक्षण बिम्ब एवं चारों मानस्तंभ में तीन ओर तीर्थकर बिम्ब तथा एक ओर उपाध्याय बिम्ब के साथ अकलंक निकलंक की राजकुमार अवस्था की प्रतिमा यहाँ प्राचीन कालीन गुरुकुल परम्परा की सशक्त साक्ष्य हैं। डॉ. एम.एन.पी. तिवारी वाराणसी एवं डॉ. ए.पी. गौड़ लखनऊ के अनुसार सन् 1066 ई. (संवत् 1123) का आदिनाथ तीर्थंकर का पद्मासन खंडित आसन अत्यंत महत्वपूर्ण है, चंदेलशासक घंगदेव सन् 954 ई. (संवत् 1011) के शासनकाल में राज्य सम्मान प्राप्त पाहिल श्रेष्ठी ने मुनि वासवचंद के काल में खजुराहो में जैन मंदिर निर्माण के साथ नंदपुर वर्तमान नवागढ़ में भी जैन मंदिर का निर्माण कराया था। पाहिल के पौत्र महिचंद प्रपौत्र देल्हण ने सन् 1138 ई. (संवत् 1195) में महावीर तीर्थंकर की स्थापना कराई थी। डॉ. हरिओऽम तत्सत् शुक्ल कालिंजर प्रबोध में लिखते हैं मदन वर्मन ने राजुराहो, अहार, बानपुर, दुधही, चाँदपुर, नयागढ़, कुण्डलपुर एवं सौरों जैन तीर्थ स्थापित किये। इसी के साथ यहाँ सन् 1145 ई. (संवत् 1203) में मानस्तंभ एवं प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई थी। इससे सिद्ध होता है कि नवागढ़ प्राचीन नंदपुर जिन मंदिरों के वृहद् इतिहास में उल्लेख करते हैं, मदनपुर के अभिलेख त्रिपाठी बुन्देलखण्ड का (संवत् 1239) में चंदेल शासक परमादिदेव से युद्ध करते हुये पृथ्वीराज चौहान ने महोबा, लासपुर, मदनपुर के साथ नवागढ़ को भी ध्वस्त किया था। जिसके साक्ष्य यहाँ के संग्रहालय में संगृहीत विशालकाय शताधिक खंडित तीर्थंकर प्रतिमाएं एवं कला शिल्प है, डॉ. कस्तूरचन्द्र 'सुमन' दमोह के अनुसार उस काल में नंदपुर वर्तमान नवागढ़ महत्वपूर्ण एवं समृद्धशाली जैन तीर्थ क्षेत्र रहा होगा, इसीलिये सिद्धक्षेत्र अहार जी के मूलनायक शांतिनाथ तीर्थकर सन् 1180 ई. (संवत् 1237) की प्रशस्ति तथा अतिशय क्षेत्र पपौरा जी के भौंयरा मंदिर क्र. 23 की तीर्थकर प्रतिमा सन् 1145 ई. (संवत् 1202) की प्रशस्ति में इसका नामोल्लेख प्राप्त होता है।

पुरातन साधना स्थली[संपादित करें]

नवागढ़ के बीहड़ में नैसर्गिक प्राचीन शैलाश्रय एवं गुफाएं हैं इनमें सन् 1961 ई. में मुनि श्री आदिसागर जी महाराज ( बम्हौरी वालों ) ने साधना की थी। सन् 1965 एवं 66 में क्षुल्लक चिदानंदजी महाराज एवं ब्र . आत्मानंद जी ने नवागढ़ में 2 चातुर्मास किए। क्षुल्लक महाराज कभी कभी 2-3 दिन जंगलों में ध्यानस्थ हो जाते थे । ढूँढने पर भी नहीं मिलते थे । ब्र . निशांत भैया ने सरपंच रामनारायण यादव से इस तथ्य की जानकारी ली तो उन्होंने ' मटकी गुफा ' एवं कुछ अन्य गुफाओं की जानकारी दी , तब निशांत भैया ने सरपंच जी के साथ कई महीने जंगल में घूमने के पश्चात् मंदिर से 3 कि.मी. दूर जैन पहाड़ी में 6 अक्टूबर 2014 ई . को एक शैलाश्रय में शैलचित्रों की | खोज तथा 27 फरवरी एवं 11 जून 2015 ई . को कुछ विशेष गुफाओं की खोज की जहाँ प्राचीनकाल से आज तक संतों ने सतत् साधना करके जिनशासन की प्रभावना की है।

संग्रहालय[संपादित करें]

नवागढ़ में खनन से प्राप्त मध्यकालीन आठ फीट उत्तुंग भगवान आदिनाथ, 15 फीट उत्तुंग भगवान शांतिनाथ, पद्मासन भगवान पार्श्वनाथ, विशाल तोरण एवं कई अतिविशिष्ट | शिल्पों के साथ लगभग 200 कलाकृतियाँ क्षेत्र की यशोगाथा की साक्षी हैं । विशाल संग्रहालय "बुन्देली विरासत" की योजना समाज के सहयोग से क्रियान्वित होना शेष है ।

क्षेत्र की वर्तमान स्थिति[संपादित करें]

क्षेत्र के प्रारंभिक विकास के क्रम में प्रथम बार सन् 1960 में पं. नीरज जैन सतना के निर्देशन में प्रांतीय जैन समाज के सहयोग से भौंयरे का जीर्णोद्धार किया गया । प्रतिष्ठाचार्य पं. गुलाबचन्द्र 'पुष्प' एवं आंचलिक समाज के विशेष सक्रिय सहयोग से वर्ष 1985 में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव के सफल आयोजन के फलस्वरूप शिखर सहित मूलनायक मंदिर, बाहुबली जिनालय एवं धर्मशाला का निर्माण कार्य संपन्न हुआ । ब्र. जय कुमार 'निशांत' भैया जी के निर्देशन में क्षेत्र को नवीन स्वरूप प्रदान कराते हुए वास्तु एवं शिल्पकला के अनुरूप किये गये सौन्दर्यकरण से आज नवागढ़ क्षेत्र जन - जन के लिए आस्था का केंद्र बन चुका है, अरनाथ स्वामी की चक्रवर्ती विभूति 14 रत्न एवं 9 निधियों की कलात्मक शिल्पकला एवं वैभव के अंकन का आकर्षण विलक्षण है भक्तगण यहाँ आकर विधान, जाप्यानुष्ठान आदि करके अपनी समस्याओं का निदान पाकर भगवान अरनाथ स्वामी के प्रति समर्पित हो जाते हैं।

विकास[संपादित करें]

तीर्थ का विकास पं गुलाबचंद्र पुष्प द्वारा किया गया है। गुलाबचंद्र पुष्प, जिन्होंने कई जैन मंदिरों की स्थापना के लिए प्रतिष्ठाचार्य के रूप में कार्य किया है, [5] और अब पिता का सपना उनके पुत्र ब्रह्मचारी जयकुमार जैन निशांतजी कर रहे है,जो एक प्रख्यात प्रतिष्ठाचार्य है। [6]

विलक्षण कलाकृतियाँ[संपादित करें]

  • पंचतीर्थी पार्श्वनाथ- भूगर्भ से प्राप्त यह मनोज्ञ, विलक्षण, माल्याधर, त्रिछत्र, मृदंगवादक सहित सर्वांग पार्श्वनाथ जिनबिम्ब चंदेलकालीन शिल्पकला की उत्कृष्ट कृति है।
  • राजकुमार अकलंक- निकलंक- एक ही शिलाखण्ड में दोनों राजकुमारों की वस्त्राभूषण से अलंकृत कलाकृति जिसमें अग्रज के हाथ में लम्बायमान शास्त्र पत्र एवं कलम है ।
  • उपाध्याय बिम्ब- मनोहारी बिम्ब जिसमें बायें हाथ में लम्ब शास्त्र को विशेष मुद्रा में दिखाया गया है ।
  • राजकुमार अरनाथ- कलात्मक शीर्षखंड जिसमें विशाल मुकुट , दीर्घनयन , सुडोल नासिका , मांसल कपोल एवं मुस्कुराते हुये होंठ अत्यंत आकर्षक हैं ।
  • तीर्थकर माता - खनन से प्राप्त विभिन्न आभूषणों से सुसज्जित , मातृत्वभाव युक्त तीर्थकर अरनाथ स्वामी की जननी राजमाता ' मित्रा ' की यह विशेष कृति है ।

संभावनाएँ[संपादित करें]

वरिष्ठ पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार नवागढ़ क्षेत्र के पूर्व की ओर एक कि.मी. की दूरी पर 30 फीट चौड़ी बावड़ी एवं उसी के पास मंदिर के पुरावशेष हैं । क्षेत्र के उत्तर दिशा में प्राचीन टीला एवं चंदेलकालीन कुआँ है । दक्षिण में स्थित पहाड़ी एवं जंगल में स्थित पहाड़ियों , ग्रामीण अंचलों में विशेष सांस्कृतिक ऐतिहासिक महत्व की पुरा संपदा एवं पाषाण कालीन सभ्यता के और भी अवशेष मिलने की संभावना है । इस ओर समाज एवं प्रशासन का ध्यान अपेक्षित है।

क्षेत्र के अतिशय[संपादित करें]

विध्वंस लीला को झेलते हुये मूलनायक अरनाथ भगवान की प्रतिमा का सुरक्षित रहना स्वयं में अतिशय है । ग्रामीण अंचल एवं जैन - जैनेतर समाज की अगाध आस्था अरनाथ प्रभु से जुड़ी है। प्राकृतिक आपदा, पशु पीड़ा का निदान भक्तगणों को निष्काम साधना से निरंतर प्राप्त होता है। आज भी ग्रामवासी अपना कार्य आरंभ करने के पूर्व प्रभु चरणों में धोक देने आते हैं। देवों द्वारा अभिषेक, आंखों की ज्योति आना, पॉव का दर्द ठीक होना, शारीरिक एवं मानसिक बाधा दूर होना, खाली गोद भरने के साथ कैंसर एवं ट्यूमर जैसी असाध्य बीमारी ठीक होना आदि अनेकानेक अतिशयकारी घटनाओं के ग्रामीणजन साक्षी हैं । जिनको दर्शनार्थी श्रावक सुनकर आश्चर्यचकित हुये बिना नहीं रहता व भक्ति पूर्वक प्रभु के चरणों में समर्पित होता चला जाता है। देवाशीष अमृत कूपं- विगत कई वर्षों से मेला के समय क्षेत्र के कुएं में अभिषेक करने लायक जल ही रहता है। मेला आरम्भ होते ही एक ही रात में उसमें 8-10 फीट जल स्यमेव भर जाता है , जिससे हजारों श्रायकों की सम्पूर्ण व्यवस्था होती है । वर्ष 2011 एवं 2016 पंचकल्याणक के समय हुए इस अतिशय का जन जन प्रत्यक्षदर्शी है ।


संत समागम[संपादित करें]

इस क्षेत्र पर आचार्यश्री विद्यासागर जी, आचार्यश्री वर्धमानसागरजी, आचार्यश्री देवनंदीजी, आचार्यश्री पद्मनंदीजी, आचार्यश्री विरागसागरजी, आचार्यश्री ज्ञानसागर जी, आचार्यश्री विशुद्धसागर जी, आचार्यश्री विभवसागरजी, आचार्यश्री विनिश्चयसागर जी मुनिश्री नेमिसागरजी, मुनिश्री समयसागर जी मुनिश्री सुधासागरजी, मुनिश्री अभयसागरजी सहित कई मुनि संघ एवं आर्यिका अनंतमती माताजी, आर्यिका विशाश्री माताजी, आर्यिका गुरुमती माताजी, आर्यिका प्रशांतमती माताजी, गणनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी के साथ कई अन्य संघ भी दर्शन का सौभाग्य प्राप्त कर इस क्षेत्र का अतिशय वर्धन कर चुके हैं । मुनिश्री सरलसागर जी महाराज का वर्ष 2019 का चातुर्मास सानंद सम्पन्न हुआ ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज द्वारा पुरासम्पदा का अवलोकन[संपादित करें]

मई 2018 में अतिशय क्षेत्र पपौरा जी में आचार्य भगवंत द्वारा नवागढ़ में संगृहीत पुरासम्पदा का अवलोकन किया गया । आचार्यश्री ने ब्र . जयकुमार जी ' निशांत ' को क्षेत्र के विकास एवं पुरातात्विक धरोहरों को लेकर संबंधित दिशा निर्देश प्रदान किये ।

क्षेत्र पर आयोजित पंचकल्याणक[संपादित करें]

  • प्रथम- सन् 1066 ई. (संवत् 1123)
  • द्वितीय - सन् 1138 ई. (संवत् 1195)
  • तृतीय - सन् 1145 ई. (संवत् 1203)
  • चतुर्थ- 31 जनवरी से 5 फरवरी सन् 1985 ई. (संवत् 2042)
  • पंचम- 14 जनवरी से 19 जनवरी 2011 ई. (संवत् 2069)
  • षष्ठ- 29 जनवरी से 4 फरवरी 2016 ई. (संवत् 2073)

सुविधाएं[संपादित करें]

धर्मशाला (धर्मशाला) में 20 कमरे हैं। स्वादिष्ट भोजन के लिए एक कैंटीन (भोजशाला) उपलब्ध है।

स्थान और पास के तीर्थ[संपादित करें]

अतिशय क्षत्रः पपौरा जी ३० किमी, सिद्धक्षेत्र अहारजी 55 किमी, सिद्धक्षेत्र द्रौणगिरी 55 किमी, सिद्धक्षेत्र बडागांव १५ किमी।

छायाचित्र[संपादित करें]

यह सभी देखें[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. नवागढ़ में आस्था का महाकुम्भ 29 से होगा शुरू, Vir Arjun, 21 Jan 2016
  2. Navagarh Nandpur Itihas, Ed. Br. Jai Kumar Jain Nishant, Shri Dig. Jain Yuvak Sangh Indore, 2016
  3. Shri Akhil Bharatvarshiya Golapurva Directory, Ed. Pt. Mohanlal Jain Kavyatirth, Baraitha, 1941, p. 22, 198
  4. Niraj Jain, Navagarh, Ek Mahatvapurna Madhyayugin Jain Tirth, Anekanta, year 15, Issue 6, 1962, p. 177-79
  5. गुलाबचंद पुष्प का निधन, संस्कार आज, Bhaskar News Network, Jan 06, 2015
  6. आय की 10 प्रतिशत राशि दान दें: आचार्यश्री, Amar Ujala, 03 Feb 2016

[1] [2] [3]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

  1. https://www.paraspunj.com/?p=2469
  2. https://www.naidunia.com/madhya-pradesh/tikamgarh-ancient-statues-are-found-at-every-fourth-place-in-excavation-in-nawagarh-3114970
  3. नवागढ़ तीर्थ